
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)03 जून।प्राचीन काल से युद्ध का परिणाम, जीत हार जो भी हो अंततः नर संहार ही होता है। संपन्न राष्ट्र अपना आधिपत्य जमाना,प्रशासनिक सीमा को बढ़ाना और अपनी उच्च क्षमता को दिखाने के लिए समय समय पर युद्ध का सहारा लेते हैं। लेकिन एकमात्र भारत ही ऐसा देश है जिसे अपनी सुरक्षा के लिए युद्ध लड़ना पड़ता है।इस संबंध में वरिष्ठ पत्रकार डा दिनेश प्रसाद सिन्हा ने सामाजिक चिंतक प्रो जंग बहादुर पांडेय से उपरोक्त विषय पर जानकारी ली है।प्रो पांडेय ने बताया की
मानव जाति के लंबे इतिहास में रक्ताक्त युद्धों की अनगिनत रोमांचक कहानियां अंकित हैं।इधर ही नार्वे के एक प्राध्यापक ने बताया है कि 5560 वर्षों के लिखित इतिहास में कुल 14,531 युद्ध हुए हैं,अर्थात् प्रत्येक वर्ष ढाई सौ से भी अधिक।
चाहे देवासुर संग्राम हो या पाषाण युग के बर्बर मनुष्यों का संघर्ष रक्तपात तो होगा ही।मानव के भीतर का खूनी पिशाच ही उसे युद्ध के लिए प्रेरित करता है। राष्ट्र कवि दिनकर ने रश्मि रथी में युद्ध की बर्बरता के संदर्भ में ठीक लिखा
अनगढ़ पत्थर से लड़ो,लड़ो किटकिटा नखों से, दांतों से,या लड़ो ऋक्ष के रोम गुच्छ -पूरित वज्रीकृत हाथों से।या चढ़ विमान पर नर्म मुट्ठियों से,गोलों की वृष्टि करो।
आ जाय लक्ष्य में जो कोई,निष्ठुर हो सबके प्राण हरो।
प्राचीन काल में जो युद्ध होते थे , उनमें इतना भीषण नरसंहार नहीं होता था, क्योंकि पहले एक दूसरे से पत्थर ,गदा,भाले और धनुष वाण से लड़ा जाता था।केवल लड़ने वाले ही हताहत होते थे अन्य नहीं।किंतु आज युद्ध छेड़ने वाले दूर ही बैठे रहते हैं और एक बटन दबाते ही हजारों मील पर रहने वाले असंख्य नागरिक भयानक बम विस्फोट के ग्रास बन जाते हैं।
प्राचीन काल में युद्धों के नियम थे,समय निश्चित होता था। सूर्योदय से सूर्यास्त होते ही युद्ध बंद हो जाता था। दिन-भर कुरुक्षेत्र में रथ संचालन के पश्चात् सायंकाल में भगवान श्रीकृष्ण अपनी पीताम्बरी में दाने लिए अपने घोड़ों के बीच निकल पड़ते थे। शत्रु -मित्र सब एक दूसरे की चिकित्सा -संवेदना में तत्पर रहते थे।किंतु आज युद्ध अखंड रूप से रात -दिन चलता रहता है और चिकित्सालयों तक पर बम गिराये जाते हैं।अस्तु युद्ध कभी मानव और मानवता के लिए वरेण्य नहीं है।
अभी हाल ही में पाकिस्तान के द्वारा की गई निर्मम हत्या की पूरी दुनिया में भर्त्सना हुई।इसके जबाव में भारत के द्वारा किया गया आपरेशन सिंदूर ने पाकिस्तान की नींद उड़ाई दी और पाकिस्तान का मन ठंडा कर दिया। दुनिया ने भारत के इस कदम की भरपूर सराहना की। लेकिन अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के द्वारा बीच बचाव कर सीज फायर कराया गया।यह कदम बहुत हद तक मानव और मानवता के पक्ष में कहा जा सकता है। महाभारत के एक प्रसंग के माध्यम से मैं सीज फायर के औचित्य पर अपनी बात रखना चाहता हूं।जब द्रौपदी के पांचों पुत्र महाभारत के युद्ध में मार दिए गए, तब उनको समझ में आया कि युद्ध क्या होता है? उसके पहले वे युद्ध के लिए सबसे अधिक लालायित थीं, कृष्ण के युद्ध रोकने के हर प्रयास का सबसे अधिक विरोध द्रौपदी करती थीं।।जब युद्ध रोकने या समझौते की कोई बात शुरू होती, वे कहतीं कि मेरे इन खुले बालों का क्या होगा? भीम की उस प्रतिज्ञा का क्या होगा,उस कर्ण को मैं जीवित कैसे देख सकती हूं, जिसने मुझे भरी सभा में वेश्या कहा।कृष्ण हर बार उन्हें डांटते हुए कहते कि यहीं तक युद्ध सीमित नहीं है। तुम्हारी प्रतिज्ञा टूट भी जाए और महाभारत का युद्ध रूक जाए,तो इसे सस्ता ही समझना, क्योंकि तुम्हारी प्रतिज्ञा की तुलना में मानव और मानवता का कल्याण श्रेयस्कर है।अगर यह युद्ध हुआ, तो लाखों निर्दोष लोग मारे जाएंगे, लाखों बच्चे अनाथ होंगे, लाखों महिलाएं विधवा और लाखों मांओं की गोद सूनी हो जाएगी।इनलोगों का कुछ भी इस युद्ध में दांव नहीं लगा है। चाहे वे पांडव की सेना में हों या कौरव की सेना में ।मुझे उन लोगों की चिंता है, जो बिना किसी वजह के इसमें मारे जाएंगे। अंततः महाभारत का युद्ध हुआ। लाखों लोग मारे गए। युद्ध के अंतिम दौर में द्रौपदी के पांचों पुत्र एक साथ मारे गए।अपने पांचों बच्चों के मारे जाने पर द्रौपदी विलखने लगीं, हाय-तौबा मचाने लगीं तो, कृष्ण ने दो टूक कहा, तुम तो हर हालात में युद्ध चाहती थी,अब क्यों विलख रही हो,तुम क्या सोचती थी कि युद्ध में दूसरों के बेटे मारे जाएंगे और तुम युद्ध का तमाशा देखोगी। इन्होंने बताया की युद्ध के लिए ललकारने वालों को तब तक युद्ध की कीमत नहीं पता चलता, जबतक कि इस युद्ध की बलि वेदी पर उनके अपने नहीं चढ़ते हैं।
राष्ट्रवादी युद्ध अंतिम विकल्प होना चाहिए और एक सीमित उद्देश्य के लिए होना चाहिए और जब उद्देश्य की प्राप्ति हो जाये तो सम्मानजनक समझौता करके युद्ध से बाहर निकल आना ही श्रेयस्कर होगा। इसलिए सीज फायर एक सुलझा हुआ निर्णय था। जो लोग सीज फायर का विरोध कर रहें हैं,उनका कोई बच्चा फौज में लड़ाई में नहीं है।एतदर्थ भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी बधाई के पात्र हैं।भारत सत्य और अहिंसा का पुजारी रहा है। मोदी जी का कहना है कि परमाणु शक्ति का उपयोग मानव कल्याण में हो,किसी दूसरे राष्ट्र के आंतरिक कार्यों में हस्तक्षेप न किया जाए, आतंकवाद को विश्व पटल से निर्मूल किया जाए तथा अहिंसा और शांति का ऐसा मंत्र फूंका जाए कि मनुष्य के भीतर बैठा हिंस्र सिंह भी खुशी की चौकड़ी भरने लगे और आज के युद्ध की काल रात्रि का तूफान कल के प्रभात को स्वर्णिम शांति का ताज पहना जाए। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के शब्दों में हम कहना चाहेंगे कि
सबकी नसों में पूर्वजों का पुण्य रक्त प्रवाह हो,
गुण शील साहस बल तथा सबमें भरा उत्साह हो,
सबकी नसों में सर्वदा संवेदना की दाह हो,
हमको तुम्हारी चाह हो,तुमको हमारी चाह हो।
