
पृथ्वी और प्रकृति का संदेश!
पृथ्वी पर आप मेहमान हो, पृथ्वी का मालिक नहीं।
अगर इस संदेश को आत्मसात कर लें,
पृथ्वी के तमाम संसाधनों का दोहन रोका जा सकता है।
पर्यावरण असंतुलन पर काबू पाया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन पर अंकुश लगाया जा सकता है।
आज हमारी पृथ्वी को सबसे ज्यादा खतरा ग्लोबल वार्मिंग से है।
हमें विकास के मायने ढूंढने होंगे?
विकास किसका? विकास कहां तक?
याद है,
कोरोना के कारण विश्व में तालाबंदी थी,
पूरा विश्व स्तब्ध, मानव नि: शब्द, धरती असमर्थ,थम सी गई थी।
यह महामारी प्रकृति का संदेश था,
समझने, सोचने, सम्हालने और,
संतुलन बनायें रखनें के लिए।
मैं याद दिलाता हूं, थोड़ी सी,
लॉकडाउन के बहाने ही सही।
हमने देखा, इन थोड़े से दिनो में ही,
पृथ्वी को चैन से सांस लेने का मौका मिला तो,
खिलखिलाकर हंसती नज़र आयी पृथ्वी।
चाहूंओर बदलाव , चाहूंओर शांति दिखीं,
प्रदूषण – मुक्त धरती, पर्यावरण शुद्ध प्रकृति,
गंगा निर्मल, आकाश साफ नीला नीला।
पशु पक्षी की आजादी, चिड़ियों की गीत – संगीत सुनाई देना,
पृथ्वी का क्षरण,जल, वायु, ध्वनि में कमी आना।
यह एक संकेत था कि,
लॉकडाउन की भांति हमारा जीवन यापन हो,
अगर पूरा विश्व का रहन -सहन हो,
इसी तरह रखें जीवन-शैली क़ायम तो
सचमुच,बन जायेंगी हमारी धरती दुल्हन।
प्रकृति हमारी दुश्मन नहीं,
एक सच्चे मित्र की तरह साथी है।
जब-जब पृथ्वी पर अत्याचार हुआ है,
दोहन और बोझ बढ़ा है।
तब-तब प्रकृति ने हमें संकेत दिया है।
कोरोना एक उदाहरण हो सकता है,
प्रकृति की मार बहुत बेरहम होती है।
हम प्रकृति के संकेत को समझें,
हम सभी प्रकृति हेतु अपनी प्रवृति बदलें।
आइये, संकल्प लें।
“पृथ्वी की रक्षा, सुरक्षा का, विश्व कल्याण का।”
