
आरा/भोजपुर ( डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)13 जुलाई।श्रावण समारधना के क्रम में श्रीसनातन शक्तिपीठ संस्थानम् एवं सनातन-सुरसरि सेवा न्यास द्वारा श्रीसहदेव गिरि मंदिर कतिरा में आयोजित सप्तदिवसीय श्री शिव महापुराण कथा के दूसरे दिन प्रवचन करते हुए आचार्य डॉ भारतभूषण जी महाराज ने कहा कि ब्रह्म,वेद और शिव पर्याय हैं। तीनों का एक ही अर्थ है, एक ही अभिप्राय है। परात्पर परब्रह्म ही शिव हैं और वे ही वेद हैं। हमारी योग्यता यदि वैदिक ज्ञान-विज्ञान को समझने अथवा धारण करने की नहीं है तो करुणावान परमात्मा ने शिव लिंग के रूप में अपने को प्रकट कर जीवमात्र को उपकृत किया है। शिव लिंग का दर्शन कर लेने मात्र से ही संपूर्ण वेदों का दर्शन हो जाता है और विधिपूर्वक जल अर्पण कर लेने से वेदों के समस्त ज्ञान का फल सुलभ हो जाता है। आचार्य ने कहा कि ज्ञान के प्रकाश को ज्योति तथा उसके चिह्न को लिंग कहते हैं।यह वेदवेद्य परमात्मा का प्रकाश है जो द्वादश ज्योतिर्लिंगों से चलते हुए कण-कण में व्याप्त लिंगों द्वारा अभिव्यक्त होता रहता है। आचार्य ने कहा कि जीवमात्र जिसके द्वारा कल्याणस्वरूप भगवत्तत्त्व शिव में लीन हो जाता है उसे लिंग कहते हैं। उन्होंने कहा कि पुराणों में भगवान शिव को सबसे बड़ा वैष्णव और भगवान विष्णु को सबसे बड़ा शैव बताया गया है। दोनों एक-दूसरे के हृदय और सर्वथा अभिन्न-अभेद हैं। किसी एक की भी उपासना करने से दोनों की कृपा प्राप्त होती है। शतरुद्रसंहिता की कथा कहते हुए आचार्य ने भगवान शिव की अष्टमूर्तियों, अर्द्ध नारीश्वररूप तथा अट्ठाईस द्वापरों में विभिन्न व्यासों एवं योगेश्वरों के अवतारों का वर्णन किया जिसके श्रवण से आयु, आरोग्य, सौभाग्य,स्वर्ग व मोक्ष सभी की प्राप्ति होती है। इस अवसर पर प्रातःकाल वैदिक पंचदेव पूजन, शिवार्चन तथा प्रयागराज से पधारे पं संजय द्विवेदी द्वारा रुद्राभिषेक संपन्न कराया गया जिसमें क्षेत्रीय श्रद्धालुओं ने भक्ति और उत्साह के साथ भाग लिया। पुजारी अजय मिश्र ने आयोजन व्यवस्था, मधेश्वर नाथ पाण्डेय ने संचालन, डॉ सत्यनारायण उपाध्याय ने स्वागत और सत्येन्द्र नारायण सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
