वसंती मंजर
तनिका सा चुनरी पर रंग बरसावे द, चुनरी होइहें लहरदार;
तनिका सा देहिया से नेहिया लगावे द,
फागुन के बहे बेआर।
ई देहिया केहू एक हीं के हउवे,
ना होला एकर व्यापार,
बात उधार उधारी में जइहें,
जबतक बलमा ना फिरिहें हमार।
एह फिचकारा-फिचकारी में दम नइखे,
अइसन कतना देखली भरमार; फुच-फाच कर ना छोट उमर में,
नाहीं त हो जअब जल्दी बेकार।
फागुन माह पिया मन भावे,
चैत में करीहऽ तकरार,
जालें पिया जब जोरहाट तोहरो,
काहे धोवलू काजल नैनधार;
गोरे-गोरे गलवा के करियालकीरवा,
आव दीहीं होठवा से ओकरो सवाँर।
बिरह के अगिया में झोंक मत देहिया के, अभी बाड़े लमहर संसार;
तनिका सा नियरा से झांके द हमके, साँसवा के छोड़बो फुहार।
लागल अगिया फुहार से ना बुझिहें, आउर भड़क उठिहें अंगार;
आवते फागुन जब पिया घर अइहें, धरिहें जबही अँकवार धीरे-धीरे अगिया बुझावे ऊ लगिहें करी के कोठरिया अन्धार।
नाहीं पहुँच तू ही पइब उहाँ तक, चाहे कतनो करव झकझोर;
खाली सजनवा पहुँचिहें उहाँ तक, नइख तू अभी अँखफोर।
अबहीं उमर नाहीं सोलह के पार कइल, कहाँ सिखल अत बड़ विचार;
हिरणी के पीछा ही हाँफे तू लगब, कइसे करब तुहूँ त शिकार।
हम का कहीं, काहे पंखा झलेलू तुहूँ, काहे करेलू कोठरिया अंधार;
भोरवा में टिकुली के चमक घटेला काहे, काहे उठेलू दिन घरी पार।
दू-चार साल अभी दम धर बबुआ हो, का कहिहें सख्यिा, कतना हव तू छीनार;
हँसी-हँसी पुछिहें इनरा पर उहो, के लगिहे उहो तोहार।
कइसे बोलिहें सब हमके ई बतिया, ओह में उनकर भी होइहें उधार;
कइसे छीनारी के बात उहो जाने ली, जबकी उहो बाड़ी अबहीं कुँआरी।
तनिका सा चुनरी पर रंग बरसावे द, चुनरी होइहें लहरदार;
तनिका सा देहिया से नेहिया लगावे द, फागुन के बहे वेआर।


