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मैथिली कथा-संग्रह : ‘लॉक डाउन गाम आ गोनुआ के विवाह’

पटना/बिहार (डॉ. अनिल कुमार,प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस)11 मई।मैथिली और हिन्दी साहित्य जगत की चर्चित ब्लॉगर, यात्रावृत्तांतकार तथा गद्य-पद्य की सशक्त लेखिका डॉ. कामिनी कामायनी का नवीन मैथिली कथा-संग्रह ‘लॉक डाउन गाम आ गोनुआ के विवाह’ कोरोना काल के उस भयावह और अविस्मरणीय दौर की जीवंत सामाजिक दैनंदिनी प्रस्तुत करता है, जिसने पूरे समाज को भीतर तक झकझोर दिया था।
यह संग्रह केवल कहानियों का संकलन नहीं, बल्कि उस समय की सामूहिक पीड़ा, संघर्ष, विडंबना और मानवीय संवेदनाओं का दस्तावेज प्रतीत होता है। महामारी के दौरान शहरों और महानगरों से अपने गाँवों की ओर लौटते लोगों का दर्द, असहायता और जड़ों की तलाश में भटकता जीवन इन कहानियों में अत्यंत मार्मिक ढंग से उभरकर सामने आया है।
उस समय यातायात के सभी साधन ठप थे, आवागमन पर पाबंदियाँ थीं। हजारों लोग रेल पटरियों और सड़कों पर पैदल अपने घरों की ओर निकल पड़े थे। कई लोग भूख, थकान और दुर्घटनाओं का शिकार हुए। सुनसान रातों में रेल हादसों में हुई मौतें आज भी स्मृति को विचलित कर देती हैं। लेखिका ने इन परिस्थितियों को अत्यंत संवेदनशीलता और यथार्थपरक शैली में चित्रित किया है।
गाँवों में वर्षों बाद लौटे अपने लोगों से जो उत्साह और जीवंतता पैदा हुई, उसका चित्रण भी इस संग्रह की विशेषता है। जो गाँव पलायन के कारण सूने और निस्तेज हो चुके थे, वे अचानक फिर से चहल-पहल से भर उठे। परिवारों में अपनापन लौटा, रिश्तों में गर्माहट आई, लेकिन साथ ही सामाजिक तनाव, आपसी वैमनस्य और संकीर्ण मानसिकताएँ भी सिर उठाने लगीं।
लेखिका ने लॉकडाउन के दौरान आम जनजीवन की कठिनाइयों को भी बखूबी उकेरा है। कामकाज ठप हो जाने से सम्पन्न परिवारों तक की स्थिति डगमगा गई थी। सरकार द्वारा मुफ्त अनाज वितरण ने एक बड़ी समस्या का समाधान अवश्य किया, किंतु मानसिक भय, भविष्य की चिंता और सामाजिक असुरक्षा जैसी अनेक समस्याएँ लोगों को भीतर से तोड़ रही थीं।
कथा-संग्रह में उस दौर की अफवाहों, टीकाकरण को लेकर फैले भ्रम, क्वारंटीन के भय और रात के अंधेरे में चोरी-छिपे गाँव लौटते लोगों का भी यथार्थ चित्रण है। बिहार में लागू शराबबंदी के बावजूद गुप्त रूप से चल रहे शराब कारोबार पर लेखिका की व्यंग्यात्मक दृष्टि समाज की विडंबनाओं को उजागर करती है।
कोरोना काल ने सामाजिक व्यवहार को भी बदल दिया था। लोग एक-दूसरे से दूरी बनाने लगे थे। बीमारी के भय से रिश्तों में अजनबीयत और संदेह घर कर गया था। अपनों के लिए बंद होते दरवाजे और सामाजिक अलगाव का दर्द इस संग्रह की कहानियों में गहराई से महसूस किया जा सकता है।
इस संग्रह में केवल कोरोना काल ही नहीं, बल्कि वर्तमान समाज की संवेदनहीनता, बुजुर्गों की उपेक्षा, महिलाओं और बच्चों के प्रति बढ़ती उदासीनता जैसे विषयों को भी प्रभावशाली ढंग से उठाया गया है। संग्रह की कई कहानियाँ विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर पाठकों की सराहना प्राप्त कर चुकी हैं।
पुस्तक की साज-सज्जा आकर्षक और नयनाभिराम है। भाषा सरल, सहज, सरस और प्रवाहमयी है, जो पाठकों को आरंभ से अंत तक बाँधे रखती है। मैथिली साहित्य और समकालीन सामाजिक यथार्थ में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह संग्रह निश्चित रूप से पठनीय और संग्रहणीय कृति है।

यह पुस्तक Amazon पर उपलब्ध है तथा प्रकाशक से भी प्रत्यक्ष प्राप्त की जा सकती है।

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