बजट कॉर्पोरेटो को राहत देकर आम जरूरतमंदों का बोझ बढ़ाने वाला बजट है: सुदामा प्रसाद
आर्थिक असमानता बढ़ाने और आम जनता पर बोझ डालने वाला बजट।
गरीबों और किसानों के लिए कोई ठोस राहत नहीं।
स्कीम वर्करों की मांगों की फिर अनदेखी, मनरेगा और कृषि बजट में कटौती।
महिला एवं बाल विकास विभाग के बजट में कमी।
बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के सवाल पर कोई पुनर्विचार नहीं तथा मध्य बिहार में सोन नहरों के पक्कीकरण व सोन नदी में इंद्रपूरी जलाशय के निर्माण की अनदेखी।
स्थायी नौकरियों और बेरोजगारी पर सरकार का कोई ठोस कदम नहीं।
RKTV NEWS/आरा (भोजपुर)07 फ़रवरी। आरा संसद सुदामा प्रसाद ने आम बजट में अपने वक्तव्य में कहा कि माननीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने इस सरकार का पहला आम बजट खाद्य वस्तुओं की बढ़ती मंहगाई, रुके हुए आर्थिक विकास, घटते रोजगार, गिरता रुपया, आम जन की घटती क्रय शक्ति, किसानों के आन्दोलन और विकासमान अर्थव्यस्थाओं पर ट्रम्प के अमेरिकी प्रशासन की धमकियों के बीच पेश किया है, जिसका ताजा उदाहरण अमेरिका द्वारा भारतीयों को घुसपैठिया कहकर, हाथ में हथकड़ी और कमर में जंजीर डालकर खूंखार अपराधियों की तरह अपमानजनक तरीके से भारत भेजने की घटना है।
जनता एक ऐसा राहत देने वाला बजट चाहती थी जिसमें बढ़ रही आर्थिक विषमता कम हो और आम जनता की क्रय शक्ति बढ़े, लेकिन भाजपा सरकार ने पिछली गलतियां सुधारने के बजाय इस बार भी अमीर परस्त बजट ही पेश किया है।
मध्यम वर्ग को आयकर में कुछ राहत मिली है, लेकिन मजदूरों, किसानों और आम मेहनतकश जनता को मुश्किल हालातों में ऐसे ही छोड़ दिया गया है, जो चिन्ताजनक है। उन्हें राहत देने के लिए आवश्यक उपभोक्ता सामग्री पर जीएसटी में कमी करने और जनकल्याणकारी योजनाओं में खर्च बढ़ाने की जरूरत को अनदेखा किया गया है। कॉरपोरेटों और अमीरों पर टैक्स बढ़ाने के लिए सरकार में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी साफ तौर पर उजागर हो रही है। निजी क्षेत्र के लगातार बढ़ रहे मुनाफे के बावजूद सरकार की प्राथमिकता अमीरों पर टैक्स बढ़ाने की जगह जनकल्याण, सामाजिक, कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों में खर्च कम करने की है। यह बिल्कुल जनविरोधी दिशा है।
केन्द्रीय योजनाओं पर सरकार ने पिछले साल बजट में घोषित मद से 93,978 करोड़ कम खर्च किये। प्रधानमंत्री आवास योजना और नेशनल रूरल ड्रिंकिंग वाटर मिशन पर पिछले साल घोषित राशि का मात्र 50 प्रतिशत से भी कम खर्च किया गया। यही नहीं, मनरेगा, ग्राम सड़क योजना, अनुसूचित जाति के लिए स्कॉलरशिप आदि में भी घोषणा से कम राशि खर्च की गई। महिला स्वास्थ्य और बाल विकास पर भी पूरी आवंटित राशि खर्च नहीं की गई और उल्टे इनके बजट में कटौती कर दी गई है।
इस साल के बजट में कृषि और किसान कल्याण विभाग का आवंटन घटा दिया गया है। खाद्य और जनवितरण विभाग के बजट में भी कमी की गई है।
स्किल डेवलपमेंट और एन्टरप्रिन्योरशिप के नाम पर पिछले बजट में काफी कुछ कहा गया, लेकिन इस मद में दिये गये 1435 करोड़ में से सरकार ने मात्र 669 करोड़ ही खर्च किये। स्वास्थ्य पर भी वास्तविक खर्च पिछले साल की गई घोषणा से कम रहा।
आशा, आंगनबाड़ी, मिड—डे मील व अन्य स्कीम वर्कर्स को नियमित करने और कम से कम न्यूनतम मजदूरी देने की मांग को फिर से नकार दिया गया है, जबकि पिछले दिनों गुजरात हाई कोर्ट ने इन्हे स्थाई करने का फैसला दिया है इसी तरह जग्गो बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले में केंद्र सरकार से अस्थायी, आकस्मिक और अनुबंध के आधार पर श्रमिकों की भर्ती बंद करने और उचित व स्थिर रोजगार प्रदान करने के लिए कहा गया है। बजट में इस आदेश को लागू करने के लिए वित्तीय आवंटन तो दूर कोई चर्चा तक नहीं हैं। स्थायी नौकरियों को लेकर कोई नीति घोषित नहीं की गई, जिससे बेरोजगारी की समस्या और गहराएगी।
सरकार ने बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश को 100 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है, जबकि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में आवंटन घटाया है। जाहिर है देश के किसान और आम जन को बड़े निजी कारपोरेशनों की दया पर छोड़ा जा रहा है।
सरकार ने पिछले साल पूंजीगत निवेश बढ़ाने की घोषणा कर खुद ही अपनी तारीफों के पुल बांधे थे, लेकिन अब सच्चाई सामने आ रही है कि घोषणा से 1.84 लाख करोड़ रुपये कम खर्च किये गये हैं!
इस बजट में जरूरी क्षेत्रों में खर्च न बढ़ा कर सरकार की गलत दिशा में जारी प्राथमिकतायें फिर से उजागर हुई हैं. आंकड़े स्पष्ट बता रहे हैं कि कुल बजट खर्च में दिख रही बढ़ोतरी का करीब 40 प्रतिशत तो लिये गये कर्ज का अतिरिक्त ब्याज चुकाने में ही खर्च हो जायेगा, जबकि जरूरतमंद आम जन पर बोझ बढ़ता जा रहा है, वहीं जीएसटी व इन्कम टैक्स की हिस्सेदारी कॉरपोरेट टैक्स से ज्यादा हो रही है। 2014-15 में कॉर्पोरेट टैक्स से 4.49 लाख करोड़ व आम जनता से 2.66 लाख करोड़ रुपये टैक्स से प्राप्त हुए। यह 2023-24 में क्रमशः 9.11 लाख करोड़ एवं 10.45 लाख करोड़ हो गए।
यह बजट मोदी सरकार की अपने क्रोनी पूंजीपतियों और कॉरपोरेट क्षेत्र के पक्ष में जारी आर्थिक अराजकता को पुन: स्थापित कर रहा है। मजदूरों की वास्तविक मजदूरी दर में आयी कमी और उनके नियमित रोजगार के कम हो रहे अवसर की सच्चाई को अनदेखा किया गया है, जबकि सरकार जानती है कि कॉरपोरेट टैक्स का मुनाफा चार गुना तक बढ़ गया है, फिर भी सरकार कॉरपोरेटों पर टैक्स नहीं बढ़ाना चाहती।
ऐसे में यह बजट वर्तमान आर्थिक विषमता, घटती मजदूरी दर और घटते रोजगार के अवसरों पर हमला करते हुए कॉरपोरेटों के मुनाफे को और बढ़ाने वाला बजट है।
यह बजट गरीबों की कल्याणकारी योजनाओं में कटौती, किसानों के लिए कोई राहत नहीं और स्कीम व अन्य मजदूरों की सुरक्षा की अनदेखी करने वाला बजट है। इससे आर्थिक असमानता और बढ़ेगी, बेरोजगारी व महंगाई की मार तेज होगी, जबकि कॉर्पोरेट मुनाफे लगातार आसमान छूते रहेंगे।
सरकार का किसानों की आय दोगुनी करने का दावा पूरी तरह खोखला साबित हुआ है, क्योंकि कृषि और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए बजटीय आवंटन पिछले साल की तुलना में घटा दिया गया है। एमएसपी पर भी बजट चुप है।
सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स नहीं बढ़ाया, जबकि अब उनका कुल कर भुगतान व्यक्तिगत आयकर से भी कम हो गया है। वास्तविक मजदूरी घटी, लेकिन कॉर्पोरेट मुनाफा चार गुना बढ़ गया।
बीमा क्षेत्र में 100% एफडीआई की अनुमति देकर सरकार ने किसानों और आम लोगों को निजी कंपनियों के भरोसे छोड़ दिया है।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का बजट ₹15,684 करोड़ से घटाकर ₹1,242 करोड़ कर दिया गया, जिससे किसानों का संकट और गहरा होगा।
बिहार राज्य के लिए घोषित मखाना बोर्ड बिहार के समग्र विकास के लिए पर्याप्त नहीं है। मखाना उद्योग के लिए कोई ठोस सहायता की घोषणा नहीं की गयी। स्थानीय किसान और व्यापारी आज हाशिये पर चले गए है।
बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग वर्षों से लंबित है, लेकिन सरकार ने इस पर कोई पुनर्विचार नहीं किया और न ही मध्य बिहार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ सोन नहरों के पक्कीकरण व सोन नदी में प्रस्तावित इंद्रपूरी जलाशय योजना के निर्माण के दिशा में एक कदम भी बढ़ाया।
बजट के माध्यम से क्षेत्र सहित देश और राज्य से सम्बंधित प्रमुख मांगों को रखी
1- देश में जातीय जनगणना कराकर संख्या के आधार पर कार्यपालिका, विधायक व न्याय पालिका मैं आरक्षण की सीमा बढ़ाई जाए।
2- देश में भूमि सुधार लागू करने के लिए भूमि सुधार आयोग का गठन किया जाए तथा सभी भूमिहीनों को वास भूमि कृषि भूमि और पक्का मकान दिया जाए।
3- देश के खुदरा व थोक व्यवसाय की दशा सुधारने के लिए व्यवसायक आयोग का गठन किया जाए और खासकर फुटपाथी दुकानदारों, छोटे मझोले व्यवसायियों को 5 वर्षों के लिए 2-2 लाख रुपये ब्याजमुक्त कर्ज दिया जाए।
4- बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिया जाए।
5- सोन नदी में प्रस्तावित इंद्रपुरी जलाशय के निर्माण तथा नहरों के पक्कीकरण का कार्य शीघ्र शुरू किया जाए।
6- भोजपुर जिला के शाहपुर आरा मुफ़सील, बईहरा के गवों के जान माल की सुरक्षा के लिए गंगा नदी के किनारे ठोकर बांध का निर्माण किया जाए। बईहरा के महुली घाट पर आठ माह से बंद पीपा पुल को शीघ्र चालू किया जाए तथा शिवपुर घाट पर निर्माणाधीन व महुली घाट पर गंगा नदी में प्रस्तावित स्थाई पुल का शीघ्र निर्माण किया जाए। साथ ही संदेश और रनिया तालाब के बीच सोन नदी में स्थायी पुल का निर्माण करवाया जाए।
7- कोरोना काल से बंद सभी साधारण एक्स प्रेस गाड़ियों का परिचालन शुरू कर, कोइलवर, कुल्हाड़िया, आरा, करीसाथ, बिहिया, बनाही, कसाप, गड़हनी, पिरो, हसन बाजार सहित उन सभी स्टेशनों और हाल्टों पर ठहराव सुनिश्चित किया जाए, जहां पहले होता था।
8- आरा में रेल अस्पताल का निर्माण तथा डालमिया नगर में प्रस्तावित रेल कारखाने को चालू किया जाए।
9- आरा से सासाराम रेल लाइन का दोहरी करण, प्रस्तावित आरा मुंडेश्वरी धाम तक रेल लाइन का निर्माण कार्य शीघ्र शुरू किया जाए। आरा – छपरा रेल लेने का निर्माण किया जाए।
10- भोजपुर के भेलाई में रेलवे द्वारा अधिग्रहित किसानों की जमीन का मुआवजा दिया जाए।
11- पूर्वी रेलवे गुमटी(आरा) पर निर्माणाधीन फुट ओवरब्रिज को जल्द पूरा किया जाए।

