
टीबी से डरो मत ,उसका इलाज करो,मरीजों को अलग मत करो,उनका साथ दो : डॉ. सरिता, मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ
RKTV NEWS/पटना ( बिहार)24 मार्च।टीबी यानी क्षय रोग एक चिकित्सकीय समस्या है, लेकिन हमारे समाज में इसे एक सामाजिक कलंक की तरह देखा जाता है। टीबी मरीजों को अक्सर भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिससे न केवल उनका शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है, बल्कि वे मानसिक और भावनात्मक रूप से भी टूट जाते हैं।
डॉ. सरिता का मानना है कि टीबी सिर्फ एक शारीरिक बीमारी नहीं है, बल्कि यह मानसिक रूप से भी व्यक्ति को कमजोर कर देती है। जब समाज मरीजों को हीनभावना से देखता है, तब वे अकेलापन, तनाव और अवसाद का शिकार हो जाते हैं। कई बार मरीज शर्मिंदगी के कारण अपनी बीमारी को छिपाने लगते हैं, जिससे सही समय पर इलाज नहीं हो पाता और रोग गंभीर हो जाता है।
भ्रम और कलंक के कारण टीबी मरीजों का संघर्ष
टीबी को लेकर समाज में कई मिथक और भ्रांतियाँ व्याप्त हैं, जो रोगियों के लिए चुनौती बन जाती हैं।
डॉ. सरिता के अनुसार, समाज में यह गलत धारणा है कि टीबी छूने से फैलता है, जबकि ऐसा नहीं है। टीबी हवा में मौजूद बैक्टीरिया से फैलता है, न कि मरीज के संपर्क में आने से।
डॉ. सरिता कहती हैं कि कई लोग यह मानते हैं कि टीबी गरीबों की बीमारी है, जबकि सच्चाई यह है कि यह रोग किसी को भी हो सकता है – चाहे वह अमीर हो या गरीब।
एक और बड़ी भ्रांति यह है कि टीबी लाइलाज है, जबकि यह पूरी तरह से ठीक होने वाली बीमारी है, यदि मरीज समय पर उचित इलाज ले।
मानसिक स्वास्थ्य पर टीबी का प्रभाव
डॉ. सरिता का मानना है कि टीबी मरीजों को सिर्फ दवाओं की नहीं, बल्कि भावनात्मक समर्थन और संवेदनशील व्यवहार की भी जरूरत होती है। जब टीबी मरीजों को समाज में हीनभावना से देखा जाता है, तो वे अवसाद, चिंता और आत्मग्लानि का शिकार हो जाते हैं।
भावनात्मक अलगाव
जब लोग टीबी मरीजों से दूरी बनाने लगते हैं, तो मरीजों को सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ता है। यह अकेलापन उनके आत्मविश्वास को कमजोर कर देता है।
अवसाद और तनाव
टीबी का लंबा इलाज और सामाजिक भेदभाव मरीजों में निराशा और मानसिक थकान को बढ़ाता है। कई बार वे इलाज बीच में ही छोड़ देते हैं, जिससे उनकी स्थिति और गंभीर हो जाती है।
आत्मग्लानि और अपराधबोध
जब मरीजों को उनके परिवार और समाज से पर्याप्त समर्थन नहीं मिलता, तो वे खुद को दोषी मानने लगते हैं, जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
टीबी मरीजों के प्रति समाज की जिम्मेदारी
डॉ. सरिता कहती हैं कि टीबी को खत्म करने के लिए सिर्फ दवा या इलाज ही काफी नहीं है, बल्कि हमें समाज में फैली भ्रांतियों को भी मिटाना होगा। टीबी मरीजों को सहयोग की आवश्यकता है, न कि भेदभाव की।
सकारात्मक व्यवहार अपनाएं
टीबी मरीजों के प्रति सहानुभूति और सहयोग का भाव रखें। उन्हें अलग-थलग करने के बजाय उनका मनोबल बढ़ाएं।
जागरूकता फैलाएं
समाज में टीबी को लेकर फैली गलतफहमियों को दूर करें। लोगों को यह बताएं कि टीबी संक्रामक है, लेकिन इसका इलाज संभव है।
भावनात्मक समर्थन दें
टीबी मरीजों को मानसिक रूप से मजबूत बनाए रखने के लिए पारिवारिक और सामाजिक सहयोग जरूरी है।
सरकारी योजनाएँ और सहायता
डॉ. सरिता के अनुसार, भारत सरकार द्वारा “राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP)” के तहत टीबी मरीजों को मुफ्त इलाज, पोषण सहायता और वित्तीय मदद दी जाती है। इसके अलावा, सरकार ने “निक्षय पोषण योजना” के तहत टीबी मरीजों को इलाज के दौरान हर महीने आर्थिक सहायता देने का प्रावधान भी किया है, ताकि वे अपनी पोषण संबंधी जरूरतें पूरी कर सकें।
मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें
डॉ. सरिता कहती हैं कि टीबी सिर्फ शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी व्यक्ति को कमजोर कर देता है। इसलिए, टीबी मरीजों के इलाज में मनोवैज्ञानिक परामर्श (counseling) को भी शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वे अवसाद और तनाव से बच सकें।
डॉ. सरिता का मानना है कि टीबी एक बीमारी है, न कि सामाजिक कलंक। टीबी मरीजों को समाज की ओर से सहानुभूति, समर्थन और सहयोग की आवश्यकता है। हमें यह समझना होगा कि भेदभाव से नहीं, बल्कि जागरूकता और सहानुभूति से ही हम टीबी को खत्म कर सकते हैं।
