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मैं कौन हूं यह समझना चाहिए :जीयर स्वामी जी महाराज

RKTV NEWS/पीरो (भोजपुर)15 अगस्त।परमानपुर चातुर्मास व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्‍न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि मैं कौन हूं, मैं किस लिए हूं, मुझे क्या करना चाहिए, इस बात को हमें समझना चाहिए। इसे समझने के लिए पांच तत्वों को जानना चाहिए। स्वशरीर मतलब मैं कौन हूं, शास्त्रों में बताया गया है कि परम ब्रह्म परमेश्वर भगवान श्रीमन नारायण के दास हैं। जितने भी प्राणी, जीव, प्रकृति, तत्व इत्यादि इस दुनिया में है वे सभी ब्रह्म के दास हैं।
क्योंकि शरीर से जब वही ब्रह्म निकल जाते हैं, तब वह शरीर इस दुनिया में पड़ा रहता है। लेकिन उसके काम करने की शक्ति खत्म हो जाता है। इसीलिए शरीर अपना नहीं है। इस दुनिया में आपके द्वारा कमाया गया धन भी अपना नहीं है। पत्नी, परिवार, बाल, बच्चे भी अपने नहीं हैं। क्योंकि जब किसी व्यक्ति को इस दुनिया से जाना पड़ता है, तब उसकी पत्नी भी घर के द्वार तक ही जाती है।
वहीं बाल बच्चे शमशान तक जाते हैं। पुत्र भी अग्नि कर्म तक साथ रहता है। उसके बाद उसका भी रिश्ता वहीं पर समाप्त हो जाता है। इस प्रकार से दुनिया में न कोई अपना है न कोई पराया है। यदि कोई अपना है तो वह परम ब्रह्म परमेश्वर ही अपना है। क्योंकि जन्म के पहले और मृत्यु के बाद यह दास, यह आत्मा, यह ब्रह्म स्वरूप भी उन्हीं परम ब्रह्म परमेश्वर में जाकर के समाहित हो जाता है।
इसीलिए संसार में शरीर के द्वारा जो कर्म किए जाते हैं, उस काम को भगवान को समर्पित कर देना चाहिए। हर व्यक्ति के द्वारा जो कर्म किया जाता है, उसमें जो अच्छा कर्म होता है, वही अच्छे कर्म धरती पर भी याद किया जाता है तथा वही अच्छे कर्म यहां से शरीर छोड़ने के बाद भी देखा जाता है। इसीलिए यदि कोई वस्तु या चीज साथ जाता है, तो वह व्यक्ति का कर्म ही उसके साथ जाता है।

दूसरा परशरीर : इस दुनिया में स्वशरीर है या फिर दूसरे भी लोग हैं। उनको भी समझना चाहिए। जितने भी संसार में प्राणी है। वह कौन हैं, वह किस लिए हैं, उनका कर्म क्या है, हमें उनके साथ किस प्रकार से रहना चाहिए, यह भी समझना चाहिए। क्योंकि जितने भी प्राणी है, वह भी ब्रह्म के दास बतलाए गए हैं।

तीसरा उपाय स्वरूप : उपाय स्वरूप का मतलब हमें अपने बुद्धि, व्यवहार, व्यवस्था के अनुसार आगे तो बढ़ना चाहिए। उसके लिए उपाय करना चाहिए। लेकिन जो दूसरे लोग हमसे अधिक आगे बढ़ रहे हैं। उनके प्रति द्वेष का भावना नहीं रखना चाहिए। इसे ही उपाय स्वरूप बताया गया है।
हमें अपने जीवन में जो कुछ भी प्राप्त होता है, उससे तो हम संतुष्ट होते हैं, लेकिन दुनिया में हमसे ज्यादा जो लोग प्राप्त कर लेते हैं। उनके प्रति द्वेष ईर्ष्या का भावना नहीं रखना चााहिए। मतलब जो हमारे पास है, उससे हम संतुष्ट न हो करके दूसरों के आगे बढ़ते हुए देख करके परेशान होना, कुछ गलत करने के लिए उपाय करना, ऐसे मन में जो भावना आते हैं उसे उपाय स्वरूप बताया गया है।

चौथा विरोधी स्वरूप : अपने स्वरूप को नहीं पहचानते हुए एक दूसरे के साथ विरोधी के रूप में व्यवहार, स्थिति, व्यवस्था को उत्पन्न करना विरोधी स्वरूप होता है। इसीलिए परम ब्रह्म परमेश्वर की सत्ता को नहीं मानते हुए विरोधी स्वरूप को अपनाना विरोधी स्वरूप बताया गया है। जिसमें एक दूसरे के साथ विरोध का भाव रखना होता है।

पुरुषार्थ स्वरूप : जीवन में चाहे कितनी भी विकट परिस्थिति आए, लेकिन अपने पुरुषार्थ का त्याग नहीं करना चाहिए। पुरुषार्थ व्यक्ति को बताया गया है कि जीवन में हर परिस्थिति में अपने धैर्य एकाग्रता के साथ अपने कर्मों को करते रहना चाहिए। वहीं पुरुषार्थ स्वरूप बताया गया है।
इस प्रकार से हमें स्वयं को समझना चाहिए। दूसरे को भी समझाना चाहिए तथा इस जीवन में हमें क्या करना चाहिए, इसको भी समझने की आवश्यकता है। विरोधी स्वरूप इत्यादि को जब हम समझते हैं तब जीवन में यही पांच तत्व हमें अपने स्थिति स्वरूप को प्रदर्शित करते हैं।

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