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गंगा की मिट्टी और जल से होती है मोक्ष की प्राप्ति : श्री जीयर स्वामी जी महाराज

गंगा भगवान वामन के चरण कमल से निकली है : श्री जीयर स्वामी जी महाराज

RKTV NEWS/पीरो (भोजपुर)03 सितंबर।परमानपुर चातुर्मास्‍य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्‍न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि गंगा के जल और मिट्टी का बहुत ही विशेष महत्व बताया गया है। गंगा के जल और मिट्टी के स्पर्श से व्यक्ति का मृत्यु सुधर जाता है। एक बार एक पिता और पुत्र एकादशी के दिन गंगा स्‍नान करने के लिए जा रहे थे। उनके साथ उनके पुरोहित भी थे। वहीं रास्ते में रात हो गया। वेलोग पास के एक स्थान पर चले गए। जहां पर शादी विवाह का आयोजन की तैयारी की जा रही थी। गलती से रात के समय में पुराेहित जी प्रेतों के आश्रय पर चले गए। जहां पर भूत प्रेत वास करते थे। वहीं भूत प्रेतों के द्वारा भी शादी विवाह की तैयारी की जा रही थी। वहीं पर कई प्रकार के मिष्ठान इत्यादि भी बने थे।
पंडित जी ने पूछा कि यहां पर किस चीज का तैयारी चल रहा है। भूतों ने कहा कि विवाह की तैयारी हो रही है। मेरी एक पुत्री है, जिसका विवाह करना है। उसी का तैयारी चल रहा है। वहां पर मिष्ठान भी भूतों के द्वारा उस पंडित जी को दिया गया। व्यापारी सुबह में वहां से निकल करके आगे बढ़ने लगे। कुछ दूर आगे बढ़े तो जो भूतों के द्वारा मिष्ठान दिया गया था, वह विष्ठा के समान हो गया। वही पिता और पुत्र दोनों लोग गंगा के तट के किनारे आगे बढ़ रहे थे। तब तक अचानक एक सांड आ गया। जिसका सींग बहुत बड़ा था। वह सांड व्यापारी के पुत्र को वही गंगा के पावन तट पर सींग से प्रहार करके मार डाला।
जब सांड के द्वारा व्यापारी के पुत्र को मारा जा रहा था, उस समय गंगा की मिट्टी भी उस व्यापारी के पुत्र के शरीर को स्पर्श कर रही थी। सांड के द्वारा व्यापारी के पुत्र को मारते-मारते गंगा के जल के अंदर तक लेकर जाया गया। जिसके कारण व्यापारी का पुत्र वहीं पर समाप्त हो गया। वह व्यापारी बहुत दुखी हुए। रोते हुए वापस उसी रास्ते से लौट रहे थे। लौटते समय फिर एक बार पुनः उस स्थान पर गए जहां पर आते समय रुके थे। वहां पहुंचने के बाद देख रहे हैं कि वहां पर सारे लोग रो रहे हैं। उस व्यक्ति ने उन भूत प्रेतों से पूछा कि आप लोग क्यों रो रहे हैं, क्या हुआ। वह सभी भूत-प्रेत सामान्य मानव की तरह दिखाई पड़ रहे थे। उन भूत प्रेतों ने कहा कि मेरी बेटी का जो शादी होने वाला था, उसका शादी जिस लड़के से ठीक हुआ था, वह लड़का अब नहीं रहा।
व्यापारी ने पूछा कि किस लड़के से शादी होने वाला था। वही भूत प्रेतों ने उस लड़के का नाम बताया, जो व्यापारी के ही पुत्र थे। जिनका मृत्यु हो गया था। वह मर करके प्रेत योनि को प्राप्त करने वाले थे। लेकिन गंगा के तट पर मिट्टी और गंगा के जल के स्पर्श होने के कारण वह व्यापारी का पुत्र मोक्ष को प्राप्त कर गए। इसीलिए गंगा के जल और पावन तट का विशेष महत्व बताया गया है। कभी-कभी लोग गंगा के तट पर शौच, दंतधावन, कुला इत्यादि करने लगते हैं, जो कि बहुत ही गलत है।
गंगा नदी में आप स्नान करके अपने जीवन को कृतार्थ करते हैं। उस गंगा नदी के पावन तट पर गंदगी फैलाते हैं, तो पाप का भागी बनते है। इसीलिए कभी भी गंगा, जमुना या किसी भी नदी के पावन तट पर गंदगी नहीं फैलाना चाहिए। क्योंकि बताया गया है कि तीर्थ क्षेत्र में जो गलती कर दिया जाता है, उसका दंड भोगना पड़ता है। इसीलिए कभी भी किसी भी तीर्थ क्षेत्र में गलती से भी गलती नहीं करना चाहिए।

गंगा पृथ्वी पर कैसे अवतरित हुई

राजा सगर जो भगवान श्री राम के वंशज थे। उनके द्वारा एक यज्ञ किया जा रहा था। उनके यज्ञ के घोड़े इंद्र के द्वारा चुराकर के भगवान कपिल देव के आश्रम पर छुपा दिया गया। वहीं पर भगवान कपिल देव तपस्या साधना कर रहे थे। राजा सगर के पुत्रों के द्वारा यज्ञ के घोड़े को खोजा जा रहा था। खोजते खोजते कपिल देव भगवान के आश्रम पर पहुंचे। जहां पर उनका घोड़ा बंधा हुआ था। वहीं राजा सगर के पुत्रों के द्वारा भगवान कपिल देव को अपमानित शब्दों के द्वारा संबोधित किया जाने लगा। अचानक भगवान कपिल देव का नेत्र खुल गया तथा नेत्र खोलते ही राजा सगर के सारे पुत्र वहीं पर समाप्त हो गए।
वहीं राजा सगर को जब इस बात का जानकारी हुआ, तब वह अपने पुत्रों को वापस प्राप्त करने के लिए कपिल देव भगवान से प्रार्थना करके उपाय पूछे। जिसके बाद कपिल देव ने कहा कि तपस्या साधना करके गंगा को लेकर आईए। जिनके जल के स्पर्श से यह सभी लोगों को मोक्ष प्राप्‍त होगा। वहीं राजा सगर के पुत्र अंशुमान तपस्या करने लगे। उनके तपस्या से भी गंगा प्रसन्न नहीं हुई। फिर उनके वंश परंपरा में अगली पीढ़ी के लोग भी गंगा को लाने के लिए तपस्या किए। तब भी गंगा प्रसन्न नहीं हुई। वहीं तीसरी पीढ़ी में जब राजा सगर के वंश परंपरा में भागीरथी हुए। वे जब तपस्या साधना किए तब गंगा प्रसन्न हुई।
वही राजा सगर के वंश परंपरा में तीन जन्म तक तपस्या करने के बाद पृथ्वी लोक पर गंगा आने के लिए अनुमति दी। लेकिन गंगा का जन्म कैसे हुआ, सबसे पहले गंगा कहां से निकली, यह भी हमें समझना चाहिए। जब राजा बलि के द्वारा देवताओं पर अनुशासन किया जा रहा था। राजा बलि अपने आप को सबसे बड़ा दानी समझने लगे थे। वहीं देवता लोग भगवान श्रीमन नारायण के पास जाकर के विनती किए। भगवान राजा बलि से हम लोगों की रक्षा कीजिए। वही भगवान श्रीमन नारायण वामन के रूप में बक्सर में प्रकट हुए।
बालक के रूप में वामन भगवान प्रकट होने के बाद राजा बलि के पास पहुंचे। जहां पर राजा बलि यज्ञ करके दान इत्यादि कर रहे थे। वही भगवान वामन राजा बलि से तीन पग भूमि दान करने के लिए कहे। राजा बलि ने भी अपना अनुमति दे दिया। जबकि राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य मना कर रहे थे कि यह साक्षात विष्णु के अवतार हैं। तुम इन्हें दान का वचन मत दो। फिर भी राजा बलि ने तीन पग भूमि दान करने का वचन दिया। जिसके बाद वामन भगवान ने पहले ही पग में ब्रह्म लोक तक माप दिए। जब भगवान वामन का पैर ब्रह्म लोक में पहुंचा तब वहीं पर ब्रह्मा जी ने भगवान वामन के पैरों को धो करके कमंडल में रख लिए। वही सबसे पहले गंगा का नाम विष्णु पादकी गंगा पड़ा।
आगे चलकर देवताओं ने भी ब्रह्मा जी से प्रार्थना किया पितामह देवलोक में भी गंगा जी का वास होना चाहिए। जिससे हम देवताओं का भी कल्याण होगा। वही ब्रह्मा जी ने थोड़ा सा जल देवलोक में भी गिरा दिया। जिसके बाद गंगा देवलोक में देव गंगा के नाम से जानी गई। जब भागीरथी के द्वारा तपस्या साधना करके गंगा जी को प्रसन्न किया गया। वहीं देव गंगा पृथ्वी पर आने के लिए अनुमति प्रदान की। जिसके बाद गंगा जी ने कहा कि मेरे धार को पृथ्वी पर कैसे नियंत्रित किया जाएगा। क्योंकि मेरे जल का वेग इतना ज्यादा है कि उससे पृथ्वी पर उत्तल-पुथल मच सकता है। वही शिव जी ने गंगा जी को सबसे पहले अपनी जटा में धारण किए।
जिसके बाद गंगा जी का तीसरा नाम जटाशंकरी गंगा पड़ा। वही शिव जी के जटा से गंगा जी का जल धीरे-धीरे नीचे आया जो उत्तराखंड के गोमुख के नाम से जाना जाता है, वहीं गोमुख से गंगा गंगोत्री होते हुए हरिद्वार में पहुंचती है। हरिद्वार में गंगा, गंगा के नाम से जानी गई। गंगा पृथ्वी पर आई जैसे-जैसे भागीरथ जी अपने रथ को लेकर के आगे बढ़ रहे थे, पीछे-पीछे गंगा जी इस रथ के पहिए पर पीछे-पीछे चल रही थी। वही आगे चलकर एक ऋषि का आश्रम था।
इस आश्रम के पास से भागीरथ जी आपने रथ को आगे बढ़ा दिए। जिसके बाद गंगा भी पीछे से आ रही थी। वही गंगा के पानी में उस ऋषि का आश्रम भी डूबने लगा। इसके बाद उस ऋषि ने गंगा के जल को ही पी लिया। जिसके बाद गंगा सुख गई। वही भागीरथी के द्वारा उस ऋषि से प्रार्थना किया गया, जिसके बाद वह ऋषि प्रसन्न हुए।
उन ऋषि का नाम जहु ऋषि था। अब जह्नु ऋषि ने कहा कि गंगा को कैसे निकालेंगे। यदि मुख से निकलेंगे तो जुठी हो जाएंगी। तब जह्नु ऋषि ने अपने जांघों को फाड़ करके वहीं से गंगा को बाहर निकाल दिए। जिसके बाद गंगा का नाम जाह्नवी गंगा हो गया। वही गंगा सागर में जाकर के मिली।
जिसके बाद राजा सगर के पुत्रों का कल्याण हुआ। दूसरा अगस्त ऋषि हैं। जिन्होंने समुद्र को ही तीन आचमन में साेख लिया था। एक बार दैत्य राक्षस देवताओं को परेशान करके और समुद्र में छुप जाते थे। वहीं अगस्त ऋषि ने समुद्र के सारे जल को ही सोख लिया। जिसके बाद में सभी दैत्‍य राक्षस पकड़े गए। वहीं भगवान के द्वारा उनको उचित दंड दिया गया।
श्रीमद् भागवत कथा प्रसंग अंतर्गत मनु और शतरूपा के बड़े पुत्र प्रियव्रत के वंश परंपरा में आगे चलकर भरत हुए। जिनके वंश परंपरा में भरत के पांच पुत्र हुए। उनके वंश परंपरा में एक पुत्र सुमति हुए। जिनके पुत्र आगे चलकर देवाजीत हुए। देवजीत के वंश परंपरा में नद्य हुए। उनके वंश परंपरा में आगे चलकर राजा गए हुए। राज ऋषि भरत के वंश परंपरा में आगे चित्ररथ हुए। राजा भरत के वंश परंपरा में अंतिम राजा विरज हुए। इस प्रकार से प्रियव्रत के वंश परंपरा में कई यशस्वी राजा हुए। जिन्होंने राजकाज की व्यवस्था अच्छी तरीके से संभाला।
वहीं चार प्रकार के प्रमुख मोक्ष लोक बताया गया है। जिसमें पहला सालोक्य, दूसरा सामीप्य, तीसरा सारूप्य, चौथा सायुज्य बताया गया है। सालोक्य मोक्ष का मतलब होता है कि भगवान के धाम यानी कि बैकुंठ लोक या गोलोक में निवास करना। सामीप्य मोक्ष जिसमें भगवान के बहुत निकट रहना होता है। भगवान के निकट रहने पर किसी भी तरह का घमंड अहंकार नहीं होना चाहिए। सारूप्य जिसमें भगवान के समान रूप प्राप्त करना। सायुज्य जिसमें भगवान के साथ एकाकार हो जाना। जिसमें किसी भी तरह का अहंकार, घमंड, तृष्णा कुछ भी नहीं रह जाता है। वह व्यक्ति जिसे सायुज्‍य मोक्ष प्राप्त होता है, वह भगवान में ही सम्मिलित हो जाता है।

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