
नई दिल्ली/रविशंकर सिंह,26 दिसंबर।बिहार के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में अगहन महीने के शुक्ल पक्ष द्वितीया को महिलाएं – लड़कियां दीवाल पर सेम की पत्ती, चावल एवं सिन्दूर से पिड़िया लेखन करती हैं। पारंपरिक रूप से हर साल पीढ़ी – दर – पीढ़ी औरतें इसे करती हैं। पिड़िया लेखन के साथ – साथ औरतें पिड़िया से संबंधित गीत भी गाती हैं। एक तरह से चित्र एवं गीत का समन्वय रूप है पिड़िया लेखन। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरा है। इसके साथ ही इसमें कई महिलाएं एक साथ मिलकर पिड़िया लेखन करतीं हैं एवं गीत गाती हैं अतएव यह सामूहिक कला है। सामूहिकता किसी भी कला के लिए काफी महत्वपूर्ण होती है।आज यह परंपरा कम होती जा रही है। यूं कहें तो यह परंपरा विलुप्त होने के कगार पर है। इसका रिवाज कम होता जा रहा है। ऐसे में बिहार के रोहतास जिले के डेढ़गांव गांव की विनिता कुमारी पिड़िया लेखन का पुनर्लेखन कर रही हैं। पिड़िया के इतिहास, वर्तमान स्थिति एवं पुनर्लेखन के शोध के लिए संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जूनियर फेलोशिप प्राप्त है। विनिता कुमारी निरंतर कई वर्षों से पिड़िया लेखन कर रही हैं।

कवन बहिनी लावेली गोबरवा काई रे पिड़िया
सोरहिया काई रे पिड़िया………..।
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लावे के त लवनी पिड़ियावा हो राम
छोड़ावही के बेर
कवन पापी भेजले नियारावा हो राम
छोड़ावही के बेर…………….।
इस तरह के अनेकों गीत विनिता कुमारी के मुख से मुखरित होते रहते हैं जब वे पिड़िया का चित्रण कर रही होती हैं। विनिता में यह खासियत है कि जब वे पिड़िया लेखन करती हैं तो अपनी परंपरा की तरह गीतों को भी गाती रहती हैं। गीतों के माध्यम से हम पिड़िया की महत्ता, उदेश्य, भाई की मंगलकामना, पारिवारिक सामाजिक स्थिति, गंगा माई से लगाव के साथ – साथ पिड़िया के इतिहास एवं वर्तमान स्थिति को समझ पाते हैं।

बिहार के रोहतास जिले दिनारा थाना के जगदीशपुर गांव में जन्मी विनिता कुमारी बचपन में अपनी मां सुशीला देवी से पिड़िया लेखन करना सीखी। मां पारंपरिक रूप से अगहन महीने में जब पिड़िया लेखन करतीं तो विनिता अपनी मां के साथ मिलकर पिड़िया पर ब्रश से रेखांकन करतीं, आकृति आदि बनाती। धीरे – धीरे विनिता स्वतंत्र रूप से पिड़िया लेखन करने लगी । अब कुछ वर्षों से विनिता पारंपरिक रूप से दीवार पर पिड़िया लेखन के साथ – साथ पेपर- कैनवस पर एक्रिलिक रंग से पिड़िया लेखन करती हैं जो काफी महत्वपूर्ण है।

विनिता कुमारी को पिड़िया लेखन करने के लिए विभिन्न जगहों से सम्मानित – पुरस्कृत किया जा चुका है।दिल्ली, आरा, राजगीर, सिवान , गुड़गांव आदि शहरों में इनकी पिड़िया – कलाकृतियों की प्रदर्शनी हो चुकी है।राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय, नई दिल्ली के बाहरी दीवार पर इन्होने बड़ी पिड़िया लेखन कलाकृति चित्रित की है जिसकी चर्चा काफी होती है। इसके साथ ही इन्होंने राजगीर, बिहार में एक विद्यालय की दीवार पर पिड़िया लेखन किया है। नई दिल्ली, गुरुग्राम, हरियाणा एवं सिवान, बिहार के अलावा विभिन्न जगहों पर होने वाली कला – शिविरों में इनकी भागीदारी हो चुकी है।
