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पुरानी खेती पद्वति से आत्मसात कराती अरुण दिव्यांश की रचना “पहिलका किसानी”

RKTV NEWS/अनिल सिंह,20 अप्रैल।आज के बदलते दौर में कृषि प्रधान देश भारत मे किसानों की हो रही अनदेखी ,बदलती खेती शैली और उत्पादन क्षमता हेतु रसायनिक खादों के हो रहे निरंतर उपयोग जिससे धरती की उर्वरा शक्ति का नित्य हो रहे ह्रास पर पहले की खेती प्रद्वति जिसमे बैलों से होती थी खेतों की जुताई का स्मरण कराती कवि अरुण दिव्यांश की भोजपुरी में लिखित में काव्य रचना पहिलका किसानी    “पहिलका किसानी”

कहां गईले हर बैलवा ,
कहां गईले उ दिन ।
कहां गईले पहिलका किसानी ,
विज्ञान लिहले उहो छिन ।।
सूर्योदय से पहिले खेत पहुंचे ,
दुपहरिया से पहिले घरे ।
दुपहरिया जईसे खतम भईले ,
चल दिहले मौसम से लड़े ।।
रोग से भरल आज देहिया ,
जीवनो भईल बा गमगीन ।
विज्ञान भईले जीवन के मुदईया ,
विज्ञान लिहले सुखवो छिन ।।
कबहूं किसान करे जोतनिया ,
कबहूं करे खेत में निराई ।
कबहूं करे खेत में बोवनिया ,
कबहूं करे ले सिंचाई ।।
तन के सुख सब छिनी गईले ,
कईसन जीवन काम के बिन ।
डाक्टर कहे भोर में टहलs ,
योग करs अब रोजे दिन ।।
एक हाथ में परिहत शोभे ,
दूजे हाथ में पैना विशाल ।
जगत पिता इहे कहावे ,
भारतीयता के बाटे मिसाल ।।
किसान कहावे धरती के बेटा ,
किसान के माथे धरती के ऋण ।
जवानिए में अब गईल जवानी ,
जवानिए में देहिया भईले क्षीण ।।

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