
RKTV NEWS/पीरो (भोजपुर)07 जुलाई।परमानपुर चातुर्मास्य व्रत स्थल पर भारत के महान मनीषी संत श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने बताया कि जो आनंद और गति बैकुंठ में रहने से मिलता है। वहीं पृथ्वी पर भी आठ जगहों पर वास करने से होता है, वह आठ जगह बैकुंठ के समान है। जो चार उत्तर भारत में है और चार दक्षिण भारत में है। जिसमें सबसे पहले बद्री नारायण है। जहां पर भगवान श्रीमन नारायण वास करते हैं। यहां के बारे में स्वामी जी ने बताया कि एक बार भगवान श्रीमन नारायण ने लक्ष्मी जी से कहा कि मैं पृथ्वी पर लोगों के हित के लिए तपस्या करना चाहता हूं।
तब लक्ष्मी जी ने कहा कि मैं भी साथ चलूंगी। विष्णु जी ने कहा कि तपस्या ध्यान अकेले किया जाता है, पत्नी के साथ नहीं। बार बार लक्ष्मी जी के कहने के बाद विष्णु जी ने अपनी सहमति दी। तब विष्णु जी एक जगह जाकर तपस्या करने लगे। उसके बाद लक्ष्मी जी एक बेर के पेड़ का रूप लेकर वहीं पर चली गई। जहां श्रीमन नारायण भगवान बैठकर तपस्या कर रहे थे वहीं उनको छाया देने लगी। उसी जगह का नाम बद्री नारायण कहा गया। बद्री का मतलब लक्ष्मी जी और नारायण का मतलब श्रीमन नारायण हैं। जिससे उस जगह का नाम बद्री नारायण हो गया। बद्रीनारायण में भगवान शालिग्राम के रूप में साक्षात है।
स्वामी जी ने बताया कि ऐसा माना जाता है कि एक शालिग्राम भगवान ही ऐसे हैं। जिनको अगर 5 साल 10 साल तक भी भोग न लगाया जाए तो उससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। नहीं तो कोई भी मंदिर या स्थापित मूर्ति है। उनको अगर 24 घंटे तक भोग न लगाया जाए तो फिर से प्रतिष्ठा करना पड़ता है।
दूसरा बैकुंठ के समान स्थान है मुक्ति नारायण। जो कि अभी नेपाल में पड़ता है। मिडिया संचालक रविशंकर तिवारी ने बताया कि स्वामी ने कहा कि नयहां भी साक्षात भगवान श्रीमन नारायण वास करते हैं। वहां एक दामोदर कुंड है। जिसमें शालिग्राम भगवान पाए जाते हैं। पूरे विश्व में यही एक जगह है। जहां पर शालिग्राम भगवान का मूर्ति दामोदर कुंड में मिलता है।
तीसरा जगह पुष्कर राज है और चौथा जगह नैमिषारण्य है। यह चार जगह उत्तर भारत में बैकुंठ के समान माना जाता है।
स्वामी जी ने बताया कि चार बैकुंठ के समान जगह दक्षिण भारत में है। सबसे पहला श्री रंगनाथ भगवान है। जो कि सतयुग में सूर्य पुत्र मनु जी महाराज अयोध्या के राजा बने थे। एक समय में अयोध्या पूरे विश्व की राजधानी हुआ करती थी। मनु जी महाराज का कोई संतान नहीं था। उन्होंने ब्रह्मा जी का तपस्या किया तो ब्रह्मा जी ने कहा कि मेरे बस का बात नहीं है। तुम भगवान श्रीमन नारायण के पास जाओ। तब मनु जी भगवान विष्णु जी के पास गए। विष्णु जी ने अपना एक अंसाअवतार मनु जी महाराज को दिया और बोले कि ले जाकर इनका पूजा पाठ करो। जिससे आपको संतान हो जाएगी। वही रंगनाथ भगवान थे। वही भगवान का अंसाअवतार लेकर मनु जी महाराज अपने घर आए और पूजा पाठ करने लगे तो उनको संतान प्राप्त हुआ। मनु जी महाराज के वंसज भगवान श्री राम थे। सतयुग से लेकर त्रेता युग तक रंगनाथ भगवान का पूजा पाठ किया जाता था। जब भगवान श्री राम लंका से रावण का वध करके वापस आए तो विभीषण जी अक्सर भगवान का दर्शन करने आते थे। एक बार जब वह भगवान श्री राम के पास आए वह जा ही नहीं रहे थे। तब भगवान श्री राम ने कहा कि अब तो आयोजन हो गया आप जाइए। तभी विभीषण जी ने कहा कि आप भी मेरे साथ चलिए तो बोले श्री राम की यह तो हो नहीं सकता हैं। तब विभीषण जी ने कहा कि जो आप अंसाअवतार श्री रंगनाथ भगवान का पूजा करते हैं। उनको मुझे दे दीजिए। जब विभीषण जी भगवान रंगनाथ को लेकर लंका जा रहे थे तो रास्ते में संध्या वंदन करने के लिए रंगनाथ भगवान को जमीन पर रख दिए। फिर जब संध्या वंदन करके रंगनाथ भगवान को उठाने लगे तो अब उठ ही नहीं रहे थे। तब विभीषण जी बोले कि भगवान मैंने कोई गलती किया है जो आपको मैं अयोध्या से लेकर आया और आप अब यहां से उठ नहीं रहे हैं। तब भगवान श्री रंगनाथ प्रकट हो गए और उन्होंने कहा कि मैंने गोदावरी नदी को वरदान दिया है कि मैं तुम्हारे गोद में रहूंगा। इसलिए अब मैं यहीं रहूंगा। यही से दक्षिण की तरफ मुंह करके आपके लंका को देखता रहूंगा। वही श्री रंगनाथ भगवान का मंदिर वहां बन गया।
श्री रंगनाथ भगवान के मंदिर का क्षेत्रफल जितना है उतना पूरे विश्व में किसी भी मंदिर का नहीं है। दक्षिण भारत का दूसरा बैकुंठ के समान धाम तिरुपति बालाजी है। जहां वेंकटेश भगवान का पूजा किया जाता है। इस मंदिर को विश्व में सबसे ज्यादा पैसे वाला मंदिर माना जाता है। क्योंकि यहां पर चढ़ावा जितना चढ़ता है उतना पूरे विश्व में कहीं भी किसी मंदिर में नहीं होता है। पूरे भारत के जितने भी मंदिर में लाइन लगाकर प्रसाद चढ़ाना, लाइन लगाकर दर्शन करना टिकट का सिस्टम बनाना या लड्डू बांटने का जो हो रहा है। वह तिरुपति बालाजी मंदिर का ही नकल हो रहा है। सातवां बैकुंठ के समान जो स्थान है वह श्री पुष्णम जो की दक्षिण भारत में स्थित है। जहां पर भगवान कच्छप अवतार के रूप में वास करते हैं।
आठवां बैकुंठ के समान जगह तोताद्री है। जोकि रामेश्वरम से पहले पड़ता है।
स्वामी जी ने बताया कि आठ पूरी भारत में है। सबसे पहले पूरी अयोध्या हैं। स्वामी जी ने बताया कि अयोध्या का मतलब क्या होता है। इसका मतलब अयोध्या सब पुरी का मस्तक है। सबसे ऊपर है। यहां पर व्यक्ति का जीवन मरण के बार-बार जन्म और मरण लेने का जो प्रक्रिया है। उससे मुक्ति मिल जाता है। दूसरा पूरी बैकुंठ के समान मथुरा है। मथुरा जहां पर भगवान ने जन्म लिया और कुछ दिनों के बाद जरासंध से युद्ध होने के बाद भगवान श्री कृष्ण मथुरा छोड़कर द्वारिका चले गए थे। फिर भगवान के बैकुंठ वास करने के बाद राजा युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण के वंशज को वहां पर राजा बनाया और वहां के लोगों से पूछ पूछ कर भगवान ने जहां जो लीला किया था। उसको फिर से उसी तरह बनाया गया। स्वामी जी ने बताया कि तीसरा पूरी बैकुंठ के समान हरिद्वार है। जिसे मायापुरी भी कहा जाता है। हरिद्वार का मतलब हरि का द्वार होता है। हरिद्वार से उत्तर का जो भूमि है उसको देवलोक कहा जाता है। यानी कि हरिद्वार को हरि के पास में स्वर्ग के पास पहुंचने का द्वारा माना जाता है। चौथा पुरी कशी है। जहां पर मरने के बाद लोगों को मोक्ष प्राप्त होता है। चौथा पूरी कांची है। जो कि दक्षिण भारत में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि जो मोक्ष काशी में मरने के बाद प्राप्त होता है। वह कांची में सिर्फ दर्शन करने से ही मोक्ष प्राप्त हो जाता है।
इसके बाद का पूरी उज्जैन है। इसके बाद द्वारिका पुरी है। प्रयागराज, जगन्नाथ पुरी भी है। अगला पितरों के उधर के लिए जो उत्तम पूरी है वह है गया। स्वामी जी ने बताया कि यह सभी स्थान मानव मात्र के लिए कल्याण के लिए बनाया गया है। जहां पर जाने से दर्शन करने से बैकुंठ के समान लाभ होता है और मोक्ष प्राप्ति होता है।
