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वट सावित्री व्रत : वैज्ञानिक चेतना एवं पर्यावरण संरक्षण का सनातन पर्व

बिलासपुर/छत्तीसगढ़ (शांति सोनी)17 मई।

वृक्षाणां रक्षणं पुण्यं, जीवनस्य परं धनम्।
प्राणवायुप्रदाता च, वटवृक्षो नमोऽस्तु ते॥
माता भूमिः पुत्रोऽहं, प्रकृतेः शाश्वती कथा।
यत्र वृक्षा: पूज्यन्ते, तत्र रम्यं शुभं गृहम्॥

वट की शीतल छाँव में, संस्कृति का विस्तार।
धरती माँ का प्रेम यह, जीवन का आधार॥

भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, अपितु जीवन-दर्शन, प्रकृति-संरक्षण और वैज्ञानिक चेतना का भी सशक्त माध्यम है। वट सावित्री व्रत ऐसा ही एक पावन व्रत है, जिसमें नारी अपने अखंड सौभाग्य, परिवार की समृद्धि तथा दीर्घायु की कामना करती है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह व्रत भारतीय नारी के अटूट समर्पण, तप, त्याग और प्रेम का दिव्य प्रतीक है। किंतु यदि इसके आध्यात्मिक स्वरूप से आगे बढ़कर देखा जाए, तो यह पर्व वैज्ञानिक दृष्टि और पर्यावरणीय चेतना का भी अद्भुत संदेश देता है।
वट वृक्ष, जिसे सामान्यतः बरगद कहा जाता है, भारतीय परंपरा में अक्षय जीवन का प्रतीक माना गया है। इसकी विशाल शाखाएँ, गहरी जड़ें और दीर्घजीवी प्रकृति मानव जीवन को स्थायित्व एवं धैर्य का संदेश देती हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से वट वृक्ष अत्यंत उपयोगी है। यह वृक्ष अन्य वृक्षों की अपेक्षा अधिक मात्रा में ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है तथा वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड और अनेक विषैले तत्वों को अवशोषित कर वायु को शुद्ध बनाता है। इसकी छाया तापमान को नियंत्रित कर प्राकृतिक शीतलता प्रदान करती है, जिससे पर्यावरण संतुलित रहता है।
वट सावित्री व्रत में महिलाएँ वट वृक्ष की परिक्रमा कर उसके तने पर रक्षा-सूत्र बाँधती हैं। यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि वृक्षों के संरक्षण का सांस्कृतिक अभियान है। जब किसी वृक्ष को आस्था से जोड़ दिया जाता है, तब समाज स्वतः उसकी रक्षा करने लगता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति ने पीपल, नीम, तुलसी और वट जैसे वृक्षों को पूजनीय बनाकर पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत मार्ग प्रशस्त किया।
इस व्रत की कथा में सावित्री का अदम्य साहस, ज्ञान और संकल्प नारी-शक्ति की महानता को प्रतिपादित करता है। सावित्री ने अपने तप, बुद्धिमत्ता और दृढ़ निष्ठा से यमराज तक को पराजित कर सत्यवान के प्राण पुनः प्राप्त किए थे। यह कथा केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि यह संदेश है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और सकारात्मक चिंतन से मनुष्य कठिनतम परिस्थितियों पर भी विजय प्राप्त कर सकता है। आधुनिक मनोविज्ञान भी स्वीकार करता है कि उपवास, ध्यान और सकारात्मक आस्था मानसिक संतुलन तथा आत्मबल को सुदृढ़ बनाते हैं।
वर्तमान समय में जब पृथ्वी पर्यावरणीय संकट, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, तब वट सावित्री व्रत जैसे पर्व अत्यंत प्रासंगिक हो उठते हैं। यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, वृक्षारोपण और पर्यावरण-संरक्षण की प्रेरणा देता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति इस अवसर पर एक वट वृक्ष अथवा कोई अन्य पौधा रोपित करने का संकल्प ले, तो यह परंपरा पृथ्वी के संरक्षण का विराट अभियान बन सकती है।
निस्संदेह, वट सावित्री व्रत भारतीय संस्कृति की उस दिव्य चेतना का प्रतीक है, जहाँ धर्म, विज्ञान और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक बनकर मानव जीवन को समृद्ध करते हैं। यह पर्व केवल सौभाग्य की कामना का अनुष्ठान नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन, सामाजिक चेतना और जीवन-मूल्यों के संरक्षण का सनातन संदेश है|

वृक्षो रक्षति रक्षितः, सत्यं शास्त्रेषु गीयते।
प्रकृतौ यः स्नेहं कुर्यात्, सुखं तस्य पदे पदे॥
धर्मो रक्षति रक्षितः, प्रकृतिः पालयेत् जगत्।
वटपूजां यः करोति, तस्य शुभं भवेद् ध्रुववट॥

सावित्री व्रत कहे, प्रकृति रहे सहेज।
हरियाली से ही सदा, जीवन पाए तेज॥
वट की पूजा में छिपा, धरती का सम्मान।
पेड़ बचेंगे तो बचे, मानव का अभियान॥

शांति सोनी

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