
RKTV NEWS/रवींद्र पांडेय 12 जुलाई।दुनिया की बातें दुनिया जाने। मुझे अपने देश की फिक्र है। इधर एक बड़ी साजिश चल रही है। देश से चौराहे खत्म हो रहे हैं। छोटे-बड़े चौक-चौराहों को फ्लाईओवर निगल रहे हैं। वही लोग जो जमीन से जुड़े रहने के लंबे-लंबे भाषण देते हैं, उन्हें भी फ्लाई करना ही पसंद है। किसी को नहीं पता – क्यों उड़ रहे हैं? कब तक उड़ेंगे? कितना उड़ेंगे? उड़िए! कौन रोक सकता है! पर भूलिए मत! यहां उड़ती चिड़िया के पर गिनने वाले कलाकार भी कम नहीं हैं। वो हर एक उड़ान का हिसाब रखते हैं। हर एक फ्लाईओवर के नीचे दबी हुई हकीकत को पहचानते हैं।
ट्रैफिक जाम के जनक चौराहे माने जाते हैं। लाल बत्तियां डराती हैं। पर ये लाल, पीली और हरी बत्तियां केवल ट्रैफिक सिग्नल नहीं हैं। ये पूरा जीवन-दर्शन हैं। कहती हैं – धैर्य धरो। जो अभी है, वह आगे नहीं रहेगा। सोच को सकारात्मक बनाओ। जाम को एक अवसर मानो। यह कब्ज की केटेगरी का मौका है। यहां कोई साथी नहीं होता। सबकुछ अकेले सलटाना होता है।

आपके पास पर्याप्त टाइम होता है। गुणी व्यक्ति इसे क्वालिटी टाइम में बदल लेते हैं। जाम में फंसा व्यक्ति धैर्य का अभ्यास कर सकता है। गुस्सा नियंत्रण की शक्ति डेवलप कर सकता है। चिड़चिड़ाहट को मुस्कान में बदल सकता है। उन मित्रों को फोन कर उपकृत करें, जिन्हें दो मिनट में की जानेवाली बातचीत पंद्रह मिनट में करने की आदत होती है। कैलकुलेटर निकालें। जोड़-घटाव करें कि अपने जीवन का कितने प्रतिशत जाम को न्योछावर किया है। कहीं भी विलंब से पहुंचने का यह ठोस कारण बन सकता है, जिससे आप आसानी से बच निकल सकते हैं।
महोदय, आप ट्रैफिक सिग्नल से नहीं भाग रहे! आप अपनी कड़वी सच्चाई से मुंह छुपा रहे हैं। ज़रूर छुपाइए। आपका मुंह है। कौन रोकेगा? रोकने वाला तो खुद की जुगत लगाने में भिड़ा है। अपनी उड़ान भरने में व्यस्त है। उसे आमजन के चौराहों से क्या लेना-देना!
हमें चौराहों की चिंता है। ये हमारे सुख-दुख के साथी हैं। मूक रहकर भी इन्होंने हमें बोलना सिखाया है। इनकी मौन छत्रछाया में हमारी आवाज बुलंद हुई है। ये निष्पक्षता की प्रतिमूर्ति रहे हैं। हर एक राहगीर का, हर एक विचार का स्वागत करते हैं। सबके स्वागत में हर पल पलकें बिछाए तैयार। दिल में अपनत्व की भावना लिए। धरना दो। प्रदर्शन करो। मशाल जुलूस निकालो। अपना सिर फोड़ो। सामने वाले की टांगें तोड़ो। इधर सब चलता है। संपूर्ण लोकतंत्र, प्रजातंत्र के प्रहरी। आपका, आपसे और आपके लिए! हमारा, हमसे और हमारे लिए! उनका, उनसे और उनके लिए! सबका, सबसे और सबके लिए! यह वह जगह थी जहां छोटे-मोटे झगड़ों से लेकर बड़ी-बड़ी क्रांतियों की नींव रखी जाती थी। यह वह मंच था जहां हर आवाज को सुना जाता था। चाहे वह कितनी भी धीमी क्यों न हो।
हमारे चौराहे छीने जा रहे हैं। हमारी आवाज दबाने के लिए दनादन फ्लाईओवर बन रहे हैं। ये फ्लाईओवर हमें फूटी आंखों भी नहीं सुहाते। ऊंचे-ऊंचे। कई किलोमीटर लंबे। बिल्कुल दैत्याकार। मानो, गली-मुहल्ले और शहरों के सिर कुचलते आगे बढ़ रहे हों। कहा जाता है कि फ्लाईओवर इस इलाके से उस इलाके को जोड़ रहा है। मैं नहीं मानता। यह जोड़ नहीं, तोड़ रहा है। एक-दूसरे से काट रहा है। अलग-थलग कर रहा है।
राजधानी से महज सौ-पचास किलोमीटर दूर स्थित शहर में सीएम साहब को हेलिकॉप्टर से क्यों लाते हो जी! कहते हो कि समय बचा रहे हो। सच बोला करो। कहो न कि रास्ते के गांवों और उनकी समस्याओं को बाईपास कर रहे हो। फ्लाई का मतलब हमें खूब समझ में आता है। फ्लाईओवर की सुनामी में सिर्फ हमारे चौराहे नहीं बहे, हम ही बह गए हैं। हमारा अस्तित्व बह गया है। हमारी सामूहिक चेतना, हमारे जुड़ाव का प्रतीक – सब कुछ मलबे के ढेर में दब गया है। क्या अब हम सिर्फ ऊंची इमारतों और तेजी से दौड़ती गाड़ियों के बीच अपनी पहचान खोते जाएंगे?
