मउडिहरा गांव में दूसरे दिन भी जारी रही श्रीमद्भागवत महापुराण कथा।
दिनारा/रोहतास (डॉ अजय ओझा, वरिष्ठ पत्रकार) 29 मई।मउडिहरा गांव में परम पूज्य श्री त्रिदंडी स्वामी जी महाराज के शिष्य पूज्य श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज के मंगलानुशासन में चल रहे सात दिवसीय श्रीमद्भागवत महापुराण कथा ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन कथा का विस्तार करते हुए वृंदावन वाराणसी से आये हुए अंतर्राष्ट्रीय कथावाचक भागवतमणि पूज्यश्री पंडित विश्वकांताचार्य जी महाराज ने कहा कि सनातन धर्म की रीढ़ चारों वेदों को माना जाता है। श्रीमद्भागवत को पांचवां वेद कहा जाता है और जहां भी इसकी कथा होती है, भगवान नारायण स्वयं अन्य देवताओं सहित उपस्थित रहते हैं। उन्होंने कहा कि यह कथा परंपरा से चली आ रही है। सबसे पहले इसे द्वापरयुग में स्वयं भगवान नारायण ने सुनाया था। महाभारत युद्ध में मोह ग्रस्त अर्जुन को श्रीमद्भागवत गीता का उपदेश देते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानं अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहं।। परित्राणाय साधुर्नामं विनाशाय च दुष्कृतां धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामी युगे युगे।। हे पार्थ ! जब जब भी धर्म की हानि होती है तब तब मैं दुर्जनों से साधुजनों की रक्षा तथा धर्म की पुन: स्थापना के लिए अवतार लेता हूं।
महाभारत युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण अन्याय पर उतारू दुर्योधन को समझाने के लिए स्वयं दूत बनकर जाते हैं – तुम दे दो केवल पांच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम, हम वही खुशी से खायेंगे परिजन पर असि ना उठायेंगे। दुर्योधन वह भी दे न सका, आशीष हरि का ले न सका। उल्टा हरि को बांधने चला, जो था असाध्य साधने चला। जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। महाभारत युद्ध में अन्यायी दुर्योधन संपूर्ण सेना सहित विनाश को प्राप्त होता है। मृत्यु के सन्निकट दुर्योधन अंतिम समय में अश्वत्थामा को सेनापति बनाता है। अश्वत्थामा रात्रि में धोखे से पांडवों के शिविर पर आक्रमण करता है और द्रौपदी के पांचों पुत्रों को पाण्डव समझकर वध कर देता है। द्रौपदी चित्कार कर उठती हैं। अर्जुन अश्वत्थामा का वध करने के लिए गांडिव पर प्रत्यंचा चढ़ा लेते हैं। मृत्यु भय से अश्वत्थामा ब्रम्हास्त्र का संधान कर देता है। अर्जुन भी ब्रम्हास्त्र का संधान कर देते हैं। दोनों ब्रम्हास्त्रों के टकराव से लगता है कि सृष्टि ही नष्ट हो जायेगी। तब भगवान श्रीकृष्ण के आदेश पर अर्जुन तो ब्रम्हास्त्र वापस ले लेते हैं लेकिन अश्वत्थामा ब्रम्हास्त्र को वापस बुलाना नहीं जानता और वह ब्रम्हास्त्र को अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ पर छोड़ देता है। उत्तरा की आर्त पुकार पर भगवान श्रीकृष्ण उसके गर्भ में पल रहे शिशु परीक्षित की चक्र सुदर्शन से कवच बनाकर रक्षा करते हैं। भगवान की इस अपरंपार लीला का गायन करते हुए श्री विश्वकांताचार्य जी गा उठते हैं – प्रभु जी रिझे ल रिझावै ल कवन गुनवा से। प्रवचन पंडाल में एकत्रित समस्त श्रोता स्तंभित होकर भगवान की जय जयकार करने लगते हैं।
आचार्यश्री ने कथा क्रम में राजा परीक्षित के जन्मोत्सव को बड़े सारगर्भित ढंग से बताया। परीक्षित की कुंडली को एक विद्वान ज्योतिषी से दिखवाते हुए युधिष्ठिर ने परीक्षित का भविष्य जानना चाहा। ज्योतिषी ने बताया कि बालक को सर्प से असामयिक मृत्यु का भय है।
शुकाचार्य जी परीक्षित को कथा सुनाते हुए कहते हैं, हे राजन ! धीरज, धर्म, आस्था और विश्वास ये चारों मनुष्यों का रक्षण करता है । मर्यादा में बंधकर रहने वालों का भगवान कभी भी परीक्षा नहीं लेते हैं । जबकि मर्यादा को त्यागने वालों को अतिशय कष्ट झेलना पड़ता है। भगवान शिव के वचन को न मानने के कारण उनकी पत्नी माता सती को भी शिव से दुर हो जाना पड़ा और अपने प्राणों की आहुति तक देनी पड़ गई। कथाक्रम में मनुसतरुपा प्रसंग, प्रियव्रत, उत्तानपाद प्रसंग के साथ साथ अकुती, देवहूति, प्रसुति तथा भक्त ध्रुव के प्रसंग का संगीतमयी प्रस्तुति की गई जिसमें डुबकर सभी श्रोता भावविभोर हो गये। बेन्जो पर पिन्टू जी तथा तबला पर बृजकिशोर जी की संगति ने अद्भुत समा बांध दिया।
अंत में “अधर धर मुरली बजैया की आरती कृष्ण कन्हैया की” आरती गायन के साथ कथा के दूसरे दिन का समापन हुआ। मौके पर मल्लू पांडेय, महेंद्र नाथ ओझा, जनार्दन ओझा, सुरेन्द्र ओझा, शशिकांत ओझा, इंजीनियर रामजी ओझा, पप्पन ओझा, जयकुमार उपाध्याय, अमृतेश ओझा, रविन्द्र ओझा, राजीव रंजन ओझा, श्याम बिहारी पासवान तथा मीडिया प्रभारी डॉ अजय ओझा सहित गांव-जवार के हजारों श्रद्धालु उपस्थित थे।

