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संकल्प, नई ऊर्जा और नतीजे: टेरी का WSDS 2026 ‘जलवायु दशक’ का खाका पेश कर संपन्न।

WSDS 2026 के समापन सत्र में सरकार, संयुक्त राष्ट्र, उद्योग और युवाओं की आवाज़ें एक साथ आईं—लोग, धरती और समृद्धि के लिए साझा रास्ता तय करने पर जोर।

नई दिल्ली/राहुल ढींगरा 05 मार्च।द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) द्वारा आयोजित वर्ल्ड सस्टेनेबल डेवलपमेंट समिट (WSDS) 2026 का आखिरी दिन गहरे चिंतन और नए संकल्प के साथ शक्तिशाली स्वर में संपन्न हुआ। “फ्लिेक्‍शंस, रिसर्जेंस एंड रिजॉल्‍व फॉर अवर कॉमन फ्यूचर” (Reflections, Resurgence, and Resolve for Our Common Future) शीर्षक वाले समापन सत्र में सरकार, बहुपक्षीय संस्थानों, उद्योग और सिविल सोसाइटी के दिग्गज नेताओं ने हिस्सा लिया।
प्रतिष्ठित दरबार हॉल में आयोजित इस सत्र ने साबित किया कि WSDS 2026 केवल वैश्विक आवाज़ों को जोड़ने वाला मंच ही नहीं है, बल्कि यह ज़मीनी स्तर पर ठोस जलवायु कार्रवाई को गति देने वाला माध्यम भी है।
समापन सत्र में वक्ताओं के एक प्रतिष्ठित पैनल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जलवायु कार्रवाई का अगला चरण जवाबदेही, क्रियान्वयन और विभिन्न पीढ़ियों के साझा नेतृत्व से तय होगा।
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC), भारत सरकार के सचिव, तन्मय कुमार ने कहा, “जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ पर्यावरण की बहस का विषय नहीं रहा। यह विकास, शासन, सुरक्षा और मानव कल्याण की एक बड़ी चुनौती बन चुका है। भारत का दृष्टिकोण विज्ञान पर आधारित और समानता को ध्यान में रखने वाला है। हम स्वच्छ ऊर्जा को आजीविका सुरक्षा से जोड़ रहे हैं, ग्रामीण और शहरी योजनाओं में लचीलापन शामिल कर रहे हैं और यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार लोग ही बदलाव का नेतृत्व करें।
विकसित देशों ने पहले बड़े पैमाने पर उत्सर्जन के साथ औद्योगिकीकरण किया और बाद में सफाई की प्रक्रिया अपनाई। इसके विपरीत, भारत विकास, गरीबी उन्मूलन, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और डीकार्बोनाइजेशन की जटिल प्रक्रिया को एक साथ साध रहा है। हम बीते कल की गरीबी मिटाने के लिए आने वाले कल का पर्यावरण संकट पैदा नहीं करना चाहते।
प्रति व्यक्ति लगभग 2 टन वार्षिक उत्सर्जन (जो वैश्विक औसत से काफी कम है) के साथ हमारी यात्रा दिखाती है कि स्वच्छ ऊर्जा कोई ‘दान’ नहीं, बल्कि आर्थिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है। हमने जून 2025 में ही 2030 का ‘50% गैर-जीवाश्म स्थापित विद्युत क्षमता’ का लक्ष्य तय समय से पांच साल पहले हासिल कर लिया और अब यह हिस्सा 51% से अधिक है। हमारा मानना है कि भविष्य संयोग से नहीं मिलता, बल्कि संकल्प से सुरक्षित किया जाता है। विनम्रता, विज्ञान और न्याय के साथ हम इसे सुरक्षित करेंगे।”
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की गुडविल एंबेसडर, दिया मिर्ज़ा ने कहा, “जलवायु परिवर्तन जेंडर-न्यूट्रल नहीं है। महिलाएं और लड़कियां इसके प्रभावों को सबसे गंभीर रूप से झेलती हैं, जबकि वे दुनिया के एक बड़े हिस्से के लिए भोजन उगाती हैं और परिवारों व समुदायों को संभालती हैं। इसके बावजूद, जलवायु और ऊर्जा से जुड़े फैसलों में उनकी भागीदारी बहुत कम है। आज सस्टेनेबिलिटी केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व, गरिमा और शांति की बुनियाद है। प्रकृति के साथ जुड़ाव हर व्यक्ति के लिए कोई लग्‍ज़री नहीं बल्कि एक जरूरत है।”
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की डिप्टी रेजिडेंट रिप्रेजेंटेटिव, इसाबेल त्शान ने साझा किया, “भारत की लगभग 65% आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है। ऐसे में युवाओं की भागीदारी और नेतृत्व यह तय करने में महत्वपूर्ण है कि समुदायों और संस्थानों में सस्टेनेबिलिटी को कैसे अपनाया और लागू किया जाए। इसी भावना के साथ, UNDP पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और TERI के साथ मिलकर ‘मिशन LiFE यूथ एंबेसडर’ कार्यक्रम शुरू कर रहा है।”
रीन्यू की सह-संस्थापक और सस्टेनेबिलिटी चेयरपर्सन, वैषाली निगम सिन्हा ने कहा, “विकास और जलवायु अब दो अलग-अलग एजेंडे नहीं रह गए हैं; वे अब एक ही हैं। स्वच्छ ऊर्जा कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे ‘सिर्फ अच्छा दिखने के लिए’ किया जाए; यह एक आर्थिक अनिवार्यता है। ग्लोबल साउथ अब किसी से इजाजत नहीं मांग रहा, बल्कि समाधान पेश कर रहा है। हम क्या वादा करते हैं यह मायने रखता है, लेकिन हम मिलकर क्या करते हैं—और दो सम्मेलनों के बीच के समय में क्या ठोस कदम उठाते हैं—यह उससे भी ज्यादा अहम है। यह समिट केवल एक क्षण नहीं, बल्कि कार्रवाई का एक स्पष्ट जनादेश है।”
POP (प्रोटेक्‍ट अवर प्‍लैनेट) मूवमेंट के सह-संस्थापक और सीनियर मेंटर, डॉ. ऐश पचौरी ने कहा, “जब हम उसी स्थान पर WSDS के 25 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं जहां से इसकी शुरुआत हुई थी, तो हम न केवल एक शानदार विरासत का, बल्कि भविष्य की हमारी साझा जिम्मेदारी का भी जश्न मना रहे हैं। यह सफर दूरदृष्टि, बुद्धिमत्ता, मूल्यों और उन सशक्त आवाजों से बना है जिन्होंने वर्षों तक जागरूकता और धैर्य पैदा किया। लेकिन यह पल हमसे एक गहरा सवाल पूछता है—हमने जो कुछ भी सीखा है, उसके साथ अब हम क्या करेंगे? आज सिर्फ अतीत का जश्न नहीं है; यह हमारी बाकी बची हुई जिंदगी का पहला दिन है।”
कूल द ग्लोब की संस्थापक, प्राची शेवगांवकर ने साझा किया, “वर्ल्ड सस्टेनेबल डेवलपमेंट समिट के साथ मेरी यात्रा तब शुरू हुई थी, जब मैं एक छात्रा थी। तब मैं जलवायु परिवर्तन के विशाल दायरे को देखकर घबरा जाती थी और समझ नहीं आता था कि एक आम इंसान क्या कर सकता है। मैंने छोटे और व्यावहारिक कदमों से शुरुआत करने का फैसला किया और सस्टेनेबिलिटी को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाया। जो व्यक्तिगत कोशिश मेरे हॉस्टल के कमरे से शुरू हुई थी, वह आज 150 देशों के नागरिकों के सहयोग से एक साझा मिशन बन चुकी है।”
टेरी के चेयरमैन, नितिन देसाई ने कहा, “WSDS में हम यह दोहराते हैं कि सतत विकास सिर्फ एक समान लक्ष्यों के भरोसे आगे नहीं बढ़ सकता। सरकारें अकेले काम नहीं कर सकतीं; असली प्रगति तब होती है जब संस्थान, शोधकर्ता, उद्योग और ज़मीन पर काम कर रहे समुदाय एक-दूसरे से सीखते हैं। यह मंच अनुभव साझा करने, समझ बढ़ाने और सहयोग को मजबूत करने का माध्यम बनता है।”
टेरी की महानिदेशक, डॉ. विभा धवन ने कहा, “WSDS सिर्फ संकट का जवाब देने के लिए नहीं, बल्कि अवसरों के नए रास्ते बनाने का मंच है। आज की जटिल दुनिया में, जहां संसाधन सिमट रहे हैं, साझेदारी बेहद जरूरी है—हम हर बार शून्य से शुरुआत नहीं कर सकते। हमें पहले से मौजूद शोध को अपनी जरूरतों के मुताबिक ढालकर मिलकर आगे बढ़ना होगा। इस समिट के नतीजे पिछले कई वैश्विक सम्मेलनों से भी ज्यादा अहम हो सकते हैं।”
WSDS की क्यूरेटर और टेरी की निदेशक, डॉ. शैली केडिया ने बताया, “इस साल हमने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए—2,381 अलग-अलग प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, 10 मुख्य सत्र और 14 थीमैटिक ट्रैक आयोजित हुए। एक खास पहल ‘हिम-कनेक्ट’ रही, जिसने न केवल आवाज़ें बल्कि हिमालय जैसे दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों से समाधान भी सामने रखे। इन वर्षों में हम केवल चर्चा करने से आगे बढ़कर, अब ज्यादा सटीक और समाधान-केंद्रित बातचीत की ओर बढ़े हैं।”

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