
भोपाल/मध्यप्रदेश (मनोज कुमार प्रसाद)20 सितंबर।हिंदी भवन में शनिवार को ‘वरिष्ठ विमर्श’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मध्यप्रदेश शासन के पूर्व मुख्य सचिव श्री सेठी ने की। मुख्य अतिथि पूर्व सांसद एवं मानस प्रतिष्ठान के निदेशक रघुनंदन शर्मा रहे। साहित्य अकादमी के निदेशक एवं हिंदी भवन के मंत्री-संचालक विकास दवे सहित अनेक साहित्यकार एवं साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। विमर्श का विषय ‘हमारी राष्ट्रभाषा की दृष्टि क्या होना चाहिए’ था।
विमर्श में अपने विचार रखते हुए गोकुल सोनी ने कहा कि आज विश्व में हिंदी समझने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जो अत्यंत उत्साहजनक है। आवश्यकता है कि हिंदी को विश्व की संपर्क भाषा बनाने के लिए व्यक्तिगत, सामूहिक, संस्थागत और सरकारी स्तर पर निरंतर प्रयास किए जाएं। उन्होंने कहा कि वर्तमान में अंग्रेजी विश्व की प्रमुख संपर्क भाषा है, लेकिन चीन, इजरायल, इंडोनेशिया, वियतनाम, तुर्की और फ्रांस जैसे देशों ने स्वतंत्रता के बाद अपनी भाषाओं को प्राथमिकता देकर उन्हें मजबूत बनाया।
सोनी ने कहा कि भारत में राष्ट्रभाषा की चर्चा करते समय यह तथ्य ध्यान में रखना चाहिए कि संविधान ने किसी भाषा को ‘राष्ट्रभाषा’ घोषित नहीं किया है। हिंदी को संघ की राजभाषा का दर्जा प्राप्त है और संविधान की आठवीं अनुसूची में अनेक भारतीय भाषाओं को स्थान दिया गया है। इसलिए हिंदी के विकास की दृष्टि ऐसी होनी चाहिए कि वह देश में सशक्त संपर्क एवं संवाद की भाषा बने, लेकिन अन्य भारतीय भाषाओं के महत्व को कम किए बिना।
उन्होंने कहा कि हिंदी का विकास तमिल, तेलुगु, बंगाली, मराठी, गुजराती, पंजाबी, कन्नड़, मलयालम, असमिया, उड़िया सहित अन्य भारतीय भाषाओं के विरोध में नहीं, बल्कि उनके साथ होना चाहिए। हिंदी को सरल और जनसुलभ बनाने के लिए अनावश्यक कठिन, कृत्रिम और अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ शब्दावली से बचते हुए ऐसी भाषा के प्रयोग पर जोर देना चाहिए, जिसे सामान्य व्यक्ति सहजता से समझ सके।
गोकुल सोनी ने कहा कि हिंदी को केवल साहित्य और भावनाओं की भाषा तक सीमित रखने के बजाय ज्ञान-विज्ञान, उच्च शिक्षा, तकनीक, कानून, प्रशासन, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट, व्यवसाय और रोजगार से जोड़ना आवश्यक है। हिंदी में गुणवत्तापूर्ण ज्ञान सामग्री उपलब्ध कराने के साथ युवाओं के लिए हिंदी को रोजगार और तकनीक के अवसरों से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि अंग्रेजी का ज्ञान उपयोगी है और हिंदी के विकास का अर्थ अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा का विरोध करना नहीं है। उद्देश्य यह होना चाहिए कि भारतीय भाषाओं में भी समान रूप से ज्ञान और अवसर उपलब्ध हों। उन्होंने कहा कि भाषा के साथ संस्कार और स्वाभिमान की अभिव्यक्ति के लिए हिंदी का सम्मान केवल हिंदी दिवस तक सीमित न रहे, बल्कि दैनिक व्यवहार, कार्यालय, शिक्षा, साहित्य और सार्वजनिक जीवन में हिंदी के स्वाभाविक प्रयोग की संस्कृति विकसित हो।
उन्होंने अपने वक्तव्य का सार प्रस्तुत करते हुए कहा— “हिंदी का सम्मान हो, भारतीय भाषाओं का संरक्षण हो और प्रत्येक भाषा को विकसित होने का समान अवसर मिले, यही भारत की भाषायी दृष्टि होनी चाहिए।”
