
RKTV NEWS/डॉ. प्रियंका सौरभ,30 मार्च।भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौता (2026) ऐसे समय में उभरकर सामने आया है, जब भारत एक ओर वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी भागीदारी को विस्तार देने की दिशा में अग्रसर है, वहीं दूसरी ओर अपनी कृषि-आधारित सामाजिक-आर्थिक संरचना की रक्षा करने की अनिवार्य चुनौती का सामना कर रहा है। फरवरी 2026 में घोषित अंतरिम रूपरेखा ने जहां भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में नए अवसरों के द्वार खोले हैं, वहीं सस्ते अमेरिकी कृषि उत्पादों के संभावित आयात ने देश के करोड़ों किसानों के बीच चिंता और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। इस संदर्भ में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि क्या यह समझौता भारत को एक सशक्त वैश्विक कृषि निर्यातक के रूप में स्थापित करेगा या यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए आर्थिक संकट का कारण बन सकता है।
भारत और अमेरिका के व्यापारिक संबंध ऐतिहासिक रूप से रणनीतिक और बहुआयामी रहे हैं। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच कृषि व्यापार में भारत को अधिशेष प्राप्त हुआ है, जो यह संकेत देता है कि भारतीय कृषि उत्पादों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा की क्षमता मौजूद है। प्रस्तावित समझौते के तहत अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों—जैसे मसाले, चाय, कॉफी, काजू, आम, पपीता और प्रसंस्कृत खाद्य—पर शुल्क में कमी या समाप्ति भारतीय निर्यात को प्रोत्साहित कर सकती है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा अर्जन में वृद्धि होगी, बल्कि कृषि क्षेत्र में मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण उद्योग को भी बढ़ावा मिल सकता है।
किन्तु इस समझौते का दूसरा पक्ष कहीं अधिक जटिल और संवेदनशील है। अमेरिका अपने किसानों को व्यापक सब्सिडी प्रदान करता है, जिससे उसके कृषि उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में अत्यंत प्रतिस्पर्धी बन जाते हैं। यदि ऐसे उत्पाद—जैसे DDGS, सोयाबीन तेल और ज्वार—भारतीय बाजार में बड़े पैमाने पर प्रवेश करते हैं, तो घरेलू किसानों को मूल्य प्रतिस्पर्धा में गंभीर नुकसान उठाना पड़ सकता है। इससे कृषि उत्पादों की कीमतों में गिरावट आ सकती है, जो पहले से ही आय संकट से जूझ रहे किसानों के लिए और अधिक चुनौतीपूर्ण स्थिति उत्पन्न करेगी।
भारत की कृषि संरचना मुख्यतः छोटे और सीमांत किसानों पर आधारित है, जो कुल किसानों का लगभग 86% हिस्सा हैं। ये किसान सीमित संसाधनों, अस्थिर बाजार और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के बीच अपनी आजीविका बनाए रखते हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी नीतियां इन किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच प्रदान करती हैं, किंतु इसकी पहुंच सीमित है और यह सभी फसलों तथा क्षेत्रों को समान रूप से लाभ नहीं पहुंचा पाती। ऐसे में यदि सस्ते आयात घरेलू बाजार में बढ़ते हैं, तो MSP की प्रभावशीलता कमजोर हो सकती है और किसानों की आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण चिंता जैव-सुरक्षा और जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) फसलों से जुड़ी हुई है। अमेरिका GM फसलों का एक प्रमुख उत्पादक और निर्यातक है, जबकि भारत में इस विषय पर अभी भी सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाता है। व्यापार समझौते के तहत गैर-शुल्कीय बाधाओं को कम करने का दबाव भारत पर पड़ सकता है, जिससे GM उत्पादों के आयात की संभावना बढ़ सकती है। यह स्थिति देश की जैव-विविधता, पारंपरिक कृषि पद्धतियों और खाद्य सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक जोखिम उत्पन्न कर सकती है।
इसके अतिरिक्त, डेयरी, पोल्ट्री और तिलहन जैसे संवेदनशील क्षेत्र भी इस समझौते से प्रभावित हो सकते हैं। भारत का डेयरी क्षेत्र न केवल विश्व में अग्रणी है, बल्कि यह करोड़ों ग्रामीण परिवारों की आजीविका का आधार भी है। यदि अमेरिकी डेयरी उत्पाद भारतीय बाजार में प्रवेश करते हैं, तो स्थानीय उत्पादकों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। इसी प्रकार तिलहन क्षेत्र, जिसमें भारत आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयासरत है, सस्ते आयातों के कारण प्रभावित हो सकता है, जिससे घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन मिलने में बाधा उत्पन्न होगी।
इन आर्थिक चुनौतियों के साथ-साथ इस समझौते के सामाजिक और रणनीतिक आयाम भी महत्वपूर्ण हैं। कृषि क्षेत्र में संभावित आय हानि और प्रतिस्पर्धा से ग्रामीण रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जिससे सामाजिक असमानता और क्षेत्रीय विषमताएँ बढ़ सकती हैं। वहीं रणनीतिक दृष्टि से यह समझौता भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते सहयोग का प्रतीक है, जो QUAD और Indo-Pacific में शक्ति संतुलन के व्यापक परिप्रेक्ष्य से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में भारत के लिए इस समझौते को पूरी तरह अस्वीकार करना व्यवहारिक नहीं है, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
इस संदर्भ में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह वैश्विक आर्थिक अवसरों का लाभ उठाते हुए अपने कृषि हितों की रक्षा कैसे करे। इसके लिए बहु-स्तरीय रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। सबसे पहले, व्यापारिक सुरक्षा उपायों—जैसे मात्रा सीमाएँ (TRQ), न्यूनतम आयात मूल्य (MIP) और विशेष संरक्षण उपाय (SSM)—का प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिए, ताकि अचानक बढ़ते आयातों से घरेलू बाजार को सुरक्षित रखा जा सके।
दूसरे, घरेलू कृषि क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए संरचनात्मक सुधार आवश्यक हैं। इसमें कृषि उत्पादक संगठनों (FPOs) को बढ़ावा देना, आपूर्ति श्रृंखला को सुदृढ़ करना और प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन को प्रोत्साहित करना शामिल है। इससे भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी और किसान बेहतर मूल्य प्राप्त कर सकेंगे।
तीसरे, निर्यातोन्मुख कृषि नीति को मजबूत किया जाना चाहिए। भारत के पास मसाले, जैविक उत्पाद, बागवानी फसलें और पारंपरिक खाद्य उत्पादों में वैश्विक बाजार पर कब्जा करने की अपार संभावनाएँ हैं। यदि इन क्षेत्रों में गुणवत्ता मानकों, ब्रांडिंग और लॉजिस्टिक्स पर ध्यान दिया जाए, तो भारत न केवल व्यापार संतुलन बनाए रख सकता है, बल्कि उसे और सुदृढ़ भी कर सकता है।
चौथे, जैव-सुरक्षा और गुणवत्ता मानकों को लेकर स्पष्ट और सख्त नीति अपनाना आवश्यक है, ताकि देश की खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन से समझौता न हो। इसके साथ ही, तकनीकी नवाचारों को अपनाते हुए पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।
अंततः, यह समझौता केवल एक आर्थिक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की विकास यात्रा की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है। इसमें निहित अवसरों और जोखिमों के बीच संतुलन स्थापित करना ही इसकी सफलता की कुंजी होगा। भारत को “नेशन फर्स्ट” दृष्टिकोण अपनाते हुए ऐसी रणनीति विकसित करनी होगी, जो किसानों की सुरक्षा, खाद्य संप्रभुता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा—इन तीनों के बीच सामंजस्य स्थापित कर सके।
यदि भारत स्मार्ट और संवेदनशील नीति-निर्माण के माध्यम से इस संतुलन को साधने में सफल होता है, तो यह समझौता न केवल आर्थिक प्रगति का माध्यम बनेगा, बल्कि देश के करोड़ों किसानों के लिए स्थायी समृद्धि का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।

(डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं, संपर्क:उब्बा भवन, आर्यनगर हिसार (हरियाणा) – 125005 मोबाइल: 7015375570
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