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हिंदी दिवस: जिस भाषा में जनता सोचती है, न्याय भी उसी भाषा में क्यों न पहुंचे?

सुमित कुमार मिश्र
अधिवक्ता | लेखक | मीडिया प्रोफेशनल

भोपाल/ मध्यप्रदेश (सुमित कुमार मिश्रा)14 सितंबर।भाषा केवल शब्दों का संसार नहीं होती। भाषा सत्ता और समाज के बीच पुल होती है। भाषा नागरिक और संविधान के बीच संवाद होती है। और जब सवाल न्याय का हो, तो भाषा नागरिक के अधिकार तक पहुंचने का रास्ता बन जाती है।

14 सितंबर को देश हिंदी दिवस मनाएगा। मंच सजेंगे, भाषण होंगे, हिंदी के महत्व पर चर्चाएं होंगी और हिंदी के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाएगा। लेकिन हिंदी दिवस का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हिंदी और भारतीय भाषाएं केवल समारोहों की भाषा रहेंगी, या शासन, न्याय, शिक्षा, विज्ञान और नीति-निर्माण की वास्तविक भाषा भी बनेंगी?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उस नागरिक में होती है, जो अपने अधिकारों को समझता है, अपने कर्तव्यों को जानता है और व्यवस्था से सवाल पूछने का साहस रखता है।

यदि किसी नागरिक को कानून समझने के लिए ऐसी भाषा पर निर्भर रहना पड़े, जिसे वह सहज रूप से नहीं समझता, तो कानून उसके लिए किताब में लिखे शब्दों से अधिक कुछ नहीं रह जाता। कानून का वास्तविक लोकतंत्रीकरण तभी होगा, जब उसका अर्थ उस व्यक्ति तक पहुंचे, जिसके जीवन को वह प्रभावित करता है। यहीं से हिंदी दिवस का संबंध न्याय से जुड़ता है। कानून की भाषा जितनी जनता के करीब होगी, न्याय उतना ही जनसुलभ होगा।

भारत की न्याय व्यवस्था संविधान से संचालित होती है। संविधान प्रत्येक नागरिक को अधिकार देता है, लेकिन अधिकारों की जानकारी और उनकी समझ भी उतनी ही आवश्यक है। न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय, सरकारी आदेश, कानून की व्याख्या और नागरिक अधिकारों से जुड़ी जानकारी यदि सरल भाषा में जनता तक नहीं पहुंचती, तो न्याय और नागरिक के बीच अनावश्यक दूरी पैदा होती है। इस दूरी को कम करना केवल भाषाई आवश्यकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आवश्यकता है।

भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था में हाल के वर्षों में बड़ा परिवर्तन हुआ है। भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम ने पुराने आपराधिक कानूनों का स्थान लिया है। यह बदलाव केवल धाराओं और प्रावधानों का परिवर्तन नहीं है, बल्कि न्याय व्यवस्था को नए कानूनी ढांचे में आगे ले जाने की प्रक्रिया है। लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या आम नागरिक इन बदलावों को समझता है?

किसी कानून की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह संसद से पारित हो गया। उसकी वास्तविक सफलता तब है, जब पुलिस उसे सही ढंग से लागू करे, वकील उसे प्रभावी ढंग से समझे, न्यायालय उसकी उचित व्याख्या करे और सामान्य नागरिक यह जान सके कि कानून उसके लिए क्या कहता है। इसके लिए सरल हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में कानूनी जागरूकता को बढ़ाना होगा। कानून की जानकारी यदि केवल विशेषज्ञों तक सीमित रह जाए, तो कानून और समाज के बीच दूरी बनी रहेगी।

यहीं हिंदी पत्रकारिता की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। पत्रकारिता का काम केवल यह बताना नहीं है कि क्या हुआ। जिम्मेदार पत्रकारिता यह भी बताती है कि क्यों हुआ, कानून क्या कहता है और इसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा। आज सोशल मीडिया के दौर में सूचना की गति बहुत तेज है, लेकिन सूचना की गति और सत्य की गहराई एक ही चीज नहीं है। आधी-अधूरी कानूनी जानकारी, भ्रामक शीर्षक और बिना संदर्भ की खबरें समाज में भ्रम पैदा कर सकती हैं।

इसलिए हिंदी पत्रकारिता को सनसनी की दौड़ से ऊपर उठकर तथ्य, संविधान, कानून और जनहित आधारित पत्रकारिता को प्राथमिकता देनी होगी। हिंदी को केवल भावनाओं की भाषा नहीं, बल्कि तथ्य और तर्क की भाषा भी बनना होगा।

हिंदी को मजबूत करने का अर्थ अंग्रेजी का विरोध करना नहीं है। अंग्रेजी ने भारत को दुनिया से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और उसका ज्ञान आज भी उपयोगी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी नागरिक की अपनी भाषा उसके लिए अवसरों की बाधा बननी चाहिए? अंग्रेजी जानना अवसर हो सकता है, लेकिन अपनी भाषा में ज्ञान उपलब्ध होना नागरिक की गरिमा और समान अवसर से जुड़ा प्रश्न है। भारत को बहुभाषी समाज के रूप में आगे बढ़ना चाहिए, जहां अंग्रेजी सहित सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान हो और किसी भाषा का ज्ञान नागरिक के अधिकारों और अवसरों के बीच दीवार न बने।

हिंदी की शक्ति तभी बढ़ेगी, जब वह दूसरी भारतीय भाषाओं का सम्मान करते हुए उनके साथ आगे बढ़ेगी। मैथिली, भोजपुरी, अवधी, ब्रज, राजस्थानी, मराठी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, असमिया, ओड़िया, पंजाबी और देश की तमाम भाषाएं भारत की सांस्कृतिक चेतना की अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं। भारत की भाषाई विविधता कमजोरी नहीं, उसकी सभ्यतागत शक्ति है। हिंदी को इस शक्ति का सेतु बनना चाहिए, दीवार नहीं।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक के दौर में हिंदी के सामने अभूतपूर्व अवसर हैं। आज मोबाइल फोन के माध्यम से ज्ञान करोड़ों लोगों तक पहुंच सकता है। कल्पना कीजिए कि एक ग्रामीण नागरिक अपने मोबाइल पर सरल हिंदी में जान सके कि गिरफ्तारी के समय उसके अधिकार क्या हैं; कोई महिला समझ सके कि कानून उसके अधिकारों की रक्षा कैसे करता है; कोई विद्यार्थी संविधान के प्रावधानों को अपनी भाषा में पढ़ सके; कोई किसान सरकारी योजना की शर्तों को बिना किसी बिचौलिए के समझ सके। तब भाषा केवल अभिव्यक्ति नहीं रहेगी, बल्कि सशक्तीकरण का माध्यम बन जाएगी।

हिंदी दिवस पर हमें केवल हिंदी बोलने और लिखने का संकल्प लेने से आगे जाना होगा। हमें ऐसी हिंदी के निर्माण का संकल्प लेना होगा, जो ज्ञान की भाषा हो, न्याय की भाषा हो, तकनीक की भाषा हो और जनभागीदारी की भाषा हो। क्योंकि लोकतंत्र की सबसे मजबूत आवाज वही होती है, जिसे जनता समझती है। और न्याय की सबसे मजबूत भाषा वही है, जिसमें अंतिम व्यक्ति अपने अधिकार को पहचान सके।

इसलिए हिंदी दिवस केवल हिंदी का उत्सव नहीं होना चाहिए। यह उस भारत का संकल्प दिवस होना चाहिए, जहां भाषा किसी नागरिक के सामने बाधा नहीं, बल्कि उसके अधिकारों तक पहुंचने का माध्यम बने। जिस भाषा में भारत का सामान्य नागरिक अपने सुख-दुख कहता है, उसी भाषा में उसे संविधान समझने का अधिकार भी होना चाहिए और न्याय को समझने का अवसर भी।

हिंदी का सम्मान तब पूर्ण होगा, जब हिंदी केवल राजभाषा के दस्तावेजों और हिंदी दिवस के मंचों तक सीमित न रहे, बल्कि नागरिक के जीवन, ज्ञान, शासन और न्याय के अनुभव में दिखाई दे।

क्योंकि जिस दिन जनता कानून को अपनी भाषा में समझने लगेगी, उस दिन न्याय केवल अदालत की चारदीवारी में नहीं रहेगा—वह समाज के बीच दिखाई देगा।

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