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उपराष्ट्रपति ने 18वें सिविल सेवा दिवस समारोह में प्रशासनिक अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा – ‘महान शक्ति के साथ महान जिम्मेदारी आती है’

प्रशासनिक सेवाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी नारी शक्ति की ताकत और बदलती सोच को दर्शाती है।

सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन कर्तव्य, सेवा और राष्ट्रीय संकल्प के प्रतीक

शासन में विविध विशेषज्ञता की आवश्यकता है; उपराष्ट्रपति ने राज्यों से भर्ती नीतियों में सुधार करने का आग्रह किया

RKTV NEWS/ नई दिल्ली 21 अप्रैल।उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली के विज्ञान भवन में 18वें सिविल सेवा दिवस के अवसर पर मुख्य भाषण दिया।
अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने देश भर में कार्यरत सभी प्रशासनिक अधिकारियों और उनके सेवानिवृत्त साथियों को हार्दिक शुभकामनाएं दीं। उन्होंने याद दिलाया कि स्वतंत्र भारत के प्रथम गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने दिल्ली में प्रशासनिक सेवाओं के प्रशिक्षुओं को संबोधित किया था, जिसमें उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों को “भारत का स्तंभ” बताया था। इस बात को 79 वर्ष हो चुके हैं। उपराष्ट्रपति ने कहा कि अधिकारियों के विभिन्न बैचों ने इस विरासत को निरंतर कायम रखा है और प्रगति एवं समृद्धि की राह पर राष्ट्र की ठोस संरचना के रूप में कार्य किया है। उन्होंने विभिन्न राज्यों में कार्यरत प्रशासनिक अधिकारियों को राष्ट्रीय एकता और एकजुटता का सबसे बड़ा दूत बताया।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पिछले दशक में हासिल की गई अभूतपूर्व प्रगति का जिक्र करते हुए उपराष्ट्रपति ने “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के मार्गदर्शक विजन पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रमुख उपलब्धियों के बारे में बताया, जिनमें लगभग 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकालना, गरीबों के लिए 4 करोड़ से अधिक घरों का निर्माण और सीमावर्ती गांवों को जीवंत समुदायों के रूप में विकसित करना शामिल है। उन्होंने कहा कि लखपति दीदियों और नमो ड्रोन दीदियों जैसी पहलों के समर्थन से महिलाएं विकास में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने आकांक्षी जिला कार्यक्रम और ‘एक जिला एक उत्पाद’ जैसे प्रमुख कार्यक्रमों का भी जिक्र किया और इस बात पर जोर दिया कि कोई भी राज्य या जिला पीछे नहीं छूटना चाहिए।
सरकारी नीतियों के सच्चे क्रियान्वयनकर्ता के रूप में प्रशासनिक अधिकारियों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि इन उपलब्धियों में उनकी निष्ठा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ के सिद्धांत का अनुभव प्रत्येक नागरिक को करना चाहिए। उपराष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि 2047 तक विकसित भारत की राह में भारत को अभी लंबा सफर तय करना है। उन्होंने समावेशी विकास और प्रभावी शासन सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रतिबद्धता, ईमानदारी और अंतिम छोर तक सेवाएं पहुंचाने पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री के विजन को दोहराते हुए उन्होंने इस बात पर बल दिया कि प्रशासनिक अधिकारियों का यह दायित्व है कि कोई भी नागरिक पीछे न छूटे।
तेजी से विकसित हो रहे तकनीकी परिदृश्य के संदर्भ में, उपराष्ट्रपति ने सरकारी कर्मचारियों से अपने कौशल को निरंतर उन्नत करने और भविष्य के लिए तैयार रहने का आग्रह किया। उन्होंने क्षमता निर्माण के लिए iGOT कर्मयोगी जैसे प्लेटफार्मों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए दक्षता, पारदर्शिता और लाभार्थियों तक सही ढंग से पहुंचने में प्रौद्योगिकी की भूमिका पर बल दिया। उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति ने भ्रष्टाचार को कम करने और सेवा वितरण में सुधार करने में मदद की है, साथ ही उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि कल्याणकारी योजनाओं को सावधानीपूर्वक तैयार किया जाना चाहिए ताकि वे पात्र लाभार्थियों तक पहुंच सकें।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रशासनिक सेवाओं में केवल सामान्य ज्ञान रखने वालों पर निर्भर रहने का युग समाप्त हो गया है और उन्होंने अधिक विशेषज्ञता की मांग की। उन्होंने राज्यों से शासन को मजबूत करने के लिए दूरदर्शी भर्ती नीतियों को अपनाने का भी आग्रह किया। उन्होंने सिविल सेवकों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग, नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग और ब्लॉकचेन जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया।
उपराष्ट्रपति ने तमिल संत-कवि तिरुवल्लुवर के शब्दों को उद्धृत करते हुए कहा कि धर्म (अरम) सर्वोच्च धन है, जो भौतिक समृद्धि और नैतिक शक्ति दोनों प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि विशेषकर चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में सच्चा नेतृत्व नैतिक आचरण में निहित है। उन्होंने वैध मार्गदर्शन का पालन करने और अनुचित दबाव के आगे झुकने के बीच अंतर स्पष्ट किया और अधिकारियों से हर समय ईमानदारी और निष्पक्षता बनाए रखने का आह्वान किया।
उपराष्ट्रपति ने प्रशासनिक सेवाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि 2016 में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 21 प्रतिशत थी जो 2025 की परीक्षा में बढ़कर लगभग 31 प्रतिशत हो गई है और आज कई महिलाएं वरिष्ठ पदों पर कार्यरत हैं। उन्होंने इसे नारी शक्ति का सशक्त प्रमाण बताया, जो न केवल संख्यात्मक परिवर्तन है बल्कि सोच में भी बदलाव है। उन्होंने नारी शक्ति वंदन अधिनियम के माध्यम से विधायी निकायों में भी इसी तरह की प्रगति की आशा व्यक्त की।
उपराष्ट्रपति ने सिविल सेवा परीक्षाओं में कड़ी प्रतिस्पर्धा का जिक्र किया, जिसमें प्रतिवर्ष 12 से 15 लाख उम्मीदवार शामिल होते हैं और केवल लगभग 1,000 का ही चयन होता है। अधिकारियों को उनकी विशेषाधिकार प्राप्त स्थिति याद दिलाते हुए, उन्होंने उनसे राष्ट्र और उसके नागरिकों के प्रति अपने दायित्वों के प्रति सचेत रहने का आग्रह किया। उन्होंने उनसे अपने अधीनस्थों के साथ मजबूत संपर्क बनाए रखने का आग्रह किया ताकि चुनौतियों को बेहतर ढंग से समझा जा सके और उनका समाधान किया जा सके।
हाल ही में सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन के लोकार्पण का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ये राष्ट्र के प्रति सेवा, कर्तव्य और समर्पण की गहरी प्रतिबद्धता के प्रतीक हैं। उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों से आग्रह किया कि वे यह सुनिश्चित करें कि उनका कार्य सुदूरतम क्षेत्रों तक पहुंचे, जीवन में बदलाव लाए, शिकायतों का समाधान करे और नागरिकों को सशक्त बनाए, जिससे समानता, गरिमा और न्याय के मूल्यों को मजबूती मिले।
इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पी.के. मिश्रा, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव-2 शक्तिकांत दास, कैबिनेट सचिव डॉ. टी.वी. सोमनाथन, प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (डीएआरपीजी) की सचिव निवेदिता शुक्ला वर्मा और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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