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मैं गांधी को केवल सुनता और पढ़ता नहीं बल्कि गांधी में जीता हूं , मैं चंपारण का हूं: प्रो. मजहर आसिफ

जामिया मिल्लिया इस्लामिया का 105वां स्थापना दिवस : गांधी के ‘स्वराज’ पर सार्थक विमर्श, दूरदर्शन के महानिदेशक के. सतीश नम्बूदिरीपाद मुख्य अतिथि रहे।

RKTV NEWS/नई दिल्ली 01नवंबर।जामिया मिल्लिया इस्लामिया ने अपने 105वें स्थापना दिवस के अवसर पर एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया। विश्वविद्यालय के नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रेज़ॉल्यूशन द्वारा आयोजित इस विशेष संगोष्ठी का विषय था — “महात्मा गांधी का स्वराज”।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में के. सतीश नम्बूदिरीपाद, महानिदेशक, दूरदर्शन ने भाग लिया, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति प्रो. मज़हर आसिफ ने की। इस अवसर पर कई विद्वानों और शिक्षाविदों ने महात्मा गांधी के विचारों और स्वराज की समकालीन प्रासंगिकता पर अपने दृष्टिकोण साझा किए।

“स्वराज आत्म-नियंत्रण और नैतिकता की परिकल्पना है” : के. सतीश नम्बूदिरीपाद

मुख्य अतिथि सतीश नम्बूदिरीपाद ने अपने संबोधन में कहा कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसे ऐतिहासिक और प्रेरणादायक संस्थान में बोलना अपने आप में गौरव की बात है। उन्होंने कहा, “जामिया केवल एक विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के इतिहास, संस्कृति, विकास और आकांक्षाओं का प्रतीक है।”
उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों की प्रासंगिकता पर चर्चा करते हुए कहा कि ‘स्वराज’ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आत्म-नियंत्रण, नैतिकता और सामूहिक कल्याण का प्रतीक है। उन्होंने गांधी के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख किया —
“इस दुनिया में सबकी ज़रूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त है, पर किसी के लालच के लिए नहीं।”
डॉ. नम्बूदिरीपाद ने कहा कि जब वे राष्ट्रीय ग्राम विकास संस्थान (NCRI) में महासचिव थे, तब उन्होंने वार्धा में गांधीवादी विचारकों नारायण देसाई और डॉ. सुदर्शन अय्यंगर से प्रेरणा प्राप्त की। उन्होंने यजुर्वेद के मंत्र “विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन अनातुरम्” का उल्लेख करते हुए कहा कि “ग्राम्य समृद्धि और संतुलित जीवन ही वास्तविक स्वराज का सार है।”
उन्होंने आज के दौर में “आदर्शवाद बनाम यथार्थवाद”, “विकास बनाम संतोष” और “शहरीकरण बनाम ग्रामीण जीवन” की बहसों का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधी का स्वराज आज भी इन सभी द्वंद्वों का मानवीय समाधान प्रस्तुत करता है।

“मैं गांधी को पढ़ता नहीं, जीता हूं”:प्रो. मज़हर आसिफ, कुलपति जामिया

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. मज़हर आसिफ, कुलपति, जामिया मिल्लिया इस्लामिया ने कहा, “दुनिया महात्मा गांधी को पढ़कर और सुनकर जानती है, लेकिन मैं गांधी को जीता हूं, क्योंकि मैं उस चंपारण का हूं, जहां से गांधी के सत्याग्रह की शुरुआत हुई थी।”
उन्होंने कहा कि “दो महापुरुषों — गांधी और चाणक्य — ने अपने साथ हुए अन्याय को समाज सुधार का साधन बनाया। गांधी ने अंग्रेजों को भारत से निकाला और चाणक्य ने अन्यायपूर्ण शासन को समाप्त किया। दोनों ने अपने गुस्से को सकारात्मक दिशा दी।”
कुलपति ने गांधी की सादगी का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने देश की गरीबी देखकर जीवनभर एक साधारण धोती में जीवन व्यतीत किया। उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी न केवल जामिया मिल्लिया इस्लामिया के समर्थक थे, बल्कि इसके संस्थापक सहयोगियों में से एक थे। जब विश्वविद्यालय आर्थिक संकट में था, तब गांधी ने कहा था — “जामिया को चलना है, चाहे मुझे भीख क्यों न मांगनी पड़े।” गांधी के पुत्र ने शुरुआती दिनों में जामिया में शिक्षक के रूप में सेवा भी दी थी।

अन्य वक्ताओं के विचार

उद्घाटन भाषण में रजिस्ट्रार प्रो. मोहम्मद महताब आलम रिज़वी ने कहा कि नेल्सन मंडेला सेंटर गांधी के सिद्धांतों को आत्मसात कर आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि गांधी के स्वराज के सिद्धांत पर चलकर भारत आत्मनिर्भर बन सकता है।
डीएसडब्ल्यू प्रो. नीलोफर अफ़ज़ल ने जामिया के “तालीम, तहज़ीब और तबीयत” के गांधीवादी सिद्धांत पर बोलते हुए कहा कि विश्वविद्यालय की आत्मा इन्हीं मूल्यों में बसती है। उन्होंने आगामी छह दिवसीय तालीमी मेला की भी जानकारी दी।
महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी के पूर्व कुलपति प्रो. संजीव कुमार शर्मा ने कहा कि “गांधी होना आसान नहीं है, क्योंकि वे अपने विरोधियों को भी सम्मान देते थे। यही गांधी के स्वराज की व्यापकता है।”
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. संजीव कुमार ने गांधी के स्वराज को आधुनिक समाज में पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।

कार्यक्रम का संचालन और समापन

कार्यक्रम की शुरुआत क़ुरान की तिलावत से हुई, जिसके बाद जामिया के छात्रों ने विश्वविद्यालय का तराना प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. विनीश मरियम ने किया। कार्यक्रम के सह-संयोजक सुधांशु त्रिवेदी थे।
कार्यक्रम का समापन महात्मा गांधी के विचारों को पुनः स्मरण करते हुए इस संदेश के साथ हुआ कि —
“स्वराज केवल शासन की परिकल्पना नहीं, बल्कि आत्म-शासन और नैतिक जीवन की साधना है।”

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