
बक्सर/ बिहार (प्रभाकर मिश्रा) 18 दिसंबर।18 दिसम्बर के भोजपुरी के महान कवि, लेखक, साहित्यकार, नाटककार “स्वर्गीय भिखारी ठाकुर” के जन्मदिवस के अवसर पर स्वर्गीय भिखारी ठाकुर के संक्षिप्त जीवन परिचय पढ़ी अउर उनका बारे में जानी सभे।
भोजपुरी के ‘शेक्सपीयर’ कहाए वाला प्रसिद्ध कवि, साहित्यकार, रचनाकार “भिखारी ठाकुर” के जनम बिहार के सारण जिले के कुतुबपुर (दियारा) गांव में 18 दिसंबर 1887 ई. के एगो नाऊ परिवार में भइल रहे।
स्वर्गीय ठाकुर के रचना से ही भोजपुरी बोली के पूरा दुनिया में एगो अलग पहचान मिलल।
भिखारी ठाकुर के परिचय इ दु लाइन के पंक्ति से समझल जा सकता बा :—
केहु कहत बा राय बहादुर,
केहु कहत बा शेक्सपीयर,
केहु कहत बा कवि भिखारी,
घर कुतुबपुर दीपक……!
भिखारी ठाकुर के बाबूजी के नाम दल सिंगार ठाकुर अउर माई के नाम शिवकली देवी रहे।
भिखारी ठाकुर के मातृभाषा भोजपुरी रहे। उहा के आगे चलके आपन काव्य अउर नाटक के भोजपुरी भाषा में ही बनवनि।
भिखारी ठाकुर के बारे में हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह जी अपना एगो हिंदी कविता में लिखले रहलें कि :—
अब तो ये बहस चलती ही रहेगी,
कि नाच का आज़ादी से रिश्ता क्या है..?
और अपने राष्ट्रगान की लय में वह ऐसा क्या है..?
जहां रात-बिरात जाकर आवाज टकराती है…..।
ई कविता के बोल बिदेसिया के लय में रहे..।
भोजपुरी समाज में भिखारी ठाकुर के लोकप्रियता के देख के महाज्ञानी, महापंडित “राहुल सांकृत्यायन” भिखारी ठाकुर के भोजपुरी के अनगढ़ हीरा कहले रहलन। आ उहे नाही भिखारी ठाकुर के बेहतरीन नाटक के रचना खातिर प्राचार्य मनोरंजन प्रसाद सिन्हा, भिखारी ठाकुर के भोजपुरी के ‘शेक्सपीयर’ कहले रहलन।
भिखारी ठाकुर के अमर अउर महान रचना ‘बिदेसिया’ पे जब एसएन त्रिपाठी 1963 में जब फिलिम बनवले, तब भिखारी ठाकुर एकदम से राष्ट्रीय फलक पर आ गइलन। उ फिलिम के गीत अउर संगीत आज भी यादगार बा अउर भोजपुरी के चाहत रखे वाला लोग ई फिलिम के बड़ी पसंद करें लन।
इ फिलिम के गाना भिखारी ठाकुर के नाटक बिदेसिया से ही लिहल गइल रहे।
फिलिम में ‘बिदेसिया’ के नायक कहेला की, “हम आतना धन कमा ले ले बानी की दरिद्र हो गइल बानी” ई समाज के सच्चाई के शब्द देबे खातिर काफी रहे।
जवना घरी भिखारी ठाकुर आपन भोजपुरी रचना के शब्द देबे में जुटल रहनि, ओहघरी समाज तेज़ी से बदलल जात रहे, अउर उ बदले वाला समाज मुख रूप से पैसा के चाह में कदमताल करे वाला रहल।
गांव में खेती पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होखे लागल रहे, घरेलु कुटीर उद्योग घटल जात रहे, गांव के बहुत बड़ आबादी शहर के तरफ पलायन करत रहे।
अइसना वक्त में अपना में मस्त भिखारी ठाकुर बिरहा-कजरी, लोरिक-व्रिजभान अउर आल्हा के तर्ज पर अपना संगीतमय नाटक के रचना करत रह गइनी।
आजुवो भोजपुरी मनोरंजन के दुनिया भिखारी ठाकुर से ही शुरू होखे ला, उनकर संगीत लोककंठ में बसल कबो ना थाके वाला संगीत ह।
कतने जाना आरोप लगावे ला कि स्वाधीनता संग्राम के उथल-पुथल के दौर में भिखारी ठाकुर मस्त होके नाचते रह गइलन, लेकिन सच्चाई इहे रहे कि भिखारी ठाकुर के नाच के आज़ादी से सघन रिश्ता रहे।
अंग्रेजन से देशमुक्ति के कोलाहल के बीच एने उनकर नाच देश के अधवा आबादी के मुक्ति संघर्ष के ज़मीन रचत रहे।
भिखारी ठाकुर के आवाज़ अधरतिया के आवाज़ रहे, अंधेरा में रोवत-तड़पत अउर छाती पर मुक्का मार-मार के विलाप करत मेहरारू के आवाज रहल। ई आवाज़ मुक्ति संग्राम में नारा अउर जयघोष के चीरत, गूंजत आवाज रहे अउर उ आवाज आज भी गूंज रहल बा।
भिखारी ठाकुर के पढ़ाई-लिखाई ढंग से त ना हो पाईल रहे, लेकिन ई उनकर विद्वता रहे कि आज के डेट में ढेर पढल लिखल लोग उनकर किताबन पर शोध करत बा लोग।
जेवना समाज में नाच कइल अउर देखल बढ़िया ना मानल जात रहे ओहिजा भिखारी ठाकुर नाच के माध्यम से ही समाज के ज्वलंत मुद्दा के सुर देबे के काम करत रहलन।
उ एगो समय रहे जब भिखारी ठाकुर के नाम ही काफी रहे, जनता के बीच भिखारी ठाकुर के प्रति अतना दीवानगी रहे कि उनकर नाच के देखे खातिर लोग बड़ी दूर दूर से आवे, कबो कबो त उनकर कार्यक्रम बढ़िया से सफल होखे ओकरा खातिर पुलिस के व्यवस्था करे के परत रहे।
भिखारी ठाकुर के लिखल क़िताब वाराणसी, हावड़ा और छपरा से प्रकाशित भइल रहे, जेकरा में प्रमुख रहे, ‘बिदेसिया’, ‘भाई-बिरोध’, ‘बेटि-बेचवा’, ‘कलयुग प्रेम’, ‘गबर घिचोर’, ‘गंगा स्नान’, ‘ननद-भौजाई’, ‘बहरा बहार’, ‘कलियुग-प्रेम’, ‘राधेश्याम-बहार’ अउर ‘बिरहा-बहार’।
फेर आइल उ मनहूस दिन की विधाता हमनी के भिखारी के छीन के भोजपुरी भाषा के भिखारी बना दिहलन।
10 जुलाई 1971 ई. के 84 साल के उम्र में भोजपुरी भाषा के सृंगार, ध्वजवाहक, अउर सबसे बड़ कलाकार के निधन हो गइल।
भिखारी ठाकुर अब हमनी के बीच नइखन , लेकिन उनकर गावल अउर लिखल गीत आजुवो सगरो गूंजत रहेला।
भिखारी ठाकुर खाली भोजपुरी गीत-संगीत के ही वरीयता देबे के काम ना कइनी बल्कि नाच पार्टियन के दौर में भी आपन रंगमंडली बनाके अइसन अइसन नाटक खेललन की जवन भोजपुरी भाषा के पहचान बन गइल अउर नाचे गावे वालन कलाकारन के भी खूब सम्मान मिलल।
अपना मंडली के प्रति आतना सजग रहस कि केहू के मजाल ना रहे कि भिखारी ठाकुर के संगे काम करे वाला नायक,नायिका के संगे केहू छेड़छाड़ कर देउ।
भिखारी ठाकुर के जीवन पर एगो कथाकार संजीव “सूत्रधार” नाम से उपन्यास भी लिखले बाड़न।
एगो ज़माना रहे कि चक्की पीसत औरत भिखारी ठाकुर के विदेशिया के मर्मस्पर्शी गीत के बहाने कलकत्ता भाग गइल अपना पति के दुःख गाके रोवत रहे लोग।
आज के समय मे कतनों भोजपुरी के गवनई में वियोग के गाना आइल, लेकिन भिखारी ठाकुर द्वारा रचित विदेशिया में जवन वियोग वाला गाना बा उ आजुवो भोजपुरी श्रोता के रोवावे खातिर काफी बा।
आज फिर से आधुनिकता के युग मे आपन भोजपुरी मातृभाषा लंगटे होखत बिया, आई सभ भोजपुरी समाज मिलके संकल्प लिहि जा की , ना भोजपुरी में अश्लील सुनब जा अउर ना अश्लील गावे वाला के बढ़ावा देब जा। प्रयास करि जा अपने से आगा, बदलाव खुद प खुद नजर आवे लागि।
