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श्री जीयर स्वामी जी महाराज का मउडिहरा ज्ञान यज्ञ स्थल पर हुआ शुभागमन।

हुआ भव्य स्वागत, आस्था और भक्ति का उमड़ा सैलाब।

दिनारा/रोहतास (डॉ अजय ओझा,वरिष्ठ पत्रकार) 30 मई।भारत के महान मनीषी ब्रम्हलीन संत पूज्य श्री त्रिदंडी स्वामी जी महाराज के शिष्य पूज्य पाद श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज का शुभागमन शुक्रवार रात्रि आठ बजे मउडिहरा स्थित ज्ञान यज्ञ स्थल पर हुआ। श्री जीयर स्वामी जी महाराज यहां आगामी 2 जून तक श्री मद्भागवत महापुराण कथा ज्ञान यज्ञ पूर्ण होने तक रहेंगे। श्री जीयर स्वामी महाराज के दर्शन व स्वागत के लिए मउडिहरा के समस्त ग्रामवासियों सहित जरजवार के हजारों व्यक्ति ज्ञान यज्ञ समिति के अध्यक्ष महेन्द्र नाथ ओझा के नेतृत्व में नटवार-दिनारा मुख्य सड़क पर प्रतीक्षा कर रहे थे। स्वामी जी के मुख्य सड़क पर बने तात्कालिक यज्ञ द्वार पर पंहुचते ही श्रद्धालु भक्तजनों के जयकारा से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। स्वागत व दर्शन के पश्चात जयकारा लगाते श्रद्धालु भक्तों के काफिले के साथ स्वामी जी मउडिहरा के काली माई मंदिर के समीप स्थित ज्ञान यज्ञ स्थल पर पंहुचे। यज्ञ स्थल पर स्वामी जी महाराज के दर्शन के लिए भारी जनसमूह उमड़ पड़ा। दर्शन व स्वागत के बाद श्रद्धालुओं के बीच स्वामी जी महाराज के निर्देशानुसार प्रसाद का वितरण किया गया।

उधर श्रीमद्भागवत महापुराण कथा ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन कथा का विस्तार करते हुए काशी से पधारे पूज्य पंडित श्री विश्वकांताचार्य जी महाराज ने राजा परीक्षित की कथा कहते हुए बताया कि पाण्डवों के स्वर्ग जाने के पश्चात राजा परीक्षित ऋषि-मुनियों के आदेशानुसार धर्मपूर्वक शासन करने लगे। उनके जन्म के समय ज्योतिषियों ने जिन गुणों का वर्णन किया था, वे समस्त गुण उनमें विद्यमान थे। उनका विवाह राजा उत्तर की कन्या इरावती से हुआ। उससे उन्हें जनमेजय आदि चार पुत्र प्राप्त हुए। इस प्रकार वे समस्त ऐश्वर्य भोग रहे थे। एक दिन राजा परीक्षित ने कलयुग को धरती पर अत्याचार करते देखा, तो उन्होंने क्रोधित होकर उसे अपने राज्य से निकल जाने को कहा। कलयुग के गिड़गिड़ाने पर राजा परीक्षित ने उसे रहने के लिए चार स्थान दिए – जुआ, शराब, परस्त्री गमन तथा हिंसा। कलयुग ने राजा का धन्यवाद करते हुए कहा कि – हे राजन आपने चारों स्थान अपनी मर्जी से दिए हैं, एक स्थान मैं भी आपसे मांगता हूँ, आप देने की कृपा करें। राजा परीक्षित ने पांचवा स्थान स्वर्ण देने के साथ साथ ये पांच वस्तुएँ भी उसे दे डालीं – मिथ्या, मद, काम, हिंसा और बैर।

कथा प्रसंग आगे बढ़ाते हुए विश्वकांताचार्य जी ने भगवान शिव और उनकी अर्धांगिनी माता सती की कथा का मार्मिक वर्णन किया। माता सती प्रजापति दक्ष और रानी प्रसूति की पुत्री थीं। वे बचपन से ही भगवान शिव की अनन्य भक्त थीं। पिता दक्ष की इच्छा के विरुद्ध सती ने कठोर तपस्या करके महादेव को अपना पति चुना। कुछ समय बाद, राजा दक्ष ने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने सभी देवताओं और संबंधियों को बुलाया, लेकिन भगवान शिव का घोर अपमान करने के लिए उन्हें जानबूझकर आमंत्रित नहीं किया। सती को जब पता चला, तो वे बिना बुलाए अपने पिता के यज्ञ में जाने के लिए व्याकुल हो उठीं। शिवजी ने समझाया कि बिना आमंत्रण के जाना उचित नहीं है, परंतु सती नहीं मानीं। यज्ञ स्थल पर पहुँचने पर किसी ने सती का स्वागत नहीं किया और राजा दक्ष ने सबके सामने शिवजी का उपहास उड़ाया। अपने पति का यह अपमान सती सहन न कर सकीं। उन्होंने पिता के इस व्यवहार से क्षुब्ध होकर स्वयं को यज्ञ की अग्नि (योग अग्नि) में भस्म कर लिया। जब भगवान शिव को सती के आत्मदाह का समाचार मिला, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। उनके गणों ने यज्ञ को तहस-नहस कर दिया। स्वयं शिवजी ने वीरभद्र को उत्पन्न किया और दक्ष का सिर काट दिया गया। बाद में, देवताओं की प्रार्थना पर शिवजी ने दक्ष को जीवनदान दिया। सती ने पर्वतराज हिमालय और मैना के घर माता पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या करके पुनः शिवजी को पति रूप में प्राप्त किया।

कथा के बीच में ही पूज्य जीयर स्वामी जी कथा स्थल पर पंहुचे और उनकी पावन उपस्थिति में आरती संपन्न हुआ। मौके पर ज्ञान यज्ञ समिति के अध्यक्ष महेन्द्र नाथ ओझा, तेनुअज निवासी काली राय, तेज नारायण ओझा, राजगृही ओझा , बबन ओझा, रजनीकांत उर्फ मुन्ना पाण्डेय, पप्पन ओझा, रास गोविंद ओझा, राजू ओझा तथा मीडिया प्रभारी डॉ अजय ओझा सहित असियां, बिरौंवा, नटवार, जमोढ़ी, पिपरी, बरडिहां, राजपुर के रहने वाले हजारों श्रद्धालु भक्त उपस्थित थे।

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