इन्द्र कर्ण सोपान
दान के बल पर जीवन दौड़त चली,
तेल जतने देरी तक रही, ज्योति देर तक जली।
रो-गा के चाहे जतना दीही दान,
घमंडे अइसन देला के, त्याग लेला ऊ मान।
अइसन त्याग ना दान कहाला,
दान त नित दिन झरत रहेला।
फल देला तरुवर जब आपन,
दीहल ना ह किरपा उनकर।
मत टपके डाली से पाकल फल,
का संभव बा रही गाँछ के ऊपर।
मौसम पर फल पाकी आ गिरी,
रुकला पर जायी ऊ सड़,
जवन चीज के दिहल चाही, ना
ओकरा पर लालच चाहीं।
लालच मन के मारेला,
बिन मऊअत के ऊ मारेला।
तरुवर भीतर मत मंगरा लागस,
एही से तरू फल देबे लागस।
फल देला से डाल गोटाये लागी,
नयका फल कोढि आये लागी।
बदरी के पेट जब अघाइल रही,
जल बंटला से नदी बहत रही।
बादल बरसायी पानी, नदी भर जाई,
असहीं नयका सिलसिला बन जाई।
स्वारथ छोड़ेवाला के साथे दुनिया होला,
प्यार के धागा से गांथल होला।
जे जतने ही अधिका दीहें,
भरल भंडार से ओतने अधिका पइहें।
जे जतने किरपिन हो इहें,
ऊ अपने धोखा खाइहें।
दान में जतने होई को ताही,
आपन गगरी खालिये रहिहें।
वृत के संकल्प के पूर्णाहुति,
इदम् न मम् स्वाहा से होला।
तर्पण, अर्पण, आरती समर्पण,
जे करत अन्त तक ना रोवेला,
उनके इच्छा पूरा होला,
जीवन के आत्मा से तब मिलन होला।
छोड़ स्वारथ जे जीवन गगरी भरी,
काल गाल में जइलो पर ना मरी।
जाँवा दिअरी जलत हो खी,
जाँवा अंजोर छवले होखी,
उहवाँ केहू बाती उकसावत हो खी,
दिअरी में आपन सनेह जलावत होखी।
प्यारी पुनीत संगिनी सीता के छोड़,
राम, व्रत के मोल चुकवलन;
देलन हाड़ दधीची, शिवी देह
कतर के देलन,
साँच पर खाड़ हरिश्चन्द्र,
शैव्या के आचरा फड़वइलन।
शूली चढ़ दुनिया खातिर ईसा प्राण गंवइलन,
सीना पर गोली खा गाँधी, हे राम-राम कहलन।
सरमद हँसते देह के चमड़ा, खुद ही त छिलवइलन,
विष के प्याला सुकरात खुशी से, अपने गला उतरलन।
स्वारथ छोड़ेवाला के साथे दुनिया होला,
किस्मत के ओरहन मनसूर ना सुनलन,
बोटी-बोटी दे दिहलन।
दिहलन दान प्रकृति धरम ह असली,
नाहक लोग डरेला;
अंतिम समय कुछ ना रह जाला,
सब के सब छोड़ देबे के होला।
अवसर अइला पर जे सब कुछ देला,
ऊहे बस बाँचल रह जाला;
मौसम के जे ना पहचनले
दिहलो बाद रोजे मर जाला।
दानी अइसन वीर कर्ण सा,
ना केहू भी शानी भइल,
पुण्य कमाइल दान दिहला से,
अरसा से मन में रहे धराइल।
सूरज माँगे के जल ढारत बेरि,
खातिर जे भी अइलन;
जे जतना मुँहवा से मांगल,
झटके ओतने कर्ण से पइलन।
यश के धपधप झंडा सगरो,
खुलल हवा में उनकर फहरत;
अइसने नाम ह कर्ण,
जे कर दान के महिमा लहरत।
बड़को से बड़ ज्ञानी शीश झुकावस,
उनका नाम के आगे;
हरदम भजत रहे दुनिया,
ई हवन भाग्य जे बा अभागे।
पुण्य के तनिका फाँकी से,
कर्ण पर किस्मत छिप के चोट कइले;
लोग कहेलन एक बार समर से दूर,
भाग्य कर्ण से युद्ध के कइलें।
दान कसौटी व्रत के होला,
देहिया चढ़ल कसौटी पर अबकी;
बड़हन दान वसूले खातिर,
किस्मत काया धर आइल अबकी।
चांदी के सूरज एक दिन,
जब सोना के रूप बनावत रहलें;
कर्ण, खड़ा गंगतीर पर,
नयन के सुख बाँटत रहलें।
आधा देह पानी में कइले,
धइले ध्यान मंगन में रहलें,
सोना के पहाड़ आधा डुबकावल,
ओसहीं ऊहो चमकत रहलें।
तिसर पहर नदी के पानी,
चाँदी थाल परोसाइल मुस्कात रहे;
छुवत तीर-नीर कवच-कुण्डल के,
खुद सोना अइसन बन जात रहे।
भींगल बदन किरण के पड़ते,
लागे खिलल कमल जल बीच उठल हो;
जल बूँद नेहाइल तन पर जब लुढ़के,
लागे केला पत्ता पर पारा चमकत हो।
केश सँवारला अस झुरमुट से,
पंछी नदी तीर पर चहकत रहन;
पूजा के धूप, दीप, कर्पूर, फूल,
सब मिल के बस महकत रहन।
पूरा भइल जब पूजा-ध्यान,
कर्ण आपन नयन के खोललन;
नदी तीर पर अतने में,
खर-पाँत कहीं से डोललन।
होई केहू जब जनलन कहलन,
के हवऽ सामने आवऽ हे भाई;
भल सामने बानी हम सोझहीं,
आपन हुकुम सुनावऽ हे भाई।
कवन दुख बा तोहरा अब कहऽ,
कर्ण त सब केहू के सेवक हवन;
ई दुखियन के साथी हवन,
हरदम तैयार इ सेवक हवन।
मंगबऽ त मांग ल कवनो दान
अन्न, धन, धाम, बसन दे दीहीं;
का आपन दीहीं राज्य ?
कि क्षण भंगुर जीवन के दीहीं।
सागर बिन देले लौटावे,
बदरी बिन देले जाय मुँह लटकवले;
पर नाहिं भिखारी लौटे पइहें,
कर्ण से बिना ही कुछ पवले।
पर पीड़ा के हरण करन में,
हम आपन सुखवा के जनली;
किस्मत के मारल जिनगी में
ई छोड़ दोसर स्वाद ना जनलीं।
हिस्सा तोहर तोहरा के दे के,
आवऽ आपन करज उतारीं;
तोहरे राखल जे भंडार भरल बा,
आवऽ दीहीं राज सब भारी।
ईहवाँ ना केहू कुछवो मांगेला,
ना केहू भी कुछवो देला;
जेकर बा अधिकार जवन,
ओकरा बस ओतने मिलेला।
हाथ पसार के कबहूँ तुहू,
हमरा से जवने भी लेबऽ;
अघाइल हिरदा से दे आशिष,
कवन चीज ना तुहू देबऽ।
निरधन के होला संतोष,
फटल किस्मत वाला के होला बोली;
आभार से जे छलके अंसूवन के बूँद,
बिन कहले कह जाये बोली।
सुखल मुरझाइल होठ पर,
तब हरियाली पसरे लागी।
का केहू पायी एह से बड़का,
जवना पर अभिमान करी;
मउवत मिललो ठीके लागी,
जे केहू के जिन्दा करी।
भाव मोलाई बिन कइले
जवने लागे नीक माँगी अबहीं;
सब केहू के आइल बानी देत,
मुँह खोलल जे जबहीं।
आवेवाला अचरज में पड़ले सुनते,
बुझते मन चकराये लागल;
एगो विप्र हटावत फरियावत,
लता बीच से कर्ण के सोझा जागल।
जय कहते कह गोइलें,
तोहरे यश के सुनले बानी लाम कहानी;
तीनों लोक में बढ़के के तोहरा अस,
नइखे केहू कतहूँ आज दानी।
जवने भी जे मांगल जबहीं,
ऊना खाली हाथे लवटल;
प्रण टूट ना पावे चाहे,
एक से एक दुख के कटलन।
माँग मिले के आश्वासन से डर छुटेला,
नाहिं कि मिललके बड़का सुख देला;
जइसन कथनी करनी ओइसन,
कर्ण के इहे दुनिया जाने ला।
जवन ठनलऽ ओही के मनलऽ,
तोहरा के लोग ठेहा मानेला;
शिवि, दधीचि, प्रहलाद कोटि में;
दुनिया तोहरा के गिनेला।
जाने ला सब लोग इहे कि,
मरहूँ से कर्ण ना कवो डरेलें;
प्रण पालेलें देके प्राण,
तबहू हँसते ही रहेलें।
अइसन होवला पर देवेलोक से,
जादे मानव लोक पुजाई;
सरगो माँगे भीख कवनो दिन,
धरती पर एक दिन आ जाई।
लेकिन के केकरा से कतना पायी,
जे भी किस्मत वाला होला;
पूरा हिसाब लोगन के लिलार,
बस बढ़िया से लिखल होला।
चूँकिया भरी त खुश होई,
कुँआ से भरपेट ले लिहलीं;
पर सागर में डुबला पर
ऊना तनिको बेसी पवली।
बड़का भीरी ढेरका होई,
एह जनला से का बा मतलब?
भाग्य में लिखल जे होई,
बड़ अभिलाषा से का बा मतलब?
कहलन कर्ण कि नाहक में,
भाग्य के भूत भयावन काहे लागे ?
सोझहीं में खाड़ जे बाड़े,
ऊहो भूलवावन काहे लागे?
का टंकलन किस्मत में ब्रह्मा,
एकरा के खूबे जानत बानी;
भाग्य से त बड़का बल,
बाँह में होला जानत बानी।
विधि के लिखल पलटल जाला,
मेहनत उत्योग के बल पर,
साहस रहला पर किस्मत के डोरी,
टूटेला अपने ही बल पर।
ऊँच मनोरथ ऊँचका झंडा जेकर,
बल के डंडा पर फहरत होखे;
रोजे-रोज जगावे खोदत,
हरदम धकिअवले बढ़त होखे।
जेकर नजरिया ठाँवे होखी,
ओकरा राह ना दूर के सूझी;
तनिका भर जे मांगी,
अधिका मिली ऊ का बूझी।
छोड़ी अब ई चरचा,
बोलीं का लिहल चाहीं ला;
जवने माँगव सच ही में
ऊहे हम दिहल चाहीं ला।
चाहे डगमग डोले धरती,
सूरज लोक के चाहे देवता डोलें;
समर पड़ला पर चाहे कबहूँ,
वीरन के मनवा तक डोले।
पर्वत्त के चाहे जड़ डोले, ;
चाहे ध्रुवतारा तक डोले
जे ना डोले ऊहो डोले,
कर्ण बचन कबहूँ ना डोले।
जाँच परख के दाता के,
अधम भिखारी मुँहवा खोललें;
दाता बड़ ना दोसर केहू बा,
जय-जय राधा सूत के बोललें।
अइसन बानी दाता तब त,
माँगे वाला ई बात कहत बा;
महाराज जे मुँह से बोलब,
सगरो पूरा होत दिखत बा।
जवने कुछ बोललीं महाराज,
सुनते हमरा सबे मिल गोइल;
चलिओ जाइब बिन लेले,
तबहूँ सुख भरपेट भेंटाइल।
डर लागत बा माँगे में हमरा,
जवन मन में रखले बानी;
दोसरा लोग के सोंच-सोंच के,
अबहूँ दुविधा में पड़ल बानी।
मँगलीं ओइसन चीज जे कबहुँ,
आ रउवा देबे ना सकलीं;
ना मिलला पर हम त कसहूँ,
आपन अरमान भुलाइब ।
लेकिन राउर कीर्त्ति के धवल चाँद पर,
कालिख त पुत जाई;
यश के धवल चाँद दुनिया के,
फिर दोसर कहाँ भेटाई?
तेज पुरूष के आफत में डालल
ई का अच्छा होला ?
का उत्तर देब दुनिया के,
कहीं प्रण राउर जे डोलल।
हमरे गरिअइहन लोग कि
पुण्य भुवन के ईहे लुटलन;
कबहूँ ना टूटल प्रण महाराज के,
हमरे से ऊ टूटलन।
हमरा के अब लौटे दीहीं,
बड़ा खुशी से आपस जाइब;
अजबे बानी रउवा,
बोललन राधा सुत, काहे जाइब।
का कवनो देव, यक्ष, प्रभु के
माया रूप में आइल बानी ?
हमरा नाहिं बुझाता,
रउवा नर हई कि नारायण बानी।
अइसन कवन चीज ऊ होई,
जे हमरा से रउवा मांगब;
ऊहो मिली ना काहे,
काहे आशा अभिलाषा के तोड़ब।
चाहब त खेत खलिहान,
मकान, गाय तक दे देब;
चाहब रउवा त सिर काट के,
चरण चढ़ा रखख देब।
रउवा यदि चाहब कि हम,
जिअते पीछे – पीछे चलीं;
चाहब त चलबो हम करब,
पीड़ा मत होवे विप्र के रहस भली।
कहला पर त चलबे करब,
झोला ढोवे हम राउर;
चाहला पर जिनगी भर,
धोवत रहब गोड़ हम राउर।
वादा लेके चीज ना माँगल,
ई दे बड़का अचरज बा;
ना सकिहें राधा सुत,
धरती पर अइसन का बा?
माँगी, माँगी विप्र देव,
लाज छोड़ मन चाहा मांगी;
ना नुकुर बिन कइले देब,
काहे अपयश के होखब हम भागी?
प्रण कर्ण के सुनते ठिठकल मन,
विप्र के लागल मनवा डोले;
लाजे मुँह नीचे लटकइले,
साहस बटोरत ऊहो बोललें।
भरे खातिर आपन घर
धन लेबे हम नइखीं आइल;
ना अंग देश के राजा के,
दास बनावे बानी आइल।
अइसन सब कुछ धन ना चाहीं.
भगवान धरम बचवले राखस;
देले चाहत बानी महाराज त,
कवच-कुण्डल दे दीहीं बस।
सुनते कवच-कुण्डल के
कर्ण के लागल बिजली के झटका;
छीपल राज बा एहु माँगे में,
सोचते मन तनिका सा खटका।
बुझलीं अबके रउवा ना दोसर,
बस देवन के राजा हई;
हमरा तप के सफल बनावे,
आके खुशी से गति डालत हई।
बड़ा भाग्य बा हमरो की,
रउवा के खींच धरती पर ले आइल;
लागत बा कि सरगो आज,
माँगे भीख धरती पर आइल।
माफ करब ई राज ना हमरा,
झटके समझ में आइल;
चोरन अस दबले पाँव जे अइलीं
एही से हमरा पहचान ना भइल।
रउवा होखब गरीब ब्राह्मण जान,
धन, धरती, घर देबे के बोललीं;
जनतीं देवराज ही होखाब,
देबे खातिर, कुछ भी का बोलती?
सूंधे में माहिर जे होखखे,
धरती से भीख का ऊहो लीही ?
नभ में जेकर घर होखखे,
ओकरा के केहू का दीही?
तबहूँ जब देवराज बनला पर,
भीखमंगा अस हाथ पसरले होखे;
बड़ा सुयोग बा ईहो,
चाहे ऊ अपराध काहे ना होखे।
दिहब दान में ऊहे जवन,
रउवा मंगले अबहीं जे बानी;
शिवि दधीचि रेखा ना तूड़ब,
ना अपराध के बनब भागी।
एगो बात बतलाई लेकिन,
रक्षा कवच हमरा से काहे लेनी ?
कवच-कुण्डल के लेनी,
बाकिर जान काहे ना लेनी ?
एहसे का कि अर्जुन के जीव बांचल रहे,
रउवा भी सुख काटीं,
मत उनकर सोइलार तीर,
हमरा देही टकरा के टूटे।
ओने केशव करस रखवाली,
पार्थ के बहुत योग से करके;
एने हमरा लड़ परे,
बिना कवच-कुण्डल के देह से।
सोचीं तनिका वीरन के समर भूमि में,
अइसने लड़ल का शोभा देला?
छुछका वीर पर बाण मार के,
अमर बनल का शोभा देला।
पाँख उखाड़ के एक बाज के,
दोसर के डर छोड़ावल का अच्छा होला ?
कवनो देव के ही लागी नीक,
पुरुषन खातिर ना अच्छा होला।
ई त जइसे अठगोड़वा पर चढ़के,
केहू बने शिकारी जइसे,
जहर घोल मार मृगपति के,
छाती पर केहू कूदे जइसे।
डर के मारे रण के छेड़ी?
ई साफ लउकत बा;
घटा-टोप, जीत के घुमड़ल होखे,
तबहीं शत्रु के शोभा देला।
हे देव, ना पछाड़ पाइब जेकरा के,
आपन बाहीं के बल से;
कबहू का अच्छा होई,
ओकरा के मारी छल से।
जीत-हार का होला,
वीर समर के बीच चिंन्हाला;
साँच राह पर हारला पर,
ना कबहुँ ऊ हारे ला।
ढेर व्याकुल होखास अर्जुन,
कि बिन लड़ले जीत जाई;
बहुत आसान तरीका बा जीत के,
कहलन कर्ण समुझाई।
रउवा कहब पार्थ से कि कर्ण के,
मूर्ती मोम एक ऊहो बनावस;
बिन मेहनत के काट ओकरा के,
कर्ण जयी कहलावस।
कवनो उपाय ना दोसर बडुवे,
जवना से रण ऊहो जीतस;
कर्ण पीठ धूर लगावे के आसरा में,
मत मन के ऊहो तड़पावस।
जूझ के जीतस युद्ध हमेशा,
वीर बस बाँही के बल से;
के जामल बा दोसर,
जेकर रक्षा होत रहे कवच-कुण्डल से।
रहे ना भेद हमरा दोसरा में कवच कुण्डल से,
अब ई अपवाद हटावत बानी;
छोड़ कवच-कुण्डल देह से,
दोसरा अस अभी बनावत बानी।
अच्छा कइली काममांग के,
हमरा के एक बराबर कइली;
देव दिहल छिलकोइयाँ हटवा के
, हमरा के मानव अस कइलीं।
कइसे कही अब दुनिया कि,
कर्ण में आपन ना देवत बल रहे;
जीतलो पर ना कह पइहें कि,
कर्ण पास कवच-कुण्डल भी रहे।
महाराज कब-कब ना किस्मत,
अपमान हमरो कइलख
दुख के गड़हा में कब ना ऊहो,
हमरा के खड़े ढकेललख।
जनम भइल भल कहँवा,
सूत कुल में पाल पोसइलीं;
ऊँच होखे के छट-पटी ना फलल,
रोजे-रोज अनादर पवलीं।
बुझ के सूत पुत, द्रोण देव देलन निकाल,
होके निराश, बन भृगुपति के पासे गइलीं;
परशुराम के पुरहर सेवा कइलीं,
पर बदला मे शाप भयानक पवलीं।
ईहो देखीं जवने दान के कारण से,
अबतक हम जग मे नाम कमइलीं;
ऊहे बाधा बन विजय राह में
आज खड़ा बा ईहे पवलीं।
का ब्रह्मा के हमरा के,
छले में अच्छा लागत रहे ?
दान के हवनो करी हमहीं ओही
यज्ञ-आग में जलत भी रहीं?
जहाँ सब लोग प्यार के छाया में बास करेला,
एक से एक सुगमता पावेला;
ऊहे किस्मत हमरा पासे रोज,
कवन-कवन ना दुख भेजेला।
एहू में का कवनो राज छिपल बा,
ईहे मन में हम सोचत रहींला;
काहे हमरे राह में बाधा विपदा,
ढूंढ-ढूंढ़ के घेरत रहेला।
कइसे जाई कहल कि फल,
पूर्व जनम के पापन के मिलत बा;
ई हो इत तब फिर कइसे,
विधि से कवच-कुण्डल मिलल बा।
विधि के माया बड़ा जटिल बा,
समझ ना तनिको आवत बा;
दान में वीर, रवि अंश कवच के रहते,
तबहूँ सूत पुत भाग्य दोष मिलल बा।
व्रत भी कइली बहुते पर,
सिद्धि के फले कहवाँ मिलल ?
दया, दान के धरम कइला पर,
उल्टा परिणाम ही मिलल।
जसहीं जमलीं गंगा में दहलीं,
पर गंगा जल पीये ना पवलीं;
फिकिर छोड़ सत् करम में लगलीं,
ना बढ़िया से तबहूँ जीयलीं।
नाहिं पता ब्रह्मा कवना मन,
हमरा माटी के गढ़लन,
बल ठूस-ठूंस के भरलन,
करूणा, धीरज दूनो भरलन।
देवता अस सब गुणवो देलन,
ना मालूम का काम करे के ?
धरती पर भेजलन लागत बा,
खाली बाधा से लड़े के।
कहे में संकोच ना बडुवे,
बेमतलब ना राधा घर अइलीं;
दुनिया के भल होवे,
ईहे संदेश देबे हम अइलीं।
मानव के नयका पाठ सिखावे,
अकस्मात लागत बा आवे के होला;
जय जीवन में पावे खातिर,
कुछ करतब दिखलावे के होला।
करतब बस ऊहे होला कि,
वीर चाही जे करके दिखालयी;
भाग्य में चाहे जवन होखे,
अपना बल से सबके धूल चटायी।
शक्ति ऊ करतब ह,
जे केकरो कुल वंश में गिरवी ना होला;
शक्ति करे बसेड़ पास में ओकरा,
जेकर छाती शेर अस चौड़ा होला।
चाहे दुनिया दुश्मन बन जाय,
धरम धोखा दे, पुण्य आग बरसाय;
फिर भी जे सत्य पथ से ना डोले,
करतब बल से ढकेल अंधड़ के टाले।
लोहा लागला पर मारी या मर जायी,
एकर नाम ह करतब।
ना खाली जीत पावे खातिर,
कुराह पर पाँव रखल ह करतब।
साँच राह पर सिर कटवावे पड़े,
ऊहे ह असली करतब;
नाहिं कि जीत के टीका खातिर,
कालिख हाथ लगावल ह करतब।
छल प्रपंच निज लाभ के खातिर,
ना कुछुवो हम रखाले बानी;
देवराज हम उनके खातिर,
एक आदर्श बनल बानी।
अपना बाँही के बल छोड़ के,
ना दोसर आसरा बा जेकर,
धरम पर रहस अटल, लोभ
खातिर ना छल पास में जेकर।
उनके हम दर्पण हई,
जेकर कुल गौरव छीन गोइल होई;
नीच कुल के जामल कह के,
जेकरा पर जग थूकत होई।
नाहक चीज जान जेकरा
समाज आग में खोरत होई;
फिर भी काँटा भरल राह पर;
हिम्मत से पाँव धरत होई।
हम उनकर आदर्श जे आपन,
दुख के गठरी ना खोलत होई;
नाम पिता के पुछला पर,
जे ना कबहुँ बोलत होई।
मन में मौज के लहर रहे,
पर हरदम जे रोवते होई।
उनके आदर्श हम बानी,
अतनो पर ना तनिका धबड़ाये;
अपना करनी के बल से,
जे समाज के पगड़ी पाये।
धरम करम के खातिर जे,
धन-धाम लुटावे ठनले होई;
सिंहासन ही नाहीं,
सरगो उनका आगे माथ टेकाई।
मेहनत से जे मुँह ना मोड़ी,
दुख अइला पर तनिको ना डरी,
गठजोड़ पाप से कबहुँ जे,
सुख खातिर रचिको ना करी।
कुर्बानी से जे मुँह ना मोड़ी,
ऊहे कर्ण धरम के जानी;
जवन तेज से धधकत जीये,
मरहूँ में जे ओतने शानी।
भुजबल के खाली आसरा बा,
ना कवनो दोसर सहारा बा,
बस एक सहारा कवच-कुण्डल रहे,
ऊहे सब कुछ सारा रहे।
आज नाता कवछ कुण्डल से
बस इहो छोड़ रहल हम बानी;
देवराज खुशी-खुशी ले लीहीं;
महादान अब देत हम बानी।
जय चाहीं त जीवन दीहीं,
ई हे चाल बढ़िया हउवे;
विजय दान केहू कइसे दीहें,
जे जान के खखनत हउवे।
प्राण केवल अब बाचल बा,
दे कवच-कुण्डल प्रण पुरावत बानी;
प्रण के पूर्णाहुति के बेरिया
आज विजय हवन चढ़ावत बानी।
हे देवराज जीवन में बढ़कर,
दोसर ना कवनो दान होई;
कवच उतार दान देला से बड़ ना,
दोसर कवनो दान होई।
जायीं जाके अर्जुन से कह दी,
कि बिना काम गोइल ना रहीं;
तोहरा खातिर कर्ण से आज,
विजय माँग बेटा ले आइल बानी।
लेकिन रउवा से हथजोड़ी बडुवे;
जब लौट के जग में जाइब,
ब्रहमा से जाके रउवा,
सब साँचे बात बताइब।
धरती पर जवना खातिर हर लोगन में,
अतहत मचल हलचल बा,
कुरुक्षेत्र में अबहीं तक,
रचिको नाहिं रण छिड़ल बा।
कहब जाके कि कर्ण, अर्जुन,
कर लेलन आपस में सुलहा;
राधा सुत के जीत भइल,
अर्जुन के मिलल हार के पगहा।
अतना कहते कहत कर्ण,
देह के चमड़ी छिललन क्षण में,
खड़ग से देह से उतार कवच-कुण्डल
, रख देलन इन्द्र के कर में।
झुरमुट के पंछी सब डरलें,
अचके चह-चह कर उठलन;
ठमक गोइल सब दिशा देखते,
डरवावन दृश्य जे घटलन।
सदमा सहे ना पवलन सूरज,
बदरी में छिपलन सुत के हालत देखते;
साधु-साधु मात्र शब्द घहराये लागल,
अम्बर से अनगिनते ।
देवराज के मुँहवा पड़ले काला,
आत्म ग्लानि जब बुझले
आपन कुकर्म त एक तरफ,
कर्ण के करतब, जब बुझलें।
खून से लथ-पथ कवच थामते,
चिन्ता में डूबे ऊ लगलें;
ठमका मार गइल इन्द्र के,
जड़वत ठग अइसन ही भइलें।
आपन कइल पाप माथ चढ़,
जव मानव के बोले ला;
साँचे तब दहकत आँच में,
आपन प्राण के भूजेला।
बड़ा घमंड में आइल रहन इन्द्र,
सीधवा जान के नर के छले;
सोचले तक ना रहन कि,
त्याग के तपल आग में लागब जले।
बाकिर कर्ण के बलि के बाण,
इन्द्र के हिरदा के जब बेधलख;
हो गइलन अचेत कंठ ना खूलल,
डूबल रहलन बेसुध मुँह बवले।
जब आइल कुछ होश इन्द्र के,
माथ झुकावत बोलल चहलन;
का बोलस कुछ समझ ना पावस,
जवन पाप ऊ कइलन।
सम्हरत बोललन, हे सुत,
साँचे छली इन्द्र के तू पहचनलऽ;
लेकिन देवताई गोइल भूलाय,
विनती करते ऊ बोललन।
देख भी लेनी सबकुछ
जवन ना कबहूँ देखले रहीं धरती पर;
आज वजन में धरती बडुवे भारी,
सरग के डंडी टंगल बा ऊपर।
कइसे आज जगायी अपना के,
डोल रहल बा प्राण, जीभ काँपत बा;
का कहके माफी भी माँगी,
ओइसन शब्दों ना मिलत बा।
कर्ण पुण्य भरल आपन गोड़ के धूर धरे द
ईहे गति बा आज हमार;
पहिले त होश उड़ले रहे,
अब अकिल चकोह में बा हमार।
हम ना जानत रही की छल-छद्द्म,
अतना जानलेवा होई;
कवच-कुण्डल के दान लेल,
हिरदा के खंडे-खंड कर जाई।
मन में पाप जे बइठल रहे,
ओकरे धुँआ से उजबुज भइली;
चोख तीर से छेदलीं का तोहरा,
ओकरे पलट से घायल भइलीं।
तोहरे चमक के सोझा में आज,
हमहूं कुम्हलाइल बानी
हे कर्ण, तोहरा आगे आज,
हम बड़का नीच बनल बानी।
आपन नीचतई से अतना,
पहिले चूभन ना भइल रहे;
उत्तम बाड़ ऽ हे दानी कर्ण,
तोहरो चमक के छाया हमरा से बढ़िया बा।
जइसे धारा के बेग में तिनका,
डूबत उतरात बहत चल जाय;
सागर गहरा कतना होई,
तिनका जाने ना, बस बहत जाय
तिनका अइसन मन भरमत बा,
कवनो कगार ना मिलत बा;
जाँच पूरा हो गोइल बा,
साँचे नर जीत गोइल, सुर हारल बा।
शंका सुवहा नइखे पुत्र मोह में पड़ के,
छल करहीं हम आइल रहीं;
जानहिं में अनजान बन के,
कवच-कुण्डल लेवे हम आइल रहीं।
छल कइलीं जग जाहीर भइल,
कइसे केकरा के मुँह दिखाइब;
बन के ब्राह्मण त आइल रहीं,
चोर बन के कइसे वापस जाइब।
तू स्तुति के लायक कर्ण,
सूरज अस तेज तोहार जब देखलीं;
देवताई भरल हमारो मन,
तोहरा देखते काँप रहल बा।
देखहीं में डर लागत रहे,
अब त आउर, डरे घबड़ाता;
कसल जात बा हिरदा अपने आप
मरला अस प्राण बाहर आवत बा।
धवल बेदाग अचल तेज के,
पर्वत्त अस तू लउकत बाड़ ऽ;
लागत बाड़ ऽ कर्ण कि जइसे
अरबों जनम के महापुण्य फैलवले बाड़ऽ।
जइसे योगी जन के तेजई के सीमा,
ना कवनो ओर छोर के होला;
सब तेजई के गठरी बन्हले,
मिल एके रूप तोहरा में बा।
अइसन लागत बा सृष्टी कर्त्ता
अम्बर में तोहरे पीछा खाड़ होखस;
खिलल अंजोरिया में अंकवारी बन्हले,
बड़ा प्यार प्रभु देत होखस।
योग, यज्ञ, तप, दान, धरम,
व्रत के साधन जतना बाड़;
एक-एक बन खुद प्रकाश,
तोहरा के चारों ओर घेरले बाड़ें।
अपना गोदी पा तोहरा के धरती,
गौरव से महकत बाड़ी;
तोहरे माथ के सूंघत धरती,
आपन बेटा अस जानत बाड़ी।
ई कर्ण अनगिनत पुत्रन के,
दुख सूरज नाश करे वाला हवन;
के सुत ना कर्ण,
दुखियारी धरती के बेटा हवन।
जतने तू दानी, पाप से धोवल,
ओतने हम कपटी, झूठा,
पापी बानी; तू-कवच-कुण्डल दान कर सुख में बाड़ऽ,
हम लेकर दुख काटत बानी।
जतना ऊँचा पहुँचल बाड़ऽ कर्ण,
देवता ना पइहें ओतना ऊँच;
अइसन बड़ आसन पर,
कवनो मानव पइहें पहुँच।
कर्ण के अइसन दानी रूप,
ना देखले जाता, ना सहले जाता;
अब पाप जाग खखुअइले अइके,
हमरा काट-काट के खाता।
तो हरे जतने हम निरात बानी;
ओतने अधिका, हम उदण्ड,
बदमाश अस लागत बानी।
तनिका दया करऽ अब कर्ण,
जल्दी इहवाँ से हमरा जाये द;
आपन तेज के चोखगर तीर से,
हमरा के प्राण बचावे द।
हमरा लौट जाये के पहिले,
एक दया लेकिन तू करऽ;
निष्ठुर त बड़ले हम बानी,
बाकिर सोंच कवनो वर तू ले ल।
कह उठलन कर्ण,
सब कुछ दे के, धन्य आज हम बानी;
अब का होई कवनो वर लेके,
देव राज ना जानत बानी।
देवराज के आशिष बस चाहीं,
कि धरम धारण में झुक ना पायीं;
धरमे होखे रक्षा के छतरी, मुकुट,
ओकरे में कवच-कुण्डल पायीं।
कर्ण से देवराज तब कहलन,
तोहरा के धरम कबो जे छोड़लन;
फिर केकरा से नाता जोड़िहें,
कि उनकर जान बाचल रहिहन।
कवना डरे हे पुत्र कर्ण,
तुहू के धरम छोडबऽ;
अपना जीत के ऊपरे,
तुरंते धरम के रख छोड़बऽ।
हम तोहरा से चीज जवन,
झटकले बानी, धरम ना रहे;
तोहरा के असहाय बनावल,
कइल चोट धरम ना, छल रहे।
ओकरे करीं दूर, कम करीं,
मन ईहे आज बनवले बानी;
लागत बा पूरे ना देबऽ कर्ण,
जे आशा हम बन्हले बानी।
कुछ ना मंगबऽ ओह से का,
फिर भी हम कुछ देबे करब;
भारी मन के बोझ उतार,
थोड़ा हलुक त करबे करब।
एकघ्नी हई तुहूँ ले ल,
ई काल के अपना गाल में खायी;
एके चोट से केहू ना बचिहें
ना कबहूँ निष्फल ही जायी।
एह से हे सुत एकरा के मत,
हड़बड़ में कभी चलइह;
दोसर ना कवनो बल होखे,
बस ओही घड़ी चलइह।
तू दानी, दानवीर जय तोहरे,
महिमा तोहरे सब गावस;
तोहरे चाल, तोहरे करनी,
मानव का देवता तक आपनावस।
दे के अमोघास्त्र देवराज,
नभ में झटके उड़ गइलन;
व्रत के अन्तिम कवच दान कर
कर्ण अपना घर गइलन।


