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पटना:उम्र के साथ घटने की जगह बढ़ती ही जाती हैं लालसाएँ और आसक्तियाँ: डॉ सुलभ

कल्याणी कुसुम सिंह के लघुकथा-संग्रह ‘घटती ज़िंदगी:बढ़ती लालसाएँ’ पर हुई समीक्षा गोष्ठी और लघुकथा-पाठ।

RKTV NEWS/पटना(बिहार)20 सितंबर। भारतीय दर्शन कहता है कि मनुष्य को धीरे-धीरे अपनी लालसाओं, आकांक्षाओं और आसक्तियों को कम करते जाना चाहिए। जब संसार से विदा होने का समय आए तो, परमात्मा से मिलन के अतिरिक्त कोई कामना शेष न रहे। किंतु संसार की माया हमें आसक्ति छोड़ने नहीं देती। उम्र के साथ घटने की जगह यह और बढ़ती ही जाती है।

यह बातें बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में, विदुषी लेखिका डा कल्याणी कुसुम सिंह के लघुकथा-संग्रह ‘घटती ज़िंदगी: बढ़ती लालसाएँ’ पर आयोजित समीक्षा-सह-लघुकथा-गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए,सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि, कल्याणी जी विचार-संपदा और भाव-संपदा से अत्यंत समृद्ध और मनोवैज्ञानिक-दृष्टि रखनेवाली एक अत्यंत संवेदनशील कथाकार और कवयित्री हैं। इनकी लघुकथाएँ, देखन में छोटन लगै, घाव करै गम्भीर’ की तरह अत्यंत प्रभावकारी होती हैं।

संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए, पटना उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और लेखक न्यायमूर्त्ति मान्धाता सिंह ने कहा कि कल्याणी जी की लघकथाएँ पाठकों के मन को झकझोरती है। जो रचनाएँ मन तक पहुँचती हैं, वही सफल मानी जाती है।

मुख्य अतिथि और बिहार के विकास आयुक्त मिहिर कुमार सिंह ने कहा कि जीवन बहु-आयामी है। उसी प्रकार जीवन से जुड़ी कथाओं के भी आयाम अनेकों होते हैं। उन्होंने कहा कि यदि हम हिन्दी को बढ़ावा देनी चाहते हैं तो साहित्य सम्मेलन को चाहिए को वह सरकार से आग्रह करे कि संचिकाओं में टिप्पणियाँ हिन्दी में लिखी जाए। विश्व-साहित्य का हिन्दी में अनुवाद होना भी इसके उन्नयन में सहायक हो सकता है।

आरम्भ में अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन के साहित्य मंत्री भगवती प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि कल्याणी जी की लेखनी नारी-जगत को समर्पित रही है। इनकी अधिकांश लघुकथाएँ मानक पर खरी उतरती हैं। अनेक लघुकथाएँ कथाओं का स्वाद भी देती हैं। इन्हें डा सतीश राज पुष्करणा से प्रेरणा प्राप्त हुई। इसलिए स्वाभाविक रूप से इन्होंने पुष्करणा जी की लघुकथाओं पर सारगर्भित समीक्षात्मक पुस्तक लिखी है। डा शंकर प्रसाद, डा रत्नेश्वर सिंह, डा सुमेधा पाठक, बच्चा ठाकुर, डा पुष्पा जमुआर तथा डा पूनम आनन्द ने भी पुस्तक पर अपने विचार प्रकट किए।

इस अवसर पर आयोजित लघुकथा-गोष्ठी में चित्तरंजन भारती ने ‘नवीनता’, सरिता कुमारी ने ‘मदद’, शमा कौसर ‘शमा’, सदानंद प्रसाद ने “फ़र्ज़”. ईं अशोक कुमार ने ‘चोट’, डा मनोज गोवर्धनपुरी ने ‘हाल-चाल’, इन्दुभूषण सहाय ने ‘अधूरी’, सूर्य प्रकाश उपाध्याय ने ‘मिट्टी की गंध’, रंजना सिंह ने “मदद”, डा शंकर प्रसाद ने ‘सबक़’, डा सुमेधा पाठक ने ‘आश्चर्य’, डा पूनम आनन्द ने ‘साहस’ तथा डा पुष्पा जमुआर ने ‘छँटता गया’ से शीर्षक से अपनी लघकथाओं के पाठ किए। मंच का संचालन ब्रह्मानन्द पाण्डेय ने तथा धन्यवाद ज्ञापन कृष्णरंजन सिंह ने किया।

इस अवसर पर, सम्मेलन के भवन-अभिरक्षक प्रवीर कुमार पंकज, डा शालिनी पाण्डेय, सदानन्द प्रसाद, शंभुनाथ पाण्डेय, डा एम एच खान, डा विनय कुमार सिन्हा, कुमारी क्रांति, भारती सिंह, अनुराधा सिंह, श्याम मनोहर मिश्र, डा कुन्दन लोहानी आदि सुधीजन उपस्थित थे।

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