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पटना: पारंपरिक लोकगीत पुस्तक का हुआ लोकार्पण।

निजी उत्सवों का पारंपरिक गीतों के बगैर कल्पना संभव नहीं: डॉ सी पी ठाकुर

परंपराओं के प्रति चिंतन की है आवश्यकता : डॉ अनिल सुलभ

RKTV NEWS/पटना (बिहार)01 जून। बाबू जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान के सहयोग से लोक गीतों की परंपरा को कायम रखने में प्रबल समर्थन के तौर पर पुस्तक पारंपरिक लोकगीत का लोकार्पण आज 1 जून संध्या 4:00 बजे हुआ । मुख्य अतिथि पद्म भूषण सी पी ठाकुर, डॉ अनिल सुलभ , डॉ नरेंद्र पाठक निदेशक बाबू जगजीवन राम शोध संस्थान , मनोरंजन ओझा लोकगीत गायक, हृदय नारायण झा सदस्य मैथिली अकादमी के कर कमलों से संपन्न हुआ ।
आकाशवाणी विविध भारती दिल्ली की उद्घोषिका सारिका पंकज के संचालन में कार्यक्रम आरंभ हुआ। कार्यक्रम का आरम्भ पुस्तक की लेखिका एवं संकलकर्ता गीता सिंह के स्वागत गीत और झूमर से हुआ।
डॉक्टर सीपी ठाकुर ने बज्जिका भाषा में लिखी पुस्तक पारंपरिक लोकगीत के महत्व पर अपने शब्दों में इसकी उपयोगिता साथ ही इसको संचित करने के महत्व को उपस्थित लोगों से साझा किया।उन्होंने कहा की व्यक्ति कितना भी बाहरी दुनिया में रहे मगर उसके निजी उत्सवों को पारंपरिक गीतों के बगैर कल्पना करना संभव नहीं और इसलिए इसे धरोहर के रूप में देखना जरूरी है ।
बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष डॉक्टर अनिल सुलभ ने लेखिका को बधाई देते हुए कहा कि ऐसी पुस्तकों के प्रकाशन और जनमानस तक इसकी पहुंच को सुनिश्चित करने के लिए न सिर्फ परंपराओं के प्रति चिंतित रहने की बात कही अपितु चिंतन की आवश्यकता पर बल दिया । उन्होंने कहा कि गीत साहित्य का उद्गम और विकास लोक-कंठ से ही हुआ। लोकगीतों में हमारी संस्कृति और परंपरा संरक्षित है। इसे जीवित रखना और उत्तरोत्तर विकास भारतीय समाज के लिए अत्यंत अनिवार्य है।
डॉक्टर नरेंद्र पाठक ने अपने उद्बोधन में अपनी साहित्य सुचिता द्वारा इस विषय पर और कार्य करने और नई पीढ़ी को इसमें आगे बढ़कर हिस्सा लेने के लिए कहा ।
दीपक ठाकुर जिनकी क्षेत्रीय भाषा भी बज्जिका ही है ने पुस्तक को महत्व्पूर्ण बताया क्योंकि पाठ्य रूप में ऐसी उपलब्धता न के बराबर है और ये भविष्य को के कर चिंता में डालने वाली है ।
पुस्तक की संकलनकर्ता व लेखिका लोकगीत गायिका आकाशवाणी पटना से गीता सिंह ने कहा कि यह सृजन, संजय ,संकलन हमारी अगली पीढ़ी के लिए है ताकि हमारे संस्कार गीत समाज से खत्म ना हो ।
ऐसे कार्यक्रम व पुस्तक साहित्य की नई विधा के लिए शुभ संकेत हैं।

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