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जगजीवन राम

जगजीवन राम

शोभी-वासन्ती के जग्गु, एक दिन बन गये जगजीवन;
चन्दवा की माटी ने दिया, देश को अपना नव जीवन।
छुआछूत का भेद मिटाने का, बीड़ा को थामा था;
दलितो, पिछड़ों के आँसू पोछने, का जिम्मा को थामा था।
फिर गंगाजल से क्यों धोया भोले को,
छूआ वो भी तो बम भोला था।
सोच अगर यह मिटा नहीं तो, कैसे मिटे जो फैला एक फफोला था;
पीछे जिसके अपार जनता हो, कैसे कोई कहे, अकेला था।
हरित क्रांति को लाकर तुमने, कृषकों में हर्ष भरा था;
पी.एल. 480 को ठेंगा दिखालाकर, भूखे उदरों को तू ही भरा था।
तूहीं संतरी, तूहीं प्रहरी,
योद्वा सन 71 का, तुम पर है अभिमान;
आत्म समर्पण किया पाक था,
तेरे कौशल ने चूर किया था उसका मान।
श्रमिक संगठनों को लाया तुमने, एक छतरी के अंदर;
श्रमशक्ति का तेरा चिन्तन, दे मर्यादा, श्रम को,
रोक दिया था उठा बवन्डर।
नमन तुम्हें हे जगजीवन, नमन तुम्हारे चिन्तन को,
जोश बढ़ाना हे जगजीवन, नमन तुम्हारे चिन्तन को।

रचनाकार डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(उक्त कविता डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित नाटक और कविता संग्रह यथावत से ली गई है,लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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