
खैरागढ़/छत्तीसगढ़ (रवींद्र पांडेय) 9 सितंबर। विश्वविख्यात पंडवानी गायिका पद्मविभूषण श्रीमती तीजन बाई ने गांव-कस्बों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पंडवानी लोक गायिकी को प्रतिस्थापित किया है। उनके अविस्मरणीय योगदान को याद करते हुए इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के लोक संगीत विभाग द्वारा कल ‘चौंरा से अंतरराष्ट्रीय मंच तक तीजन बाई’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा रहीं। अध्यक्षता प्रो. डॉ. राजन यादव अधिष्ठाता लोक संगीत एवं कला संकाय ने की। सर्वप्रथम अतिथियों के स्वागत पश्चात मां सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। इसके पश्चात विभाग की अतिथि व्याख्याता डॉ. विधा सिंह ने पीपीटी के माध्यम से पद्म विभूषण तीजन बाई के जीवन वृत्त पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि किस तरह भिलाई के गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई ने समीप के गांव में अपनी पहली प्रस्तुति शुरू कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त की। तीजन बाई कापालिक शैली में पंडवानी करने वाली प्रथम महिला हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्म विभूषण सहित डी. लिट जैसी उपाधियां अपने नाम की। महिला होने के बावजूद आर्थिक एवं सामाजिक परेशानियों का सामना कर तीजन बाई ने पंडवानी गाना नहीं छोड़ा, जिसका परिणाम है कि आज उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं वरन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विख्यात है। इसके बाद लोक संगीत के छात्र जयंत ने तीजन बाई के नामकरण सहित उनके जीवन के संघर्षों की जानकारी दी। छात्र समीर ने उनके सरल स्वभाव के साथ शुरुआती दौर में अपने नाना जी के सानिध्य में तीजन बाई के द्वारा पंडवानी गायन की शुरुआत करने के संबंध में बताया।
लोक कला एवं लोक संस्कृति की झलक लोक संगीत विभाग में दिखाई देती है: कुलपति
कार्यक्रम में छात्रा ईशा बघेल ने तीजन बाई द्वारा अपने तमूरा के लिए गाए गए गीत की प्रस्तुति दी। इसके बाद कापालिक शैली में महाभारत के द्रौपदी चीरहरण प्रसंग की पंडवानी प्रस्तुत की। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा ने कहा कि लोक कला एवं लोक संस्कृति की झलक लोक संगीत विभाग में दिखाई देती है, जो यहां की खासियत है। ऐसे कार्यक्रमों को विद्यार्थियों के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण एवं ज्ञानवर्धक बताया और विद्यार्थियों को गहनता के साथ अध्ययन करने की बात कही। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में जो अवसर मिल रहा है उसका लाभ लें, ऐसे अवसर आपके जीवन में दोबारा नहीं आने वाले हैं। अधिष्ठाता प्रो. डॉ. राजन यादव ने कहा कि एक समय ऐसा था जब तीजन बाई दो लालटेन के बीच अपना कार्यक्रम देती थीं, यह बताता है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता, हर छोटा काम बड़े काम का पृष्ठभूमि बनाता है। यही कारण है कि आज तीजन बाई चौरा से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच पाई हैं। उन्होंने कहा कि बड़ा कलाकार बनने के लिए बहुत ही संघर्ष और जद्दोजहद करनी पड़ती है तब कहीं जाकर वे इस मुकाम तक पहुंच पाते हैं। प्रो. यादव ने मैथिलीशरण गुप्त की कविता जितने कष्ट कंटकों में है, के माध्यम से विद्यार्थियों को प्रेरित किया।
संचालन करते हुए कार्यक्रम की संयोजक एवं सहायक प्राध्यापक लोक संगीत विभाग डॉ. दीपशिखा पटेल ने बताया कि तीजन बाई ने इस विश्वविद्यालय में भी अपने कार्यक्रम की प्रस्तुति दी है, जो हमारे लिए गर्व की बात है। इस विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट की उपाधि से भी नवाजा है। इस दौरान सेमिनार कार्यक्रम, स्वतंत्रता दिवस एवं चक्रधर समारोह रायगढ़ में प्रस्तुति देने वाले विद्यार्थियों को कुलपति द्वारा प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। अंत में आभार प्रदर्शन अतिथि व्याख्याता डॉ. परमानंद पाण्डेय ने किया। इस अवसर पर पंडवानी गायन में डॉ. बिहारी लाल तारम ने बैंजो, रामचंद्र सरपे ने तबला, वेदप्रकाश ने ढोलक एवं समीर साहू ने घुंघरू में संगत किया तथा हर्ष चंद्राकर ने रागी की भूमिका निभाई।
