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भोपाल:भ्रांतियों से परे अत्यंत अनोखी और विशिष्ट है संघ की कार्यपद्धति : डॉ मोहन भागवत

भोपाल/मध्यप्रदेश (मनोज कुमार प्रसाद)02 जनवरी। आज स्थानीय रवीन्द्र भवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का उद्बोधन अत्यंत महत्वपूर्ण, प्रभावशाली एवं आत्मगौरव को जागृत करने वाला रहा।
कार्यक्रम के मंच पर डॉ. मोहन भागवत के साथ अशोक पांडे एवं अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता एवं गुरु गोलवलकर को पुष्पांजलि अर्पित कर तथा संघ गीत “संघ चरण चल रहे, विराट हिन्दू राष्ट्र के” के सामूहिक गायन से हुआ।
अपने उद्बोधन में डॉ. भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर वर्षों से अनेक प्रकार के नरेटिव गढ़े गए हैं, जबकि संघ की कार्यपद्धति अत्यंत अनोखी और विशिष्ट है। संघ न तो पैरा मिलिट्री संगठन है, न ही कोई सेवा संस्था, फिर भी इसके जैसा दूसरा कोई संगठन नहीं है। इसी कारण इसके बारे में अनेक भ्रांतियाँ फैलाई जाती हैं।
उन्होंने कहा कि वे संघ के विषय में तथ्यात्मक सत्य समाज के समक्ष रखना चाहते हैं, जिससे लोग स्वयं संघ को समझ सकें। डॉ. भागवत ने बताया कि संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय सहभागी थे। वे समाज के व्यवहार, प्रवृत्ति और प्रतिक्रिया का गहन अध्ययन करते थे तथा सुभाषचंद्र बोस सहित अनेक क्रांतिकारियों से इस विषय पर संवाद भी करते थे।
इतिहास का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत पर आक्रमण अंग्रेजों से बहुत पहले प्रारंभ हो चुके थे। हूणों से लेकर अनेक विदेशी आक्रमण हुए। इसका मूल कारण हमारी सामाजिक एकता का अभाव था। यदि आज हम अपनी एकता को पहचान लें और संगठित होकर खड़े हो जाएँ, तो देश का भाग्य बदल सकता है।
डॉ. भागवत ने कहा कि आत्मबोध आवश्यक है—हमें यह पहचानना होगा कि हम कौन हैं। डॉ. हेडगेवार जी ने अपने प्रयोगों और अनुभवों के आधार पर एकता और गुणवत्ता पर आधारित कार्यप्रणाली विकसित की और विजयादशमी 1925 को संघ की स्थापना की। संघ की सुव्यवस्थित कार्यप्रणाली 1939 में लागू हुई।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ कभी किसी के विरोध या स्पर्धा में नहीं रहा। संघ की आकांक्षा है कि संपूर्ण समाज एकता में बंधा, गुणवत्तापूर्ण और सशक्त बने। हिंदू समाज की मूल विशेषता उसकी सर्वसमावेशिता है।
गुरु नानक देव का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बाबर के आक्रमण के समय पंजाब में अत्यंत भीषण रक्तपात हुआ। उस समय गुरु नानक देव ने सभी पंथों के लोगों को हिंदू कहकर संबोधित किया और बताया कि मार्ग भिन्न हो सकते हैं, पर लक्ष्य एक ही है। भारत में धर्म एक है, पंथ अनेक हैं। धर्म से राष्ट्र जुड़ा होता है—जब धर्म छूटता है, राष्ट्र छूट जाता है।
डॉ. भागवत ने कहा कि भारत केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि एक स्वभाव है। हिंदू होने के कारण हम सभी जुड़ सकते हैं, चाहे जाति कोई भी हो। भारत पर संकट आने पर हम सब एकजुट हो जाते हैं और देश के लिए बलिदान देने वालों का सम्मान सभी करते हैं, चाहे उनका पंथ कुछ भी हो।
उन्होंने हिंदू समाज की चार श्रेणियों का उल्लेख करते हुए कहा—

जो गर्व से कहते हैं कि हम हिंदू हैं।

जो कहते हैं कि गर्व की आवश्यकता नहीं।

जो कहते हैं कि समय आने पर बताएँगे कि हम हिंदू हैं।

जो भूल गए हैं कि वे हिंदू हैं।

उन्होंने कहा कि पहले और दूसरे वर्ग को संगठित करना प्राथमिकता है, शेष लोग भी समय के साथ जुड़ जाएंगे। समाज ही देश का भाग्य निर्धारित करता है। जिन देशों में एकता और गुणवत्ता बनी रही, उनका उत्थान हुआ; जहाँ यह नहीं रही, वहाँ पतन हुआ।
संघ की शाखाओं में अनुशासन, संयम और गौरव की शिक्षा दी जाती है—संघ का स्वरूप मूलतः यही है। समाज सदैव निस्वार्थ, उच्च चरित्र वाले महापुरुषों का अनुसरण करता है। संघ का उद्देश्य ऐसे ही व्यक्तित्वों का निर्माण करना है।
डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि स्वयंसेवक पूर्णतः स्वतंत्र होते हैं। विद्या भारती, भारतीय जनता पार्टी आदि संघ नहीं हैं—ये स्वतंत्र संगठन हैं। संघ में आने का अर्थ त्याग और समर्पण है। इसमें कुछ पाने की अपेक्षा से नहीं आना चाहिए। आज संघ के पास धन भले ही अधिक न हो, पर अभाव भी नहीं है और प्रभाव भी पर्याप्त है। सौ वर्षों से संघ इसी त्याग से चल रहा है।
उन्होंने कहा कि समाज में जितना बुरा दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक अच्छा कार्य हो रहा है। सज्जन लोग सभी समाजों में हैं, बस उन्हें यह जानने की आवश्यकता है कि वे अकेले नहीं हैं। ऐसे लोग यदि एकजुट होकर पूरक रूप में कार्य करें, तो समाज में पंच परिवर्तन संभव है।
उन्होंने पंच परिवर्तन के बिंदुओं के रूप में सामाजिक समरसता, पारिवारिक समरसता, सप्ताह में एक दिन परिवार के साथ समय बिताना, सामूहिक भजन, संवाद, मोबाइल से दूरी, समाज के लिए समय देना, पर्यावरण संरक्षण, सिंगल यूज प्लास्टिक का त्याग, अपनी भाषा-भोजन-वेशभूषा का संरक्षण, सामाजिक नियमों की चर्चा और एक प्रांतीय भाषा सीखने का आग्रह किया।
उद्बोधन के अंत में उन्होंने कहा कि यदि उनकी बातें समझ में न आएँ, तो संघ से जुड़कर अनुभव करें। देश को महान बनाने का कार्य हमें स्वयं करना होगा—कोई और यह कार्य नहीं करेगा।

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