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उपराष्ट्रपति ने उपराष्ट्रपति-एन्क्लेव में सिविल सेवा अधिकारी प्रशिक्षुओं के साथ बातचीत की।

उपराष्ट्रपति ने राष्ट्र निर्माण में यूपीएससी और प्रशिक्षण संस्थानों की भूमिका को रेखांकित किया।

धैर्य और दूसरों को ध्यान से सुनना मानवीय शासन के मूल तत्व हैं: उपराष्ट्रपति

सरदार पटेल का रियासतों का एकीकरण एक बेमिसाल वैश्विक उपलब्धि है: उपराष्ट्रपति

उच्च स्वर में कही गयी बातें प्रचलित हो सकती हैं, लेकिन सार्थक बहस स्थायी सार्वजनिक विश्वास का निर्माण करती है: उपराष्ट्रपति

RKTV NEWS/नई दिल्ली 14 दिसंबर।उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज उपराष्ट्रपति एनक्लेव, नई दिल्ली में भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और भारतीय वन सेवा (आईएफओएस) के अधिकारी प्रशिक्षुओं के साथ बातचीत की। ये अधिकारी हरियाणा लोक प्रशासन संस्थान (एचआईपीए) में विशेष फाउंडेशन कोर्स कर रहे हैं।
भारत के “लौहपुरुष” सरदार वल्लभभाई पटेल को याद करते हुए, उपराष्ट्रपति ने रियासतों के एकीकरण और अखिल भारतीय सेवाओं की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जहाँ ओट्टो वॉन बिस्मार्क ने जर्मनी का एकीकरण किया, जहाँ लोग एक ही भाषा बोलते थे, वहीं सरदार पटेल ने एक ऐसे राष्ट्र के एकीकरण का कहीं अधिक जटिल कार्य किया, जहाँ भाषाई और सांस्कृतिक विविधता बहुत अधिक थी। उन्होंने कहा कि यह अद्वितीय उपलब्धि दुनिया के अन्य हिस्सों में किए गए ऐसे तुलना योग्य प्रयासों से कहीं आगे है।
उपराष्ट्रपति ने सक्षम अधिकारियों के चयन में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की भूमिका की सराहना की, साथ ही उन्होंने ऐसे प्रशिक्षण संस्थानों जैसे एचआईपीए की भी प्रशंसा की, जो सार्वजनिक सेवा के लिए आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। राष्ट्र विकसित भारत @2047 की ओर आगे बढ़ रहा है, उन्होंने अधिकारियों से भगवद गीता की भावना में अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने का आग्रह किया। उन्होंने उन्हें अपने कर्म पर ध्यान केंद्रित करने और हमेशा धर्म के पक्ष में खड़े रहने की सलाह दी।
सार्वजनिक सेवा में जिम्मेदार और उत्तरदायी कार्य पर जोर देते हुए, उपराष्ट्रपति ने फाइलों और मामलों के समय पर निपटारे की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने दक्षता और सेवा अदायगी में सुधार के लिए प्रौद्योगिकी के प्रभावी उपयोग पर बल दिया।
बातचीत के दौरान, उपराष्ट्रपति ने सार्वजनिक जीवन में धैर्य के महत्व के बारे में बताया। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी, एन. जी. रंगा, एन. जी. गोरे जैसे सांसदों को याद किया और उल्लेख किया कि उनका सार्वजनिक समर्थन लंबे समय तक बना रहा, जिसकी शुरुआत उनके बहसों की गुणवत्ता से हुई थी। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के युग में, ऊंचे स्वर में कही गयी बातें अक्सर ध्यान आकर्षित करती हैं, लेकिन ऐसी लोकप्रियता आम तौर पर अस्थायी होती है।
उपराष्ट्रपति ने प्रभावी और मानवीय शासन के लिए धैर्य और दूसरों को ध्यान से सुनने को आवश्यक उपकरण बताया। उन्होंने कहा कि जनता की शिकायतों को सुनना, अक्सर समस्या का एक बड़ा हिस्सा हल कर देता है।
अधिकारी प्रशिक्षुओं से प्रश्नों का उत्तर देते हुए, उपराष्ट्रपति ने निरंतर सीखने, धर्म के पालन और धैर्य के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर उपलब्ध जानकारी के अधिभार, झूठी जानकारी और नकारात्मक खबरों की चुनौती पर भी बात की। उन्होंने अधिकारियों को सकारात्मक और रचनात्मक गाथाओं को बढ़ावा देने की सलाह दी। उन्होंने ऑनलाइन सामग्री साझा करने से पहले सामाजिक जिम्मेदारी की आवश्यकता पर बल दिया और जिम्मेदार डिजिटल व्यवहार को प्रोत्साहित करने के लिए उचित कार्य की अपील की।
इस बातचीत से युवा अधिकारियों को नेतृत्व, शासन और नैतिक सार्वजनिक सेवा के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई।

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