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गाँव- गँवई की क़लम से …

रचनाकार:गोलोक बिहारी( नई दिल्ली)
गाँव- गँवई की क़लम से..

बचपन से ही वो समझता था ,
बुके फूलों का एक गुच्छा ही तो है
गुच्छे के वो फूल जो उसके हिस्से में नहीं आये ,
उसके पास तो थे
सरसों के फूल,
सहजन के फूल ,
लौकी और कुम्भड़ के फूल ,
तोरई और इसी प्रकार की अन्य तरकारियों के फूल ।

कभी- कभी इनसे हटकर
उसने देखे थे
सेमल, कचनार और अमलतास के भी फूल
पर इन फूलों को उसने कभी भी
बुके में सजते- सवरते नहीं देखा।

उसकी अपनी कापियों में मिलते थे,
मोर के पंख । पर
गुलाब के फूल भी कापियों में रखे जाते हैं,
उसने कभी नहीं जाना था ।

फिर जीवन में परिवर्तन आया,
वो शहर आया,
और ,
पहली बार उसने ख़रीदा
एक बुके
और,
फिर उसे लगा
कहीं खो गया है
उसका पुरुषार्थ,
वो भी हो गया है,
पाखंडी,
समाज के और लोगों की तरह ।

उसे अब दुःख था
इस बात का कि अब वो भी,
धरती से जुड़ा नहीं रहा ।

उसकी बंधी मुठ्ठियां
अब क्रांति के लिए नहीं उठती,
अब उसके ओंठों पर गाँव के
भाव भरे गीतों की जगह थे
निरर्थक शब्दों से परिपूर्ण
शोर से भरे संगीत वाले
भद्दे गीतों के बोल ।

और देखिये उसके चेहरे पर
अब,
कोई शिकन भी नहीं है
कहाँ खो गया
वो गाँव का भोला इन्सान …

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