आगरा वार्त्ता
चलता राही पूछ रहा था, जैपी होटल ठंडा क्यों,
कोई बता दे, अमर विलास में गर्मी क्यों।
एक में जनतंत्र था बैठा, दूसरे में था सैन्यतंत्र;
एक मंत्र से था बम को फोड़ा, एक के पास था शेखी के यंत्र,
सड़ रहा एक का भरा गोदाम एक के पास खाली है गोदाम;
एक प्रथम स्वयंसेवक है, एक तालिबानी सेवक;
हर का राष्ट्र ही जाने किसकी कितना सेवा, कैसा सेवक।
एक के पास अभिन्न अंग का मंत्र, एक के पास जेहाद का फतवा;
एक रेखा पार नहीं हो सकता,
एक सीमा पार पठाता मुड़ कटवा एक तो बस यात्री है,
एक रातो-रात उडन खटोले से उड़ जाता;
बैठक में मुद्दे पहले किसका, था खुला विचार का न्योता
रोजाना होटल के दिवाल पर लिखा जाता;
एक कहता सीमा पार से आतंकवाद फरिया लो पहले; दूसरा कहता काश्मिर ही बोलेंगे केवल पहले।
पहले तुम, पहले तुम, यही सुना था पहले;
होगा चौका में तुम, होटल मे होता है हम पहले।
चाय तो पीता हूँ, पर हुर्रियत के प्याला से मेरा छू नहीं जायेगा;
कंधार तक नभ में बदन रगड़ाया,
तो क्या आगरा में भी रगड़ायेगा।
कोई पीये या नहीं, हुर्रियत को पीलायेंगे;
पाक के पाठ को उसे चुपके से पढ़ायेंगे।
जो जी करे, एक तरफा ही होगी तेरी; मैं साथ न दूँगा,
भले रिश्ते नहीं है मेरी।
हम भी वार्ता के अंशों को छोड़ अपना ही बतायेंगे।
जो होगा काम लोयक बस उतना ही बतायेंगे।
वार्ता के अंशों को छोड़ दिया आपने;
तो तड़के अखबार नवीसों को भी चाय पिलाते हैं।
कुछ छोड़ा है तो मैंने क्या छोड़ा; अब उन्हें कुछ जोड़-जाड़ बताते है।
समझौते की कुछ दस्तावेज तो बनाते जाओ ?
कुछ भी नहीं निकला, तो भी आगे जारी रहेगी, कहते तो जाओ।
चुपके भाग गया मेहमान, पर वार्त्ता भंग नहीं मानेंगे;
शिमला से लाहौर तक के प्रयासों को, आगरा में जारी ही मानेंगे।
चलता राही धिक्कार रहा, क्यों 65 नहीं दुहराता है;
होटल के खर्च का बोझ मेरे सिर बढ़ाने में, मजा आता है।
कुछ पाठ पढ़ो, इतिहास पढ़ो, व्यर्थ का समय न गवाओ;
देश का ठेहुना असली है, मजबूत है, कुछ तो कर दिखलाओ।


