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रामगढ़:संघर्ष से आत्मनिर्भरता की ओर: प्यासो देवी की प्रेरणादायक सफलता की कहानी।

RKTV NEWS/रामगढ़(झारखंड )13 जुलाई।झारखंड के रामगढ़ जिले के सरैया गांव में प्यासो देवी का परिवार सदियों से पारम्परिक खेतीबाड़ी और पशुपालन पर निर्भर था। उनके पति की अस्थायी आय और पारंपरिक आजीविका स्रोत उन्हें कुछ अधिक अवसर नहीं दे पा रहे थे। कच्ची मिट्टी के छोटे से माकन में अपना गुजारा करना कभी आसान नहीं था। बच्चों की पढ़ाई, रोजमर्रा की जरूरतें, बीमारियों के इलाज और सामाजिक दायित्व सब कुछ जब सीमित संसाधनों से पूरा करना होता है, तो जीवन भारी चुनौती बन जाता है। ऐसी परिस्थितियों में प्यासो देवी को अक्सर मानसिक दबाव और आत्म-ग्लानि का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

प्रारंभिक जीवन के संघर्ष

प्यासो देवी के जीवन के शुरुआती वर्ष कठिनाइयों से भरे हुए थे। बचपन से ही उन्होंने गरीबी की वास्तविकता देखी थी। स्कूल की ड्रेस ना होना, किताबों का अभाव, पैदल चलकर स्कूल जाना—यह सब उनकी रोज़मर्रा की चुनौतियाँ थीं। पढ़ाई के दौरान देखे गए ख्वाब को पूरा करने के लिए साधन नहीं थे। विवाह के बाद स्थिति और जटिल हो गयी। पति की अनियमित मजदूरी से घर चलाना मुश्किल हो गया। घर की दीवारें टूटीं, कभी बिजली बिल और कभी इलाज का बिल घर वालों पर भारी पड़ गया। उनकी जिंदगी में कई बार वह समय भी आया जब प्यासो देवी को दाल—चावल भी पूरा ना मिला। उन पलों में उन्होंने अपने मन में एक दृढ़ संकल्प लिया कि कुछ करना है, कुछ बदलना है।

स्वयं सहायता समूह से जुड़ाव

वर्ष 2020 में उनके ही गाँव में ‘सृष्टि आजीविका महिला सखी मंडल’ की एक बैठक आयोजित की गई थी। जिसमे समूह के सचिव के द्वारा प्यासो देवी को बुलाया गया एवं प्यासों देवी पहली बार समूह की बैठक में पहुंचीं। वहाँ उन्होंने देखा कि आस—पास की कई महिलाएँ भी उन्ही के तरह मुश्किलों से जूझ रही हैं, लेकिन उनमें आत्मविश्वास झलक रहा था। समूह के आरंभिक परिचय सत्र में वित्तीय साक्षरता, बचत योजनाएँ, सामुदायिक ऋण और कृषि पद्धतियों पर चर्चा की गयी। प्यासो देवी ने महसूस किया कि अकेले उनके पास सीमित संसाधन थे, पर मिलकर वे सामूहिक शक्ति बना सकती हैं। उन्हीं दिनों उन्होंने निर्णय लिया कि वह न सिर्फ समूह की सदस्य बनेंगी, बल्कि स्वयं को सक्रिय रूप से समूह की गतिविधियों में शामिल करेंगी। समूह में जुड़ने के कुछ ही महीनों में प्यासो देवी ने बचत योजना में नियमित योगदान देना शुरू किया। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने छोटे-छोटे ऋण भी लेने का साहस किया। समूह के प्रशिक्षकों ने उन्हें सफल महिलाओं के अनुभव साझा किए, जिससे उन्हें प्रेरणा मिली कि सही मार्गदर्शन मिलने पर हर कठिनाई को बदला जा सकता है। उनकी कहानी इसी गति के साथ आगे बढ़ी।

आजीविका गतिविधियों का विस्तार

प्यासो देवी ने समूह से मिली प्रेरणा और संसाधनों का उपयोग करके तीन मुख्य गतिविधियाँ शुरू कीं।
1. पहला बकरी पालन- समूह से प्यासो देवी को 30,000 रुपये का ऋण मिला। उन्होंने आजीवका पशुसखी से मिलकर नस्ल की जानकारी ली, सही टीकाकरण और चारा प्रबंधन की जानकारी हासिल की। शुरुआत में चार बकरियाँ लीं और धीरे-धीरे कर उनकी संख्या आठ तक बढ़ा दी। बकरियों को बेचने पर अच्छी आमदनी होने लगी। इससे घर की आय में स्थायित्व आया और ऋण चुकाने के बाद बचत भी शुरू हो गयी।

2. गाय पालन: प्यासो देवी ने अपनी दूसरी आजीविका गतिविधि गाय पालन की शुरुआत की। उन्होंने समूह से दोबारा ऋण लेकर एक अच्छी नस्ल की गाय खरीदी। उन्होंने पशु सखी की सहायता से टीकाकरण और चारे की समुचित व्यवस्था की। गाय से उन्हें रोजाना लगभग 4–5 लीटर दूध मिलने लगा, जिसमें से 3–4 लीटर दूध स्थानीय क्षेत्रों में बेचने लगी । इससे उन्हें हर महीने ₹6,000 से अधिक की आय होने लगी।
3.खेती का आधुनिकीकरण- प्यासो देवी के पास 1.5 एकड़ भूमि थी, जिसका परंपरागत तरीके से केवल दलहन फसले उगाई जाती थी। आजीविका कृषि सखी ने उन्हें उन्नत बीज, जैविक खाद, ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग जैसी तकनीकें सिखाईं। उन्होंने ठान लिया कि वह खेती की दो फसलें एक ही वर्ष में लेंगे। उन्होंने पहले धान की बुवाई की, फिर सब्जियों का चक्रवात लगाया। पहली बुवाई से लगभग 40 क्विंटल धान और दूसरी फसल से टमाटर, भिंडी, बैंगन आदि से अतिरिक्त आय प्राप्त हुई। कुल मिलाकर पहली फसल से 50,000 रुपये और दूसरे चक्र से 40,000 रुपये कमाए। खेती से प्राप्त आय से उन्होंने ड्रिप सिंचाई अपने खेतो में लगायी. जिससे उत्पादन में वृद्धि हुई.

परिवर्तन के आर्थिक और सामाजिक प्रभाव

प्यासो देवी के जीवन में आए इस परिवर्तन का प्रभाव पूरे गांव में बाकी महिलाओं से अलग दिखने लगा। आज उनके बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ते हैं उनका पक्का मकान बन गया है. प्यासो देवी अपने गांव के लिए एक मार्गदर्शक साबित हुई उन्होंने अन्य महिलाओं को भी बकरी पालन और दूध व्यवसाय शुरू करने में प्रोसाहित की।आर्थिक आत्मनिर्भरता ने उन्हें सामाजिक रूप से भी सशक्त बनाया।

भविष्य की योजनाएँ

भविष्य में आय को बढाने के लिए सरकार की योजना से सेड लेकर बकरी फार्म सुरु करना चाहती है। गायों की संख्या में वृद्धि करना चाहती है जिससे आय में वृद्धि कर सके ।

निष्कर्ष

प्यासो देवी की कहानी संघर्ष की लंबी दास्तान है, जो आत्मविश्वास, शिक्षा और सामूहिक सहयोग से आत्मनिर्भरता में बदल गयी। ‘सृष्टि आजीविका महिला सखी मंडल’ ने सही दिशा दिखायी और प्यासो देवी ने उसे अवसर में बदलकर अपने परिवार और समाज का चेहरा बदल दिया। यह मिसाल हजारों ग्रामीण महिलाओं के लिए मार्गदर्शक बनेगी कि सच्ची लगन, सही मार्गदर्शन और निरंतर प्रयास से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।

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