
रांची/झारखंड (डॉ अजय ओझा, वरिष्ठ पत्रकार) 07 नवंबर।सूर्य उपासना का पर्व छठ अटूट आस्था का महापर्व है. नव प्रस्तर युग (8000-9000 ईसा पूर्व) में भी सूर्य उपासना के प्रमाण मिलते हैं. सूर्य की उपासना-आराधना ऋग्वैदिक काल से ही प्रचलित है. ऋग्वेद के एक सूक्त में सूर्य को सभी मनुष्यों का जनक, उनका प्रेरक और इच्छित फलदाता घोषित किया गया है — उद्वेति प्रसवीता जनानां महान् केतुरर्णव: सूर्यस्या। समस्त लोक को प्रकाशवान करने वाले सूर्य हैं. सूर्य शब्द की व्युत्पत्ति है- ‘‘सुवति प्रेरयति कर्मणि लोकम्’’ अर्थात जो समस्त लोक को कर्म में संलग्न करे वह सूर्य है. सूर्य के रूप के विषय में ऋग्वेद के समय से वर्णन प्राप्त होता है. जिसमें सूर्य को दिव्य सुपर्ण गरूत्मान कहा गया है. ऋग्वेद में सूर्य के प्राकृतिक स्वरूप की स्तुति दस सूक्तों में की गई है. सूर्य को जगत के समस्त जीवों की आत्मा कहा गया है. अथर्ववेद में सूर्य को अदिति का पुत्र बताया गया है. सूर्य को प्रकाश के देवता, बुराइयों से दूर रखने वाला समस्त देवताओं की आत्मा बताया गया है. कर्ण के मित्र दुर्योधन ने अपना अंग देश यानी आज के भागलपुर का राजा बनाया था. भागलपुर बिहार राज्य में आता है. अंग राज के राजा कर्ण के विषय में एक पौराणिक कथा है कि, ये पांडवों की माता कुन्ती और सूर्य देव की संतान हैं. कर्ण अपना आराध्य देव सूर्य भगवान को मानते थे. पूरी विधि-विधान के साथ कर्ण पानी में जाकर सूर्य भगवान की आराधना करते थे औपौराणिक कथाओं के अनुसार मान्यता है कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी और सप्तमी के दिन कर्ण सू्र्य देव की विशेष पूजा-अर्चना करते थे.
पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सूर्य की आकृति एक गोल चक्र के रूप में सैन्धव सभ्यता के समय में प्राप्त होती है. आहत सिक्कों तथा जनपद और गणराज्यों के सिक्कों पर भी चक्र आकार की आकृति प्राप्त होती है.
सूर्योपासना के विभिन्न रूप रहे हैं। प्राचीनकाल में ऋषि-महर्षि नदियों-सरोवरों के जल में पूर्व की ओर मुख कर सूर्य को जल का अर्घ्य अर्पित करते थे. कुछ लोग गायत्री-मंत्र, जो सूर्य से ही संबंधित है, का जाप कर उन्हें प्रसन्न करते. गायत्री-मंत्र में सूर्य को बुद्धि को प्रखर करने वाला और पाप का विनाशक माना कुष्ठ रोग से ग्रसित मयूर भट्ट ने सूर्य सूतक की रचना करके इस रोग से छुटकारा पाया. महाराज अश्वपति ने सूर्य की कृपा से सावित्री देवी को अपनी कन्या के रूप में प्राप्त किया. वाराह मिहिर में भी सूर्य पूजा के महत्व के बारे में वर्णन मिलता है. बिहार में अब तक खोजी गई सबसे पुरानी सूर्य की मूर्ति वैशाली जिले के चेचर में है और यह लगभग 1,500 साल पुराना है, गुप्त काल का है और इसे वहां एक मंदिर में रखा गया है. वास्तव में, सम्राट कुमारगुप्त ने कई सूर्य मंदिर बनाए.
🌞 लोकपर्व छठ
कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली मनाने के तुरंत बाद मनाए जाने वाले इस चार दिवसिय व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है.इसी कारण इस व्रत का नाम करण छठ व्रत हो गया. छठ पर्व षष्ठी तिथि का अपभ्रंश है।सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है. इस पर्व को वर्ष में दो बार मनाया जाता है. पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में. चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है. पारिवारिक सुख-स्मृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है।
🌞 छठ पर्व में सूर्य और छठी मैया की पूजा
छठ पूजा में सूर्य देव की पूजा की जाती है और उन्हें अर्घ्य दिया जाता है. सूर्य प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देने वाले देवता हैं, जो पृथ्वी पर सभी प्राणियों के जीवन का आधार हैं. सूर्य देव के साथ-साथ छठ पर छठी मैया की पूजा का भी विधान है.
सूर्य और छठी मैया का संबंध भाई बहन का है. मूलप्रकृति के छठे अंश से प्रकट होने के कारण इनका नाम षष्ठी पड़ा. वह कार्तिकेय की पालनकर्त्री माता भी हैं. षष्ठी देवी देवताओं की देवसेना भी कही जाती हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने की थी. वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो षष्ठी के दिन विशेष खगोलिय परिवर्तन होता है. तब सूर्य की पराबैगनी किरणें असामान्य रूप से एकत्र होती हैं और इनके कुप्रभावों से बचने के लिए सूर्य की ऊषा और प्रत्यूषा के रहते जल में खड़े रहकर छठ व्रत किया जाता है.
पौराणिक मान्यता के अनुसार छठी मैया या षष्ठी माता संतानों की रक्षा करती हैं और उन्हें दीर्घायु प्रदान करती हैं.
शास्त्रों में षष्ठी देवी को ब्रह्मा जी की मानस पुत्री भी कहा गया है। पुराणों में इन्हें माँ कात्यायनी भी कहा गया है, जिनकी पूजा नवरात्रि में षष्ठी तिथि पर होती है. षष्ठी देवी को ही बिहार-झारखंड में स्थानीय भाषा में छठ मैया कहा गया है.
🌞 छठ पर्व परंपरा
यह पर्व चार दिनों तक चलता है. भैया दूज के तीसरे दिन से यह आरंभ होता है. पहले दिन सैंधा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है.अगले दिन से उपवास आरंभ होता है. इस दिन रात में खीर बनती है. व्रतधारी रात में यह प्रसाद लेते हैं.तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं. अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं. इस पूजा में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है; लहसून, प्याज वर्ज्य है. जिन घरों में यह पूजा होती है, वहां भक्तिगीत गाए जाते हैं. आजकल कुछ नई रीतियां भी आरंभ हो गई हैं, जैसे पंडाल और सूर्य देवता की मूर्ति की स्थापना करना. घाटों पर भव्य पंडाल निर्माण और बिजली, बत्ती, झालर सजावट आदि पर काफी खर्च होता है और सुबह के अर्घ्य के उपरांत आयोजनकर्ता माईक पर चिल्लाकर प्रसाद मांगते हैं. पटाखे भी जलाए जाते हैं. कहीं-कहीं पर तो ऑर्केस्ट्रा का भी आयोजन होता है; परंतु साथ ही साथ दूध, फल, उदबत्ती भी बांटी जाती है. पूजा की तैयारी के लिए लोग मिलकर पूरे रास्ते की सफाई करते हैं.
🌞 छठ व्रत
छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है जो एक कठिन तपस्या की तरह है. यह प्रायः महिलाओं द्वारा किया जाता है किंतु कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं. व्रत रखने वाली महिला को परवैतिन भी कहा जाता है. चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है. भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है. पर्व के लिए बनाए गए कमरे में व्रती द्वारा फर्श पर एक कंबल या चादर के सहारे ही रात बिताई जाती है. इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं. पर व्रती ऐसे कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की होती है. महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं.‘शुरू करने के बाद छठ पर्व को सालोंसाल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला को इसके लिए तैयार न कर लिया जाए।.घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है.’ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है. पुत्र की चाहत रखने वाली और पुत्र की कुशलता के लिए सामान्य तौर पर महिलाएं यह व्रत रखती हैं.किंतु पुरुष भी यह व्रत पूरी निष्ठा से रखते हैं.
🌞 छठ पूजा विधि
छठ पूजा से पहले निम्न सामग्री जुटा लें और फिर सूर्य देव को विधि विधान से अर्घ्य दें ——
🌾बांस की 3 बड़ी टोकरी, बांस या पीतल के बने 3 सूप, थाली, दूध और ग्लास।
🌾 चावल, लाल सिंदूर, दीपक, नारियल, हल्दी, गन्ना, सुथनी, सब्जी और शकरकंदी।
🌾 नाशपती, बड़ा नींबू, शहद, पान, साबुत सुपारी, कैराव, कपूर, चंदन और मिठाई।
🌾 प्रसाद के रूप में ठेकुआ, मालपुआ, खीर-पुड़ी, सूजी का हलवा, चावल के बने लड्डू लें।
🌞 अर्घ्य देने की विधि —
बांस की टोकरी में उपरोक्त सामग्री रखें. सूर्य को अर्घ्य देते समय सारा प्रसाद सूप में रखें और सूप में ही दीपक जलाएँ. फिर नदी में उतरकर सूर्य देव को अर्घ्य दें. अर्घ्य संपादन में किसी पंडित, पुरोहित या ब्राम्हण की उपस्थिति की बाध्यता नहीं है. कोई बच्चा भी अर्घ्य दिलवा सकता है. इसी सरलता के कारण यह सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रचलित लोकपर्व है.
🌞 पहला दिन नहाय खाय
पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है. सबसे पहले घर की सफाइ कर उसे पवित्र बना लिया जाता है. इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं. घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं. भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है. यह दाल चने की होती है.
🌞 दूसरे दिन लोहंडा और खरना
दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं. इसे ‘खरना’ कहा जाता है. खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है. प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है. इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है. इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है.
🌞 तीसरे दिन संध्या अर्घ्य
तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है. प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं. इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है.
शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर छठी मइया का गीत गाते हुए चल पड़ते हैं. सभी छठव्रती नजदीकी तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं. सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है. इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है.
🌞 चौथा दिन उषा अर्घ्य
चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. व्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था. पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है. अंत में व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं.
🌞 छठ पूजा का पौराणिक महत्त्व
छठ पूजा की परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएँ प्रचलित हैं —
🌞 रामायण की मान्यता
एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की. सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था.
🌞 महाभारत की मान्यता
एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी.सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की. कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था. वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था. सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बना था. आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है.
कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है. वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं.
🌞 पुराणों की मान्यता
एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी. इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ. प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे. उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं. राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो. राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी.
🌞 छठ गीत
लोकपर्व छठ के विभिन्न अवसरों पर जैसे प्रसाद बनाते समय, खरना के समय, अर्घ्य देने के लिए जाते हुए, अर्घ्य दान के समय और घाट से घर लौटते समय अनेकों सुमधुर और भक्ति भाव से पूर्ण लोकगीत गाए जाते हैं —-
‘केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मे़ड़राय
काँच ही बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए’
सेविले चरन तोहार हे छठी मइया
महिमा तोहर अपार
उगु न सुरुज देव भइलो अरग के बेर
निंदिया के मातल सुरुज अँखियो न खोले हे
चार कोना के पोखरवा
हम करेली छठ बरतिया से उनके लागी
इस गीत में एक ऐसे ही तोते का जिक्र है जो केले के ऐसे ही एक गुच्छे के पास मंडरा रहा है। तोते को डराया जाता है कि अगर तुम इस पर चोंच मारोगे तो तुम्हारी शिकायत भगवान सूर्य से कर दी जाएगी जो तुम्हें माफ नही करेंगे. पर फिर भी तोता केले को जूठा कर देता है और सूर्य के कोप का भागी बनता है. पर उसकी भार्या सुगनी अब क्या करे बेचारी ? कैसे सहे इस वियोग को ? अब तो ना देव या सूर्य कोई उसकी सहायता नहीं कर सकते आखिर पूजा की पवित्रता जो नष्ट की है उसने —
केरवा जे फरेला घवद से ओह पर सुगा मेड़राय
उ जे खबरी जनइबो अदिक (सूरज) से सुगा देले जुठियाए
उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरछाय
उ जे सुगनी जे रोए ले वियोग से आदित होइ ना सहाय देव होइ ना सहाय
काँच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकति जाय… बहँगी लचकति जाय… बात जे पुछेलें बटोहिया बहँगी केकरा के जाय ? बहँगी केकरा के जाय ? तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया, बहँगी छठी माई के जाय… बहँगी छठी माई के जाय… काँच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकति जाय… बहँगी लचकति जाय… केरवा जे फरेला घवध से ओह पर सुगा मेंड़राय… ओह पर सुगा मेंड़राय… खबरि६ जनइबो अदित से सुगा देलें जूठियाय सुगा देलें जूठियाय… ऊ जे मरबो रे सुगवा धनुष से सुगा गिरे मुरझाय… सुगा गिरे मुरझाय… केरवा जे फरेला घवध से ओह पर सुगा मेंड़राय… ओह पर सुगा मेंड़राय… पटना के घाट पर नरियर नरियर किनबे जरूर… नरियर किनबो जरूर… हाजीपुर से केरवा मँगाई के अरघ देबे जरूर… अरघ देबे जरुर… आदित मनायेब छठ परबिया बर मँगबे जरूर… बर मँगबे जरूर… पटना के घाट पर नरियर नरियर किनबे जरूर… नरियर किनबो जरूर… पाँच पुतर अन धन लछमी, लछमी मँगबे जरूर… लछमी मँगबे जरूर… पान सुपारी कचवनिया छठ पूजबे जरूर… छठ पूजबे जरूर… हियरा के करबो रे कंचन वर मँगबे जरूर… वर मँगबे जरूर… पाँच पुतर अन धन लछमी, लछमी मँगबे जरूर… लछमी मँगबे जरूर… पुआ पकवान कचवनिया सूपवा भरबे जरूर… सूपवा भरबे जरूर… फर फूल भरबे दउरिया सेनूरा टिकबे जरूर… सेनूरा टिकबे जरुर… उहवें जे बाड़ी छठि मईया आदित रिझबे जरूर… आदित रिझबे जरूर… काँच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकति जाय… बहँगी लचकति जाय… बात जे पुछेलें बटोहिया बहँगी केकरा के जाय ? बहँगी केकरा के जाय ? तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया, बहँगी छठी माई के जाय… बहँगी छठी माई के जाय..
🌞 छठ पूजा अर्घ्य मन्त्र समय
ॐ सूर्य देवं नमस्ते स्तु गृहाणं करूणा करं |
अर्घ्यं च फ़लं संयुक्त गन्ध माल्याक्षतै युतम् ||
बालाधिष्ठातृदेव्यै च षष्ठीदेव्यै नमो नमः
कल्याणदायै कल्याण्यै फलदायै च कर्मणाम्।।
प्रत्यक्षायै स्वभक्तानां षष्ठ्यै देव्यै नमो नमः
पूज्यायै स्कन्दकान्तायै सर्वेषां सर्वकर्मसु।।
देवरक्षणकारिण्यै षष्ठीदेव्यै नमो नमः
शुद्धतत्त्वस्वरूपायै वन्दितायै नृणां सदा।।
( श्रीमद्देवीभागवत,९/४६/६२-६४)
अर्थ:-
बालकों की अधिष्ठात्री देवी को नमस्कार है। षष्ठी देवी को बार-बार नमस्कार है। कल्याण प्रदान करने वाली, कल्याणस्वरूपिणी, सभी कर्मों के फल प्रदान करने वाली तथा अपने भक्तों को प्रत्यक्ष दर्शन देने वाली षष्ठी को बार-बार नमस्कार है। सम्पूर्ण कार्यों में सभी के लिए पूजनीय तथा देवताओं की रक्षा करने वाली स्वामी कार्तिकेय की भार्या देवी षष्ठी को बार-बार नमस्कार है। शुद्धसत्वस्वरूपिणी, मनुष्यों के लिए सदा ही वन्दनीय तथा क्रोध -हिंसा से रहित षष्ठी देवी को बार-बार नमस्कार है।’
आप सभी को लोक आस्था का महान लोकपर्व छठ की अनंत शुभकामनाएं और बधाई !

