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अधिवक्ताओं पर अंकुश ,जनता की आवाज को दबाने के समान: विद्या निवास सिंह उर्फ दीपक सिंह

RKTV NEWS/अनिल सिंह,23 फ़रवरी।भारत के लोकतंत्र में नागरिकों को मिली अभिव्यक्ति की आजादी पर आए दिन किसी न किसी रूप में केंद्र की सरकार द्वारा लगाए जा रहे प्रतिबंधों के प्रयासों फिर वो चाहे,मजदूरों की हकमारी हेतु लेबर लॉ में संशोधन,बेरोजगारी का दंश झेल रहे बेरोजगार युवाओं की रोजगार के प्रति बढ़ रही मांग,कृषि पर टिकी देश की अर्थव्यवस्था के आधार माने जाने वाले किसानों के हितों की रक्षा के हनन संबंधी प्रयास हो। सरकार द्वारा किए जा रहे नए नए कानूनी संशोधन देश के लोकतंत्र को खत्म करने की ओर उठाएं जाने वाले कदम के सदृश प्रतीत होते है।देश की आम जनता अपने साथ हुए अन्याय और इंसाफ के लिए अपनी एक आखिरी उम्मीद अधिवक्ताओं के माध्यम से अपनी आवाज को बुलंद कर न्याय की आशा करती है।लेकिन जनता की इस आखिरी ठोस उम्मीद अधिवक्ताओं की वैचारिक स्वतंत्रता के हनन करने की ओर बढ़ रही केंद्र की सरकार के प्रयासों जिसमें अधिवक्ताओं को अपना गुलाम बनाकर जनता की आखिरी उम्मीद पर अपना शस्त्र इस्तेमाल कर उसे निष्क्रिय करने जैसा प्रतीत होती है। उक्त बातों के संबोधन संबंधी अपना बयान जारी करते हुए आरा जिला बार एसोसिएशन के पूर्व सचिव रहे विद्या निवास सिंह उर्फ दीपक सिंह ने कहा है की देश भर में केंद्र सरकार द्वारा”अधिवक्ता कानून 1961″ में किए जाने वाले प्रस्तावित अनैतिक संशोधन से केंद्र सरकार की भ्रष्ट नीति और देश की जनता के साथ षडयंत्र की मंशा साफ झलकती है।
विद्या निवास सिंह ने कहा कि उक्त अधिवक्ता कानून में प्रस्तावित संशोधन कर अधिवक्ताओं को गुलाम बना और उनकी स्वतंत्रता को खत्म कर सरकार भविष्य में निरंतर सत्ता पर काबिज रहने के लिए और देश विरोधी नीतियों को लागू करने से अपने आपको कानूनी रूप से संरक्षित रखने के लिए अधिवक्ताओं को अपना गुलाम बना अपनी सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त करना चाहती है।

आवाज को दबाने की कोशिश

विद्या निवास सिंह ने केंद्र सरकार द्वारा अधिवक्ता कानून 1961 में प्रस्तावित संशोधन धारा 4 के तहत बार काउंसिल में तीन सदस्यों को केंद्र सरकार द्वारा नामित करने पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि ऐसे प्रस्तावित संशोधन से बार काउंसिल में भी सरकार का सीधे सीधे दखल हो जायेगा। जो कही से भी उचित नही है,उन्होंने इस प्रस्तावित संशोधन को गंभीरता से लेते हुए कहा कि ऐसा होने से सरकार द्वारा नामित सदस्य हमेशा सरकार की ही रहनुमाई करेंगे और अधिवक्ताओं की सरकार के विरोध में उठी जायज मांगों को भी अपने तीन की संख्या से बहुमत की ओर ले जा विरोध की आवाज को दबाने की कोशिश करेंगे।

अधिवक्ताओं के चरित्र का गलत मूल्यांकन

अधिवक्ता ने कहा कि कोई भी अधिवक्ता व्यक्तिगत या संघ के माध्यमों से अपनी जायज समस्याओं के समाधान के लिए ही हड़ताल करता या कार्य का बहिष्कार करता है ,कार्य बहिष्कार या हड़ताल अधिवक्ताओं की नियति नहीं है लेकिन प्रस्तावित संशोधन धारा 35 A में अब कोई भी अधिवक्ता न ही कार्य बहिष्कार कर सकेंगे और न ही हड़ताल यदि वो ऐसा करेंगे तो प्रस्तावित संशोधन धारा 26A का उपयोग कर उन्हें एडवोकेट रोल लिस्ट से हटा दिया जाएगा। विद्या निवास सिंह ने उक्त प्रस्तावित संशोधन पर रोष जाहिर करते हुए कहा कि ऐसे संशोधन से लगता है कि सरकार अधिवक्ताओं को आतातीयों की श्रेणी पर रख रही है और उनका गलत मूल्यांकन और चित्रण कर रही हैं।जो पूरे अधिवक्ता समाज का अपमान से कम नहीं।

बार एसोसिएशन की शक्तियों का हनन

विद्या निवास सिंह ने कहा कि अधिवक्ताओं के व्यवहार की जांच प्रस्तावित संशोधन धारा 9 के बाद इसके लिए एक कमिटी का गठन किया जायेगा जिसका अध्यक्ष सर्वोच्च या उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज या उनके द्वारा नामित व्यक्ति ही होगा साथ ही कमिटी में किसी भी उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज एक वरिष्ठ अधिवक्ता सदस्य के रूप में और एक सदस्य बार काउंसिल से होंगे अर्थात उक्त प्रस्तावित संशोधन के पश्चात अधिवक्ताओं के व्यवहारों की जांच सर्वोच्च और उच्चतम न्यायालय के पूर्व जजों द्वारा की जायेगी जो बार की शक्तियों के हनन की ओर इशारा करता है

चिंतनीय तथ्य

विद्या निवास सिंह ने प्रस्तावित संशोधन धारा 24A,24B के तहत किसी अपराध में अधिवक्ता को तीन वर्ष या उससे ज्यादा की सजा होने पर उसे राज्य की एडवोकेट रोल लिस्ट से हटाने और रजिस्टर्ड नहीं किए जाने के संभावित संशोधन पर चिंता भी जाहिर की है।

भारतीय कानूनी कार्य में विदेशियों का हस्तक्षेप

अधिवक्ता ने कहा कि धारा 49A(1) के प्रस्तावित संशोधन के पश्चात सरकार विदेशी लॉ फर्म को भारत में वकालत का कार्य करने के लिए अनुमति देने हेतु नियम बना सकेंगी। ऐसे संशोधन आने वाले समय में भारतीय अधिवक्ताओं एवं न्याय व्यवस्था के लिए काफी घातक साबित होंगे।

भ्रष्टाचार की मजबूत नींव को डालने का प्रयास

धारा 49A के प्रस्तावित संशोधन के तहत बार काउंसिल को केंद्र सरकार किसी प्रावधान ,नियम या आदेशों को लागू करवाने हेतु दिशा निर्देश दे सकेंगी। ऐसे में काउंसिल सरकार की एक कठपुतली के रूप में क्रियाशील रहेगी और सरकार के भ्रष्टाचारों को छुपाने के लिए एक कानूनी बुरखे का का काम करेगी।

प्रस्तावित संशोधन का लगातार होगा विरोध

विद्या निवास सिंह ने अपने नेतृत्व में प्रस्तावित उक्त काला क़ानून को भारत सरकार द्वारा वापस लेने हेतु आरा व्यवहार न्यायालय सर ज्वाला प्रसाद गेट पर शनिवार को आरा बार एसोसिएशन के महा सचिव मनमोहन ओझा अधिवक्ता राजेश पांडेय ऊर्फ पप्पु पांडेय, अधिवक्ता सह सहायक लोक अभियोजक अरशद जी, रूबी कुमारी,महावीर सिंह, विजय चन्द पाठक, आशुतोष पांडेय रंजना सिंह, अर्चना कुमारी, सुभाष यादव, डॉ कमलेश कुमार सिंह, कमलावती कुमारी, रणजीत सिंह,अरुण कुमार,अमित कुमार बंटी, अजीत रंजन, राजीव रंजन, शशिशेखर सिंह, गंगा दयाल सिंह,मंगल सिंह सहित अन्य सैकड़ों अधिवक्ता द्वारा किए गए प्रदर्शन की जानकारी देते हुए बताया कि अधिवक्ता कानून 1961 में प्रस्तावित संशोधन के खिलाफ सरकार के विरुद्ध यह विरोध प्रदर्शन निरंतर जारी रहेगा जब तक कि सरकार प्रस्तावित काला कानूनों को वापस नहीं ले लेती है।उन्होंने कहा कि यह लड़ाई केवल अधिवक्ताओं के हितों की ही नहीं है वरन् देश की जनता की आवाज को बुलंद करने वाले लोकतंत्र के मजबूत स्तंभ की भी है।

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