
RKTV NEWS/रविंद्र पांडेय (व्यंगकार) 25 मई। पांच सौ का नोट चौड़ा हुआ जा रहा है। छाती उतान हो गई है। स्टैंडर्ड बढ़ गया है। छुट्टे वाली औकात से ऊपर आ गया है। पहले कोई भी दो हजार के छुट्टे मांगता था, तो देनेवाला सबसे पहले पांच सौ के चार नोट ही पकड़ाता था। छुट्टे की औकात से बाहर आना बड़ी बात है। और आज के जमाने में बड़ी बात से भी बड़ी बात… मन की बात होती है। मन का क्या है? उसमें कुछ भी आ सकता है। बहुतेरे मन तो बिना बात की बात में भी हजार मन का बोझ ले लेते हैं। खबर आई कि दो हजार का नोट अब नहीं चलेगा। जिसके पास दो हजार के नोट हैं, वो अपना दिमाग नोट खपाने में लगा रहे हैं। और जिनके पास दो हजार वाला एक भी नोट नहीं है, वे अपना दिमाग रिसर्च में खपा रहे हैं। भारत की आबादी 142 करोड़ है। हमारी रिसर्च बताती है कि इनमें से 141 करोड़ लोगों के दिमाग में सवालों का भीषण संघर्ष चल रहा है। दो हजार के नोट बंद क्यों किया? बंद ही करना था तो लाए क्यों? लाए तो फिर बंद काहे किए? किसको फायदा पहुंचाने के लिए लाए थे? किसको फायदा पहुंचाने के लिए बंद कर दिए? भीषण संघर्ष है। गर्मी से लोग हलकान हो रहे हैं। लोगों को लगता है कि गर्मी का कारण मौसम है। मगर मेरा दावा है कि यह गर्मी 141 करोड़ दिमागों में चल रहे वैचारिक संघर्ष की उपज है।
विज्ञान सिद्ध कर चुका है – संघर्ष से गर्मी उत्पन्न होती है। मेरा दिमाग भी घनघोर संघर्ष से जूझ रहा है। इतना घनघोर, कि बालों को भी पसीना आ रहा है। कल की लगाई डाई आज बालों से उतर गई। पर अफसोस नहीं है। बड़ा संतोष है। बड़ा काम है। बड़ा संघर्ष है। बड़ा चिंतन है। बड़ी चिंता है। सब देश के लिए ही तो कर रहा हूं। मेरा देश है। मैं नहीं चिंता करूंगा, तो कौन करेगा? संवेदनशील आदमी हूं। ईश्वर ने कूट-कूट कर संवेदना भर रखी है। और सबसे ज्यादा संवेदना तो जेब में भर दी है। दोनों हाथों से लुटाता रहता हूं। लोगों की पीड़ा अपनी पीड़ा लगती है। कभी-कभी तो डर लगने लगता है। लोगों की पीड़ा खत्म हो गई, तो मेरी संवेदना का क्या होगा? गूगल पर सर्च किया था। पता चला कि संवेदना का अचार भी नहीं बनता।… वैसे अपनी-अपनी राय है। मेरा दिमाग तो यह सोच-सोचकर गरम हुआ जा रहा है कि उन परिवारों पर क्या बीती होगी, जिनके पूरे खानदान में किसी के पास दो हजार वाला एक भी नोट नहीं है। बेचारे, क्या बदलवाएंगे? किस्मत बदलवा लो भाई!… जा रे जमाना। इतने प्यार से बेपानी तो न करिए सरकार। दो हजार के एक नोट की कीमत आप क्या जानो, सरकारी बाबू। सफेद कुर्ते की ऊपरी जेब से दो हजार का गुलाबी नोट, जब बाहर झांकता था, सामने वाले की नजर में इज्जत बढ़ जाती थी।
आपको उन सासु मांओं की पीड़ा नहीं समझ आएगी, जब दामाद के हाथ में दो हजार का नोट पकड़ाकर फूली नहीं समाती थीं। पांच सौ के दस नोट भी दो हजार के एक नोट की बराबरी नहीं कर सकते। और, मिश्रा जी के लिए दो हजार का एक नोट बीस हजार से ज्यादा का था। पान खाना हो, सब्जी लेनी हो, चाय पीनी हो…. मिश्रा जी बड़ी नफासत से दो हजार का नोट निकालते थे।… सामने से यही जवाब आता – जो चाहिए ले जाइए। पैसे बाद में दे दीजिएगा। सैलून वाला बेचारा छह महीने में कई बार उनकी केश सज्जा कर चुका था। इस नोटबंदी ने मिश्रा जी और उनके जैसों का पूरा अर्थशास्त्र चौपट कर दिया है। मित्रो, सरकार की सरकार जाने। मैं आपकी पीड़ा समझता हूं। काश! मेरे पास दो हजार वाला एक भी नोट होता, तो बैंक के काउंटर पर कालर ऊंची कर खड़े हो लेता।
