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दार्जलिंग झलक !

दार्जलिंग झलक !

तुम घाटी की रानी हो, या हिम राज की प्यारी हो;
बैठ प्रकृति के गोद बीच, तुम लगती कैसी न्यारी हो।
लिपटे नाग-नागीन से जैसे, रेल सड़क पथ लिपटे वैसे;
दायें-बायें, ऊपर-नीचे, एक अन्य के होकर, चलते लगते वैसे ।
तेरा ज्यों-ज्यों होता दिग्दर्शन, मन अहलादित होता है; कहीं चाटी पर चिड़, कहीं गहरी खाई, दोनों ही मन को भाते है।
कहीं दूर-दूर तक चाय की गाछी, कहीं क्वास लटकते पाता हूँ,
हरी भरी चुनरी में लिपटे, तुमको देख, मन्द-मन्द मुस्काता हूँ।
निर्मल धारा, घाटी से बहते, एक संदेश दिये जाता है;
थके हुए पथिकों को, अनवरत चलने का, संदेश दिये जाता है।
खम्भों पर के खड़े भवन, भयभीत नहीं होने पाते;
हिमपात या भू-स्खलन, बस सहज भाव से आते-जाते ।
पवन के झोंको से बादलों को, सर के ऊपर देखा था;
आज उन्हीं के बीच खेलते, धरती से नभ तक एक हुए पाता था।
खड़े-खड़े ललकार रहा, तेन्जींग सा लाल, उस प्रतीभा को देखा है;
बुद्धम् शरणं गच्छामि के मंत्रों को, चोटी से आते भी देखा है।
महाकाल त्रिकाल बैठे हैं, यहाँ उच्च शिखर पर;
नीचे भीखमंगों की कतार आशा में, कभी अनुग्रह आये उनपर ।
पर्वतारोहण को सिखलाने का, ले लिया है तूने जिम्मेवारी;
सूचना और समान समेटे है, संग्रहालय संस्थान ने रखा भारी।
वनस्पति उद्यान के दुर्लभ पौधे, सारे जग को दिखते हैं लहराते; पत्ती भी जो फूल-सा लगती, रंग बदलकर ऐसे कितने हैं दिखलाते।
सागर जल में रंग घोलते देखा था, सूरज तुमको उषाकाल में; फिर मंत्र मुग्ध हो बैठ शिला पर, स्वामी थे लगे निहारने सांझ उषा को।
सूरज तुमको जग तपते देखा है, पर तू तो यहाँ भी पर्वत घाटी में; आते-आते ही हरे रंग पर लाल-चनरिया, फैला देते हो व्याघ्र घाटी में।
लगा कि काले केशों वाली शबनम निशा के वस्त्रों खोल नहा बैठी हो; और बीच उसके माँग में, सूरज, प्रणय का सिन्दूर दिये बैठा हो।
पर हैं लोग यहाँ के कि इस लाली को,
बचा नहीं तक पाता है; पिले रंग से पोत पातकर, उस कोठी को, लाल कोठी कहता जाता है।
मोहित तो करती रानी तुम घाटी को,
पर खुखरी जरा संभाले रखना,
डर लगता है नेपाली-गोरखाली के झगड़ों से,
बन्धुत्व बनाये रखना ।
क्यों गोर बदन, गोरे गालों पर, चिपटी नाक बना डाली;
होंगे प्रहरी हम मातृभूमि के, इसीसे क्या, हाथों में खुखरी दे डाली।
एक ज्योति जो दूर खाड़ी से आती है, क्या उजाला कर नहीं पाती;
कि घाटी पुत्रों ने मिलकर, किसी सुभाष की ज्योति ही जला डाली ।
पर संघर्षों की गवाही देने को ही, महानंदा बीच में लोटी है;
न बँटे बंग के अंग, इसीलिए तो ये बीच में लोटी है।
घाटी की रानी तुम रहो सलामत, और खुशबु तेरा रहे फैलता चारों ओर;
घायल हो दिल मेरा, पर दर्द नहीं;
देखता रहूँ बदन तेरा, तुम भी रहो मुखातीब मेरी ओर ।
रचनाकार:डॉ कृष्ण दयाल सिंह

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की इक्कतीसवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)

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