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रोता जंगल दुःखी इंसान!

RKTV NEWS/अजय कुमार गुप्ता “अज्ञानी”(साहित्यकार) 22 मई।एक लकड़हारा था जो जंगल से पेड़ो को काटता और लकड़ियो को बाजार में बेच कर रुपए कमाता था। और उसी पैसो से अपने परिवार जनो को भरण पोषण करता था। इस कृत से हरे भरे जंगल बिरान हो चूके थे। और गिने चुने मात्रा में कुछ पेड़ शेष बचे थे।
लकड़हारे की इस कृत से जंगल के सदस्य गण काफी दुःखी रहा करते थे। मगर मानव से पंगा लेने में असमर्थ थे। और आपने भाग्य और मानव की मुढ़ता पर काफी दु:खी रहा करते थे। पेड़ो की संख्या कम हो जाने से नये पौधे भी उगना छोड़ दिए थे और क्षेत्र जंगल विहीन होने से पारितंत्र प्रभावित हो चुका था। गर्मी बढ़ गई थी। जीव जन्तु मानव सभी बेहाल हो चूके थे। मानव कारण जानकर भी पेड़ काटना नहीं छोड़ा क्योंकि पेड़ काट कर बेचना और मुनाफा अधिक कमान आसान कर्म लगता था। इसलिए मानव भविष्य के चिंता किए बिना पेड़ काटना जारी रखा।
पेड़ काटे जाने के कारण बारिश होना कम हो गया था। जमीन का आंतरिक पानी का लेबल नीचे से नीचे जा चूका था। पोखर तलाब नदी झड़ने सभी सूख चले थे। जीवो को भीषण गर्मी धूप से बचने के लिए कहीं छतनार एक भी बृक्ष नहीं मिल पा रहा था। हरियाली खत्म हो चूँकि थी हराभरा क्षेत्र। मरूस्थल में बदल चूँका था। मिट्टी धीरे धीरे रेत में बदलने लगी थी।
और धरती पर काँट-कूश व मरूस्थलिए पौधे उग आए थे। जीव जन्तु व्याकुल रह रहे थे और मानव के दूरबुद्धी को कोस रहे थे। कि हराभरा जंगल को बिरान कर दिया और सारे जीव कालकलवित हो गए।
मगर मानव का प्यास कहाँ बुझने वाला था। वो रोज के भांति पेड़ को काटता रहा। एक दिन वो लकड़हारा एक विशाल मजबूत पेड़ को काट रहा था। दिन भर काटते काटते वो थक चूँका था। इसी दौरान पेड़ काटने के क्रम में कुल्हाड़ी लकड़हारे के हाथो से छिटक कर पास के सरोवर में जा गिरी। और लकड़हारे के काफी प्रयास के बाद भी वो कुल्हाड़ी को तलाश ना सका और असफल हो कर मायूस अपने घर को वापस लौट आया।
अगले दिन लकड़हारे ने बाजार से नयी चमचमाती धारदार कुल्हाड़ी खरीद कर लाई। और बाजार से लौटने के क्रम में वो थक चुका था। इसलिए उसी पेड़ के छाँव में विश्राम करने लगा। अब लकड़हारे के हाथो में नयी चमचमाती कुल्हाड़ी देख सब पेड़ आपस में कानाफूसी करने लगे हाय! आज वो मोटा पेड़ काट दिया जायेगा बेचारे को बेसमय मौत का सामना करना पड़ेगा। सभी पेड़ दु:खी थे आपस में मातमपुर्सी कर रहे थे। जंगल के सभी सदस्यो को दु:खी देख एक बुढ़ा पेड़ ने कहाँ बच्चो अभी दु:खी ना हो। वो लकड़हारा अभी हमारे मित्र को नहीं काट पायेगा। यह बात सून सभी साथी पेड़ आश्चर्य से पूछे ऐसा क्यों आपसे किसने कहाँ की वो नहीं काट पायेगा।
तब वो बुढ़ा पेड़ कहाँ मित्रो देखो वो कुल्हाड़ी में अभी हमारा साथी का हाथ नहीं है अभी वो नंग्गा है। जब तक हमारे सदस्यो का सहयोग उस कुल्हाड़ी को प्राप्त ना हो वो मुझे काट नहीं पायेगा। वो कुल्हाड़ी तभी काटती है जब हमारा साथी के हाथ रुपी दंडे कुल्हाड़ी को स्पोट/ सहयोग ना करे। अभी उसके नयी कुल्हाड़ी में अभी दंडे नहीं है इसलिए वो हमे अभी काट नहीं सकता।
कल वो दंडे बनायेगा हमारे ही अंग का प्रयोग कर हमे काटेगा। अभी हमे जिंदा रहने के लिए रात भर का अवसर प्राप्त है। मायूस ना हो मिले हुए वरदान को भगवान का कृपा समझ भगवान को धन्यवाद कहो। व कल तक का इंतजार करो। कल तक का इंतजार करो।

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