बाल सोपान
जग में होला नित जयकार,
जंकरा में धधकत अंगार;
सिर झुकाइब हम उहवाँ,
जहवाँ कूब्बत के भंडार ।
फूल रहेला हरदम फूले,
चाहे कवनो बाग फुलाय;
के डलले बियवा का मतलब,
गंध देत सबके अधवाय ।
जे बड़ छोट में भेद न जाने,
ऊहे बड़ गुणगर कहलाला;
दया-धरम जेहन में जेकरा,
ऊहे इहँवा लोग पुजाला।
डर के मारे काँपत जे रहिहें,
के ओकरा के क्षत्रिय कहिहें;
जेकरा में तप-त्याग ना होइहें
के ओकरा के ब्राहम्ण कहिहें।
पुरखन के सीकड़ ढोवला से,
हाथी वाला ना कोई होई;
जे गजबाँक लगावे जाने,
तांपला से ऊ नाहिं तो पाई।
बीर के खाँचल डाँड हमेशा,
फरके से पहचानल जाला;
पत्थर पर भी ओसहीं गहिरा,
जइसे माटी पर पड़ जाला।
का गलती का ठीक हवे का,
मत एह के अधिका उचिलाव;
केकर ई पारल डंडार ह,
बुझहीं में मत जान खपाव।
ज्वाला के गोला के बेटवा,
माई सती कुँआरी जेकर;
जे कर पलना धार डुलावे,
बहे पिटारी नदिया बीच जेकर।
बीर पूत कर्ण अस शानी,
ना धरती पर केहू आइल;
माई थान चुसा ना पवली,
शूद्र कुल में रहल पलाइल।
उखामंजल देह फड़कत रहे,
मनवा भाव में उमड़त रहे;
आउर सुभाव में अस दानी ऊ,
सबके छोड़त पीछा, ऊ आगे रहे।
बीर करेला गरब साहस पर,
जाति गोत्र से मत पहचनिह;
ज्ञान-धेयान में बड़, हाथे धेनुहा वाण,
सारा ग्रन्थ घटोरले बस कर्ण के जनिह ।।
भीड़-भाड़, भों-भों, पों-पों से हटके,
कर्ण रहस बिलगाइल;
तन-मन से उत्योग में लागल,
सबके नजरी से बिलगाइल।
अइसन सधल समाधी में,
जे देला इनमें निपुणाई;
देख ना पावल जगत कर्ण के,
कब वन में ई फूल खिलाइल।
ना खाली राजा बगिआ में,
हरदम फूल खिलेला;
कानन-कुंजन में भी चुपके,
बिकसेला फूलो कमाल के।
गजब कठिन गुत्थी बडुवे ई,
कुदरत के त अद्भुत रचना;
गुदड़ी में भी लाल सहज ही,
राखेले कुदरत सँभाल के।
पेट फाड़ बदरी के जइसे,
दुनिया में सूरज चमकेले;
जग के नजरी में तसहीं,
योद्धा ही के नाम चमकेले।
जगल जवानी देखऽ तनिका,
आइल एकर बारी बा;
भरल आग के गगरी फूटल,
साहस में ई भारी बा।
रंगभूमि में अर्जुन रण के,
खेल देखावत जब हीं रहलन;
पलक झपकते जमघट चीरत,
धेनुहा तनले कर्ण पधरलन।
बस ताली पिटवा अर्जुन तू,
मत समझऽ अपना के वीर;
ई झूठा यश के पगड़ी के,
तनिके में दीहब हम चीर ।
जतना खेल देखवले बाड़ ऽ,
ऊ सब त हमहूँ देखलाइब;
चाहऽ त तोहरा के आगे,
आउर नयको दाव सिखाइब।
हाथन के हुनर देखाऽ तू,
आपन अँखियन के फार-फार,
नाम कमइला के सस्ते में,
बड़ऊवे बार बार धिक्कार।
कइसे लड़ल लड़ाई जाला,
ऊहे कर्ण देखावे लगलें;
ठमका मार गोइल जमघट के,
तबहूँ लोग निहारत रहलें।
चारो तरफ सन्नाटा छवलख
मोह से मुँह मुरझाइल;
धेनुहा पर डोरी के तनते,
कर्णे के गुंज झनकाइल।
नर-नारी कह उठलें कर्ण के,
निपुण बड़ा तू बाड़ ऽ;
पड़ल बिपत भारी इहँवा,
अब राजवंश भकुआइल। 24
भीष्म, द्रोण, अर्जुन धुमिलइलें,
सब केहू के मुँह सुखाइल;
केवल एक सुयोधन कहलन वीर,
ई हे बात सुनाइल।
भीड़ ऽ पार्थ तू एका-एकी,
कह राधेय देलन ललकारा;
बइठल रहिह चुपचाप पार्थ तू,
गुरू द्रोण के भइल ईशारा।
कृपाचार्य अनजान वीर बालक से,
कहलन एके बात;
अर्जुन हवन पांडु के बेटा,
बाप माथ पर बडुवे ताज।
राजा के बेटा ह क्षत्री ह,
असहीं नाहिं लड़ेंला;
जेही-सेही से अझुरा में,
नाहीं कूद पडेला।
अर्जुन से लड़बऽ त,
सभवा में मुँहवा तनि खोलऽ;
नाम-गाँव के साथे-साथे,
जतियों आपन बोलऽ ।
जाति पुछते सुन दुख से भरल,
कर्ण के मन पीडा से डोलल;
अगिआइल रवि के देखते,
इहो वीर खिसिअइले बोलल।
रटना जाति के ऊहे रटे,
जे कपट ढोंग से भरल रहे;
जाति-पात कुछ भी ना जानी,
जाति हमार भुजबल ही कहे।
कवन काम के मुकुट माथ पर,
जब भीतर करिखा भरल रहे;
सगरो बस जतिये ही पूछस,
पुछतो गतरी लाज ना रहे।
सूत के पुत हई हमहूँ
पर पार्थ बाप के नाम बतावस;
हिम्मत होखे त कहस,
लाज से मुँहवा नाहिं छिपावस।
जाति के पगड़ी माथा बन्हले,
झुठहू राह चले लें;
पापी अइसन चुसइल के घर,
सेतिहे में खुब सुख भोगेलें।
नीच जाति से काहे तोहरो,
चोला थर-थर काँपे;
अंगुठा के ही काहे कोई,
छल से भीख में माँगे।
कुब्बत होखे त पूछऽजाति,
हमरा भुजा के बल से,
पूछऽ ललाट के तेज से,
बल आऊर कवच-कुण्डल से।
पढ़ ल तेजई हमरो,
जे हरदम चक-चक करे अंजोर;
का हउवे इतिहास देख ल,
रोवाँ-रोवाँ करत बा शोर।
बड़ा वीर लड़वइया बाडऽ अर्जुन,
तब आगे बढ़ आव;
कइसन क्षत्री के तेजी होला,
हमरा के तनिका देखलाव।
धेनुहा बाण अबहिये छीनब,
छुछे हाथ रह जइब राजा के पूत;
लगले में चिन्हबऽ हमरा के,
कवन जाति के हई सूत।
सेतिहे में काहे खिसिआलऽ, कृपाचार्य ई पूछलन;
सोझे सोझे बात त बडुवे,
कह के ऊ समझावे लगलन।
राजा के छवड़ा से लड़ला बिन,
तोहरा होता जब अकाज;
देखलावे के चाहीं एको बड़का,
अपना नामे का बडुवे राज।
अकबक में पड़लन कर्ण
मन के भीतर में खो गइलन,
ई अन्याय सहल ना गोइल,
तबे सुयोधन आगे अइलन।
पाप भी छोटहन पड़िहे,
एह अपमान से ऊहो बोललन;
एह दीपक में अइसन ज्योति कि,
रवि अस धधके लगलन।
बीरन के मूल बीज, नदियन के,
निकलल के थाहे ना होला;
जाति-गोत्र कुछुवो भी नाहि,
वीर के हाथ बस धेनुहा होला।
मान मिलेला तप बल से,
ऊहे होला बड़का बलवीर;
डर से जेकर करेजा पातर,
ऊहे छोड्स जाति के तीर।
जमघट चीरत निकले बेरिआ कर्ण के,
केकर आँख मुदाइल रहे;
भरल सभा में सबके काहे,
सहजे भय समाइल रहे।
होखस कर्ण सूत के पुत,
चाहे होखस डोम-चमार;
उनका आगे फीका पड़लन,
सभा में काहे राज कुमार।
ई हवन हीरा अनमोल,
इनकर अपमान का ठीक बुझाता ?
मानवता के निखारल रूप ई,.
गाड़ल गहना का नाहिं चिन्हाता?
का वीर लड़वइया लड़ ना पायी ?
जब तक रही ना पासे राज;
त सुनले दुनिया डुग्गी कइलीं,
हमहूँ ऊहे परगटे आज।
रखनी मुकुट माथ कर्ण के,
अंग देश के हमहूँ आज;
भल होवे एह बड़ा वीर के,
भेंट चढ़वली एगो राज।
कर्ण के माथ मुकुट के रखते,
जय-जयकार बस होखे लागल;
रंगभूमि में अब त केवल,
दुर्योधन के जय गूंजे लागल।
भौंचक भइलें कर्ण,
सुयोधन के कइल कृपा पर,
लगते गलबाँही ढरल लोर,
जे करज चढ़ल उनका सिर ऊपर।
हिरदा से साट दुर्योधन कहलन,
थीर हो खऽ हे भाई;
काहे बेयाकुल भइल बाडऽ,
छोटहन भेंट देला से भाई।
देके एगो राज ना कवनो,
तेयाग बिचितर कइली;
हमरा से सटल रहत त,
गद्गद् होके बहुत सरहतीं।
अतना दुलार के बात जान के,
कर्ण भार से दब गइलन;
बोललन, हे सखा शूर, आज से,
दू देहिया में एके प्राण समइलन।
भरल सभा के बीच. आज,
जतना आदर तू दिहलऽ;
अब तक के हमरा जिनगी के,
बहुते ऊँच कर दिहलऽ;
कवन दाम चुका के उबरी
तनिको नाहिं बुझाता;
रवि राखस जिनगी के तोहरा,
हर काम हम आइब भ्राता।
आनन्दे मोहित होकर के,
घेरले रहलन नगर के बासी;
ताकत ही के पूजे के मन,
सव लोगन में होला खासी।
चाहे मन में कोई कहे,
बैरी, डाही, झूठ, घमंडी;
पूजे लायेक वीर के लोग,
नापिये लेला अपना डंडी ।
रोरी फूल छिटाये लागल,
लोगन से कर्ण पुजाये लगलें;
खुशियन के फौब्बारा छूटल,
रंगभूमि मुस्काये लगले।
लोगन से अधिका कर्ण,
हथजोरी में आगे पड़ले;
बेयाकुल जनता के बीच,
जय अंगदेश घहराये लगले।
सुनते नाम अंगेश,
लागल कवनो तीन् हिरदा के छेदले;
अचरज में खिसिआके बोललें भीम,
जब दोसर कुछ ऊहो ना पवले।
घोड़ा के पोंछी सुहरावत,
जेकर बीतल सारा दिन;
ऊ सूत पूत का राज चलइहें,
चहलो पर भी एको दिन।
डॅटलें दुर्योधन, भीम के,
झूठे बकबक करऽ मत;
जहर डाह के मन में धर के,
धरम धुरन्धर बनऽ मत।
बड़का कुल के मूल का करी,
जब काम नीचतई के होखे;
कुल वैभव धन कुछवो नाहिं,
जब चलनिया अधमें होखे।
साँच सवाल कर्ण के बडुवे,
हवऽ कवन तू ईहे बोलऽ;
कइसे माई के कोखे अइलऽ
जानत होखऽ त खोलऽ।
आपन ढंढर केहू ना देखे,
गजबे दुनिया के हवे चाल;
आपन लिलार देख ना पावे,
ईहे ह नयनन के हाल।
कृपाचार्य बीच बात के कटलन,
छी: छी: लाज ना आवे;
कइसन बाड़ ऽ लोग कि,
बाँचल पानी पर लाज ना आवे।
भइल साँझ दिन बीतल,
अब अपना घरे चलीं जा;
थाकल-मांदल साचल के,
खूब आराम करीं जा।
चल पड़लन पुर वासी,
रंगभूमि से नाँचत गावत;
केहू कर्ण के, पार्थ के केहू,
आपस में गुण गावत।
गुरु द्रोण अलगे चललें,
लेके अर्जुन के अपने साथ,
हमनी के राह में राहु बन ई
कइसे आइल सुनऽ हो पार्थ।
होखस मत पैदा दुनिया में,
अर्जुन से आँख लड़ावें वाला;
एके टक लगवले रहीं,
जस एके टक निशाना साधल जाला।
बिना आह के एकलव्य से,
अंगुठा के लेनी कटवाय;
चाहत बानी बेटा कइसे,
तोहरो राह निष्कंटक बन जाय।
डोल उठल बा धीरज,
जवन आज अपने हम देखली;
सबसे बड़का वीर के गुण,
आज कर्ण के बीचे देखलीं।
अगर ई चमकत बीर बालक,
बिन रोकले ही बढ़त जाई;
कहियो तोहरा खातिर अर्जुन,
ईहो बड़ा काल बन जाई।
कवन लग्गी लगाई इनका,
ईहे हम सोचत अब बानी;
बड़ विशाल एह धूमकेतु के,
देखऽ चमक घटावत बानी।
नाहिं बनाइब कर्ण के चेला,
तू एकरा के ल जान,
एह विकराल बैरी पर,
देले रहिह तनिका ध्यान।
कौरव कर्ण के लेके चललन,
राह में शंख बजावत;
गीत खुशी के गावत झूमत,
चलले मौज मनावत।
दे गलबाँही कर्ण सुयोधन,
चललें मिलके साथे-साथे;
लागल दू पहाड़ सुवरन के,
चमचमात हो साथे – साथे।
ओढ़ पीताम्बर सांझ के सूरज,
शीतल नयन से रहस जुड़ात;
आपन बेटवा के कोमल चीकन,
अंग चूमके रहस आघास।
उमड़ल पुत्र प्यार से मोहित रवि,
रथ के घोड़न के रोकले रहन;
कुछ काल लागल कि धरती पर,
रवि के चक्का रूकल रहल।
सब रानी जब मिल के,
राज भवन के राह पकड़ली;
बेयाकुल होके दुखित कष्ट से,
एक जनी पीछे में चलली।
सुख सपना छितराइल हारल,
सब साधन भरकाइल,
चलते बेरिया कुन्ती के पाँव,
अपने आप थथमाइल।


