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व्यंग्य:संकट में अगुआ प्रजाति 🤪

RKTV NEWS/रवींद्र पांडेय ,18 जुलाई।वर-कन्या के मौलिक अधिकारों पर बहुतेरे कानून हैं। पर समय की मांग है कि अगुआ के मौलिक अधिकारों पर भी बात हो। इससे पहले, वर-कन्या की उत्पत्ति पर बात करते हैं। लड़का-लड़की हर घर में होते हैं। ये बिना किसी उद्यम के भी हर दिन बड़े होते रहते हैं। बड़े होकर ये और कुछ बनें या न बनें, पर वर-कन्या जरूर बन जाते हैं।
वर के लिए कन्या की जरूरत होती है। कन्या के लिए वर की। हालांकि वर-कन्या अपनी ऐसी जरूरतें पूरी करने में समर्थ होते हैं, फिर भी इन्हें ढूंढ़ने का विधान है। इस विधान को पूरा करने की नैतिक जिम्मेवारी लेनेवाले को अगुआ कहते हैं। अगुआ में महामानव टाइप की क्षमताएं होती हैं। घनघोर परिश्रमी। भयंकर जुगाड़ू। विधान को पूरा करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं। कुछ आंतों से जोर लगाते हैं। कुछ लीवर से। नाभि से जोर लगाने वाले भी देखे गए हैं।
अब सोचिए जरा! ऐसे में कोई वर या कन्या अपनी मर्जी से साथी चुन ले, तो बेचारे अगुआ पर क्या बीतेगी? आमतौर पर अगुआ रिश्ते वाले ही होते हैं। ऐसे में तो रिश्ते खंड-खंड हो जाएंगे। फूफाजी, मामाजी, मौसाजी, जीजाजी वगैरह-वगैरह तो फोकट में अक्षत छींटने और आशीर्वाद देने वाले रोबोट बनकर रह जाएंगे।
दुनिया में बहुतेरे संकट हैं, लेकिन सबसे बड़ा संकट है उपेक्षा का। खासकर तब, जब किसी अगुआ की उपेक्षा हो जाए। जितना बड़ा अगुआ, उतना बड़ा संकट। अगुआ की कई प्रजातियां हैं। गांव-जवार से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक। इनकी क्षमता सिर्फ वर-कन्या के रिश्ते तय कराने तक सीमित नहीं है। ये दो देशों के रिश्ते भी तय कराने की क्षमता रखते हैं। सीजफायर कराना तो इनके बाएं हाथ का खेल है। युद्ध रोकना पुण्य का कार्य है। लेकिन, ये युद्ध कराते भी हैं, ताकि रोककर वाह-वाही लूट सकें। इनकी पीठ थपकियों की चाह रखती है। जब कोई पीठ न थपथपाए तो ये खुद से भी थपथपा सकते हैं। ये इनका मौलिक संस्कार है।
अगुआ का सम्मान होना चाहिए। उपेक्षा नहीं। यह एक बड़ी बहस का विषय है। यह बहस रिश्ता आधारित हो, न कि दिल आधारित। ऐसे कैसे कोई किसी से दिल लगा लेगा जी! गाना गाते फिरते हो, ‘प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है।’ ऐसे कैसे हो जाता है! कहते हो, ‘प्रेम बहुत बड़ी चीज है। प्रेम तपस्या है। प्रेम त्याग मांगता है।’ तो करो त्याग, किसने रोका है? बन जाओ तपस्वी। लेकिन उस फूफा की तपस्या का सर्वनाश क्यों कर रहे हो, जो आज अगुआ के अवतार में है? और, जिसकी धोती पर आपने सालों तक मल-मूत्र विसर्जित किया है?

रवींद्र पांडेय(संपर्क :6202586817)

हर चीज के लिए एक कायदा होता है। यह देश गाने से चलेगा, कि विधान से! दिल को औकात में रखिए। दिल की धड़कनें कंट्रोल करने की गोलियां तो आपने बना लीं, पर दिल की तड़फड़ाहट पर काबू पाने की गोली भी बनाइए। दिल के डाक्टरों को भी ‘दिल के दौरे’ और ‘दिल टूटने’ के दर्द’ का फर्क पता नहीं होता। असफलता किसी मामले में अच्छी नहीं होती। प्रेम के मामले में तो बिल्कुल नहीं। इस मामले में सफलता के लिए शिक्षा, परिश्रम और तन्मयता जरूरी है। प्रेम पाने के लिए हर युवा दिल से परिश्रम करता है। तन्मयता उसके रोम-रोम से रिसती है। सिर्फ शिक्षा ही वह मामला है, जहां वह खुद को असहाय पाता है। प्रेम की पढ़ाई राष्ट्रहित का मुद्दा है। सरकार को इस पर गंभीर होना होगा। वोट बैंक बढ़ेगा भाई! हर युवा और भूतपूर्व युवा के दिल से दुआएं बरसेंगी। मैं तो कहूंगा कि इसके लिए एक अलग मंत्रालय बना दीजिए। ज्यादा बजट भी नहीं लगेगा। पॉपकॉर्न और आइसक्रीम से ही करोड़ों दिलों का मामला सेट हो जाएगा।
बबुआ जी, मैं भी भूतपूर्व युवा हूं और अगुआ वाली अवस्था में हूं। इसलिए अगुआ के हक के लिए लड़ना मेरी नैतिक विवशता है। मैं अपने लिए लड़ता हूं। आप अपने लिए लड़िए। इस देश में लड़ाई का कारोबार अच्छा चलता है। हम लोग मिलकर इस कारोबार को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाते हैं। पर याद रखिए, मैं सीजफायर होने नहीं दूंगा।

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