
खतरा बढ़ल आजादी पर!
लेके बढ़ल झंडवा तिरंगा हो, देश कुर्बानी माँगेला; देश आज रक्षा खातीर लोगवा हो, तोहरा से लहू माँगेला।
शील पंचशीलवा के कौन काटे नसवा हो; कैसे घुसल भीतर, मैकमोहन पासवा हो।
मोरे हउवे मानसरोवर, पर्वत कैलासवा हो; भोले के डमरू बाजे, बसे जहाँ हंसवा हो ।
कवन मलेच्छ घुसल, चुपकै से नेफवा हो; मान मर्यादा पर लगवलस कवन ठेसवा हो।
घुचुर घुचुर आँख ओकर चिपुट-चिपुट नकवा हो; भाई-भाई कहला पर घात कइलस ठगवा हो।
वान्ह ना कफन आज, तूहु आपन सिरवा हो; मार के निकालऽ आज ओकर तूहु दमवा हो ।
अंग्रेज के भगवल, पुर्तगाली के भगवल हो; उठ आज चीनी अन के घोर चीनी पीय तू हो।
लेके बढ़ट झंडवा तिरंगा हो, देश कुर्बानी माँगे ला; देश आज रक्षा खातीर लोगवा हो, तोहरा से लहू माँगेला।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की सत्रहवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)


