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तीन दिवसीय विहंगम योग समारोह के समापन पर 2100 कुंडीय विश्व शांति महायज्ञ में हजारों लोगों ने दी आहूति।

छपरा/बिहार 29 जुलाई।तीन दिवसीय विहंगम योग समारोह के समापन पर 2100 कुंडीय विश्व शांति महायज्ञ में हजारों लोगों ने दी आहूति
महायज्ञ में आहुति देने बैठे हजारों यज्ञानुरागियों को संबोधित करते हुए संत प्रवर श्री विज्ञान देव जी महाराज ने हुए कहा कि
यज्ञ भारतीय संस्कृति का प्राण है, वैदिक धर्म का सार है। यज्ञ श्रेष्ठतम शुभ कर्म है। यज्ञ का अर्थ है त्याग भाव । अग्नि की ज्वाला सदैव ऊपर की ओर उठती है। अग्नि को बुझा सकते हैं, नीचे झुका नहीं सकते। वैसे ही हमारा जीवन भी ऊध्र्वगामी हो, श्रेष्ठ और पवित्र पथ पर, कल्याणकारी पथ पर निरंतर गतिशील रहे। हमारे अंतःकरण में ज्ञान की अग्नि जलती रहे, शरीर में कर्म की अग्नि, इन्द्रियों में तप की अग्नि जलती रहे। श्रेष्ठ विचारों की, सद्विचारों की अग्नि प्रज्ज्वलित रहे। अशुभ नष्ट होता रहे। यज्ञ की अग्नि यही संदेश देती है।
महाराज श्री ने यह भी कहा कि यज्ञ श्रेष्ठ मनोकामनाओं की पूर्ति और पर्यावरण शुद्धि का भी साधन है। परन्तु यज्ञ यहीं तक सीमित नहीं है। वैदिक हवन यज्ञ हमारे भीतर त्याग की भावना का विकास करता है। मैं और मेरा से ऊपर उठकर विश्व शान्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
इसी क्रम में कहा कि आज हो रहे ग्लोबल वॉर्मिंग को रोकने का यह एक ससक्त माध्यम है। इस पर सभी पर्यावरण चिंतको का ध्यान अवश्य होना चाहिए। प्राचीन काल मे ऋषि आश्रमों में प्रत्येक दिन यज्ञ की परंपरा थी। आज के समय मे पहले से ज्यादा अवश्यक एवं अनिवार्य हो गया है। यज्ञ एवं योग के सामंजस्य से ही विश्व में शांति स्थापित की जा सकती है। महाराज जी ने बताया कि यज्ञ का धुँआ कोई डीजल या पेट्रोल का धुँआ नहीं है। यह आयुर्वेदिक जड़ीबूटियों का लाभकारी धूम्र है जिससे स्वास्थ्य लाभ एवं पर्यावरण शुद्धि दोनों का लाभ होता है।
संध्याकालीन मंचीय कार्यक्रम का शुभारंभ 5 बजे से हुआ। जिसमें अनेको आध्यात्मिक भजनों के साथ साथ पवन जन्मोत्सव पर सोहर की भी प्रस्तुति हुई।
इसके बाद जय स्वर्वेद कथा का प्रारंभ हुआ। जय स्वर्वेद कथा के दौरान संत प्रवर श्री विज्ञान देव जी महाराण ने कहा कि
अध्यात्म का संविधान है स्वर्वेद। स्वर्वेद आध्यात्मिक ज्ञान का चेतन प्रकाश है। जिसके आलोक में अविद्या, अंधकार, मिथ्याज्ञान नष्ट होते हैं। यह हमारी आध्यात्मिक यात्रा को सदैव जागृत रखता है। अशांति एवं वैमनस्य से पीड़ित विश्व मे शांति एवं सौहार्द की स्थापना करने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम स्वर्वेद है। जीवन मे स्वर्वेद का आचरण अनन्त ऊंचाइयों तक ले जाता है। स्वर्वेद हमारी आध्यात्मिक यात्रा को सदैव जागृत रखता है। भीतर की अनंत शक्ति का सच्चा ज्ञान स्वयं को जानने से होता है। आंतरिक शांति के अभाव से ही आज विश्व मे अशांति है।
संत प्रवर श्री ने बताया कि विहंगम योग के प्रणेता अनंत श्री सदगुरू सदाफल देव जी महाराज ने ऋषियों के दुर्लभ ज्ञान को सहज रूप में उपलब्ध करके मानवमात्र पर अहैतुकी कृपा की है। सद्गुरु देव ने अपनी गहन साधना से प्राप्त दिव्यज्ञान द्वारा हमे स्वर्वेद महाग्रंथ का महान प्रसाद दिया।
कार्यक्रम समापन पर सद्गुरु आचार्य श्री स्वतंत्र देव जी महाराज की अमृतवाणी हुई। महाराज जी ने कहा कि आज योग एक विश्व विश्रुत शब्द तो बन गया है लेकिन इसे केवल आसन और प्राणायाम की परिधि में ही आवद्ध किया जा रहा है। इसके मूल स्वरूप आत्मज्ञान व परमात्म ज्ञान की आंतरिक साधना की प्रक्रिया गौण होती जा रही है।
उन्होंने कहा कि विहंगम योग एक संपूर्ण योग है। जिसके मध्यम से शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक व आत्मिक विकास संभव है।
उन्होंने कहा कि जैसे कमल का पत्ता जल से ही उत्त्पन होता है और जल में ही रहता है पर वह जल से लिप्त नहीं होता। ऐसे ही एक विहंगम योगी संसार में रहते हुए संसार के कार्यों को करते हुए भी इससे निर्लिप्त रहता है।
प्रातः 6:30 से 8 बजे तक शारीरिक आरोग्यता के निमित्त आसन- प्राणायाम एवं ध्यान का सत्र संचालित हुआ। दिन में 10 बजे से 2100 कुंडीय विश्व शांति वैदिक महायज्ञ का शुभारंभ संत प्रवर श्री विज्ञान देव जी महाराज के कर कमलों द्वारा अ अंकित श्वेत ध्वजारोहन कर किया गया।
भव्य एवं आकर्षक ढंग से सजी 2100 कुण्डीय यज्ञ वेदियों में वैदिक मंत्रों की ध्वनि से संपूर्ण वातावरण शुचिता को धारण करते हुए गुंजायमान हो उठा। विश्वशांति वैदिक महायज्ञ में संपूर्ण भारत वर्ष के साथ साथ, विदेशो से आए भक्तों ने एक साथ इस पावन अवसर पर भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के निमित्त वैदिक मंत्रोंच्चारण के बीच यज्ञ कुंड में आहुति को प्रदान किये।
यज्ञ वेदी से निकल रहे धूम्र से आस. पास के गाँवों का संपूर्ण वातावरण परिशुद्ध होने लगा। यज्ञ के पश्चात सद्गुदेव एवं संत प्रवर श्री के दर्शन के लिए अनुयायियों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। 2100 कुंडों से निकलते यज्ञीय धूम्र से सम्पूर्ण वातावरण परिशुद्ध हो दिव्य परिवेश का निर्माण हो उठा।
यज्ञ के उपरांत मानव मन की शांति व आध्यात्मिक उत्थान के निमित्त ब्रह्मविद्या विहंगम योग के क्रियात्मक ज्ञान की दीक्षा आगत नए जिज्ञासुओं को दिया गया। जिसमें नए जिज्ञासुओं ने ब्रह्मविद्या विहंगम योग के क्रियात्मक ज्ञान की दीक्षा को ग्रहणकर अपने जीवन का आध्यात्मिक मार्ग प्रसस्त किया।
इस आयोजन में प्रतिदिन निःशुल्क योग, आयुर्वेद, पंचगव्य, होम्योपैथ आदि चिकित्सा पद्धतियों द्वारा कुशल चिकित्सकों के निर्देशन में रोगियों को चिकित्सा परामर्श भी दिया जा रहा है। जिसका लाभ आगत भक्त शिष्यो के साथ क्षेत्रीय लोग भी प्राप्त कर रहे हैं। आगत भक्तों के लिए अनवरत भण्डारा चल रहा है।
इस कार्यक्रम में छपरा सहित बिहार के कई जिलों के साथ साथ झारखंड, उत्तर प्रदेश, मणिपुर, कोलकत्ता, गुजरात, महाराष्ट्र आदि अनेक प्रान्तों से भक्त शिष्य उपस्थित रहे।

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