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दिवंगत कवयित्री को समर्पित कविता:संवेदना के स्वर थी गायत्री सहाय

संवेदना के स्वर थी गायत्री सहाय

कौन थी गायत्री सहाय
जो लगती थी कविता जैसी
गायत्री सहाय एक
मीठी कविता का नाम थी
गांव की सौंधी मिट्टी की महक थी
फगुआ की सुगंधित अबीर और गुलाल थी और रंगों की बौछार थी “गायत्री सहाय”।

चैत की चैती और बासंती बयार में कोयल की कुक थी,
सावन में झूलों पर अठखेलियां करती सखियों की कजरी की सुरीली आवाज थी “गायत्री सहाय”।
खेतों से ललहाती
तिलहन के पीले फूलों की गमक थीं ,
बरसात के पहली फुहार में खेतों से आती सोंधी सुगंध थी” गायत्री सहाय”

फुलवारी के सरोवर में खिलते कमल की फुल थी “गायत्री सहाय”।
बगिया में आम के मोजर और महुआ के फूल की मादक गंध थी “गायत्री सहाय”

तुलसीदास की सरस चौपाई थीं
शारदा सिन्हा की पूर्वी की धुन थी
भोजपुरी माटी की गमक लिए कविता को साधने वाली साधिका थी “गायत्री सहाय”।
चाहे जितनी बार पढ़ो उनको
वे घुसती जाती हैं मन के अंदर
लगातार होती जाती है अति प्यारी
और बनती जाती हैं अति न्यारी
रिश्तो के उजड़े चमन में
फूलों की बाग की बागवान थी “गायत्री सहाय”

रचनाकार: अतुल प्रकाश

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