
रांची/ झारखंड ( डॉ अजय ओझा, वरिष्ठ पत्रकार) 29 अक्टूबर।भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से एक भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य दिवस (कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी) को
धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। इन्हें आयुर्वेद का जन्मदाता माना जाता है। 2016 में आयुष मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा धन्वंतरि जयंती को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस घोषित किया गया। देवासुर संग्राम के समय जब जीवनदायी अमृत की आवश्यकता पड़ी तो इसकी प्राप्ति हेतु समुद्र मंथन किया गया। समुद्र मंथन से 13वें रत्न के रूप में भगवान धन्वंतरि एवं 14वें रत्न के रूप में उनके हाथ में अमृत कलश प्रकट हुआ। अमृत अमरत्व प्रदान करने वाला रसायन था। भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत कलश के साथ प्रकट हुए थे इसी कारण धनतेरस पर बर्तन खरीदने की परंपरा है।
काशी के संस्थापक ‘काश’ के प्रपौत्र, काशिराज ‘धन्व’ के पुत्र, धन्वंतरि आयुर्वेद के महान चिकित्सक थे जिन्हें देव पद भी प्राप्त हुआ।
भगवान धन्वंतरि ने अमृतमय औषधियों की खोज की। इनके वंश में दिवोदास हुए जिन्होंने ‘शल्य चिकित्सा’ का विश्व का पहला विद्यालय काशी में स्थापित किया जिसके प्रधानाचार्य, दिवोदास के शिष्य और ॠषि विश्वामित्र के पुत्र ‘सुश्रुत संहिता’ के प्रणेता, आचार्य सुश्रुत विश्व के पहले सर्जन (शल्य चिकित्सक) थे। काशी और देश भर में दीपावली के अवसर पर कार्तिक त्रयोदशी-धनतेरस को भगवान धन्वंतरि की पूजा करते हैं…
सत्यं च येन निरतं रोगं विधूतं,अन्वेषित च सविधिंआरोग्यमस्य।
गूढं निगूढं औषध्यरूपम्,धन्वन्तरिं च सततं प्रणमामि नित्यं।।
जिन्होंने निरंतर समस्त रोग दूर किये, जिन्होंने अच्छे आरोग्य की विधि बताई, जिन्होंने औषधियों के छुपे रहस्य को बताया उन धन्वंतरि भगवान को हम सदैव प्रणाम करते है।।
आरोग्य के धन्वंतरि
धनतेरस दीपावली की दस्तक है। हम प्राय: धनतेरस की चौखट पर खड़े होकर दीपावली की तरफ देखते हैं, धनतेरस स्वास्थ्य और समृद्धि के बीच जागरूकता का भी पर्व है। धनतेरस लक्ष्मीपूजा और नए बरतन खरीदने के कर्मकांड के साथ ही आयुर्वेद के प्रणेता व वैद्यकशास्त्र के देवता भगवान धन्वंतरि का जन्मदिन भी है। धन्वंतरि की गिनती भारतीय चिकित्सा पद्धति के जन्मदाताओं में होती है। वेदों में इनका उल्लेख है। पुराणों में इन्हें विष्णु का अवतार कहा गया है। समुद्रमंथन में जो चौदह रत्न निकले, उनमें एक धन्वंतरी भी थे। वे काशीराज धन्य के पुत्र थे, इसलिए ‘धन्वंतरि’ कहलाए।
धन्वंतरि आरोग्य, सेहत, आयु और तेज के आराध्य देव हैं। पौराणिक व धार्मिक मान्यतानुसार भगवान् विष्णु के अवतार समझे जाने वाले धन्वंतरि का पृथ्वी पर अवतरण समुद्र मंथन से हुआ। शरद पूर्णिमा को चंद्रमा, कार्तिक द्वादशी को कामधेनु , त्रयोदशी को धन्वंतरि, चतुर्दशी को काली माता और अमावस्या को भगवती लक्ष्मी समुद्र मंथन से निकले। धन्वंतरि ने इसी दिन आयुर्वेद का भी प्रादुर्भाव किया। इनके ही वंश में दिवोदास हुए, जिन्होंने दुनिया में शल्य चिकित्सा का पहला विद्यालय काशी में स्थापित किया। इसके प्रधानाचार्य सुश्रुत नियुक्त हुए । सुश्रुत दिवोदास के शिष्य और ऋषि विश्वामित्र के पुत्र थे, जिन्होंने ‘सुश्रुत संहिता’ लिखी। सुश्रुत विश्व के पहले शल्य चिकित्सक, यानी सर्जन थे। कहा जाता है कि शंकर ने विषपान किया। धन्वंतरि ने अमृत प्रदान किया और इस तरह काशी कालजयी शहर बना।
धन्वंतरि समुद्र मंथन में मिले कलश के अंड से निकले थे। समुद्र से निकलते ही उन्होंने भगवान् विष्णु से कहा कि लोक में मेरा स्थान और हिस्सा निश्चित कर दें। इस पर विष्णु ने कहा कि यज्ञ का विभाग तो देवताओं में पहले ही तय हो चुका है, इसलिए अब यह संभव नहीं है। देवों के बाद आने के कारण तुम ईश्वर नहीं हो सकते।इसलिए अब तुम्हें अगले जन्म में सिद्धियां प्राप्त होंगी और तुम लोक में प्रसिद्ध होगे। तुम्हें उसी शरीर से देवत्व प्राप्त होगा और लोग तुम्हारी पूजा करेंगे। तुम आयुर्वेद का अष्टांग विभाजन भी करोगे। द्वापर युग में तुम फिर से जन्म लोगे। इस वरदान के मुताबिक़ काशिराज ‘धन्व’ की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उनके पुत्र के रूप में जन्म लिया और ‘धन्वंतरि’ कहलाए । ‘धन्व’ काशी के संस्थापक काश के पुत्र थे। वे सभी रोगों के निवारण में निष्णात थे। उन्होंने महर्षि भारद्वाज से आयुर्वेद ग्रहण कर उसे अष्टांग में विभक्त कर अपने शिष्यों में बांट दिया था। यह उनकी वंश परम्परा थी काश-दीर्घतपा-धन्व-धन्वंतरि-केतुमान्-भीमरथ(भीमसेन)-दिवोदास-प्रतर्दन-वत्स-अलर्क।(हरिवंशपुराण,पर्व-1, अध्याय-29)।
वैदिक काल में जो स्थान अश्विनी को प्राप्त था, वही पौराणिक काल में धन्वंतरि को मिला। जहां अश्विनी के हाथ में मधुकलश था, वहां धन्वंतरि को अमृतकलश मिला, क्योंकि विष्णु संसार की रक्षा करते हैं, इसलिए रोगों से रक्षा करने वाले धन्वंतरि को विष्णु का अंश माना गया।
‘श्रीमद्भागवत कहता है समुद्र-मंथन से मिलने वाले 14 रत्नों में से एक भगवान् धन्वंतरि थे। उनका शरीर बादलों की कांति की तरह चमक रहा था। उनके नेत्र कमल के समान थे। उनकी गरदन कंबू जैसी थी। उनका वक्ष विशाल था। उनके हाथ लंबे थे, जिनकी पहुंच जानुतक थी। वे चिर युवा की तरह थे। शरीर पर पीतांबर धारण किए हुए थे। उनके कानों में मगर जैसी विलक्षण आकृति के कुंडल थे। चतुर्भुज धारी धन्वंतरि के एक हाथ में आयुर्वेद शास्त्र, एक में वनस्पति, एक में शंख और एक हाथ में जीवनदायी पेय अमृत था। वे कई तरह के रत्न, आभूषण और विभिन्न जड़ी-बूटियों से बनी हुई मालाएं पहने किए हुए थे।
ऋग्वेद के बाद अथर्ववेद में भी जडी बूटियों की उपयोगिताओं के वर्णन हैं। भेशजों के सुनिश्चित गुणों और उपयोगों का उल्लेख कुछ अधिक विस्तार से आयुर्वेद में हुआ है। यही आयुर्वेद भारतीय चिकित्सा विज्ञान की आधारशिला है। इसे उपवेद भी कहते है। इसके आर्युविज्ञान और चिकित्सा के विभिन्न पक्षों पर विचार किया गया है। इसका रचनाकाल पाश्चात्य विद्वानों ने ईसा से ढाई से तीन हजार साल पुराना माना है। इसके आठ अध्याय हैं, इसलिए इसे ‘अष्टांग आयुर्वेद‘ भी कहा गया है। आयुर्वेद की रचना के बाद पुराणों में सुश्रुत और चरक ऋषियों व उनके द्वारा रचित संहिताओं का उल्लेख है। ईसा से करीब डेढ़ हजार साल पहले लिखी गई सुश्रुत संहिता में शल्य-विज्ञान का विस्तृत विवरण है। इसी काल में चरक संहिता का प्रादुर्भाव माना जाता है।
इसके बाद जो रही-सही ज्ञान परंपराएं थीं, उन पर बड़े ही सुनियोजित ढंग से पानी फेरने का काम व्यापार के बहाने भारत आए अंग्रेजों ने पूरा कर दिया। डॉ.धर्मपाल की किताब ‘इंडियन साइंस एंड टेक्नोलॉजी‘ में लिखा है कि 1731 में बंगाल में डॉ.ओलिवर काउल्ट नियुक्त थे। काउल्ट ने लिखा है कि भारत में रोगियों को टीका देने का चलन था। बंगाल के वैद्य एक बड़ी पैनी व नुकीली सुई से चेचक के घाव की पीब लेकर उसे टीके की जरूरत वाले रोगी के शरीर में कई बार चुभो देते थे। इस उपचार पद्धति को संपन्न करने के बाद वे उबले चावल की लेई सी बनाकर रोगी के घाव पर चिपका देते थे। इसके तीसरे या चौथे दिन रोगी को बुखार आता था। इसलिए वे रोगी को यथा संभव सबसे ठंडी जगह रखते थे और उसे बार-बार ठंडे पानी से नहलाते थे, जिससे शरीर का ताप नियंत्रित रहे। डॉ.काउल्ट ने लिखा है कि टीका लगाने की विधि उनके भारत आने के भी ड़ेढ़ सौ साल पहले से चलन में थी। यह काम ज्यादातर ब्राह्मण करते थे और साल के निश्चित महीनों वे इसे अपना उत्तरदायित्व मानते हुए घर-घर जाकर रोगी ढूंढते थे। डॉ.ओलिवर लिखते हैं कि इस चिकित्सा प्रणाली के अध्ययन व अनुभव के बाद वे इस विधि की गुणवत्ता व श्रेष्ठता के प्रशंसक हो गए। उन्होंने कहा कि जो लोग उपचार की इस विधि को नहीं अपना रहे हैं, तो वे उन रोगियों के साथ अन्याय कर रहे हैं, जिनकी जान बचाई जा सकती है। लेकिन जब अंग्रेज़ों ने भारत में ऐलोपैथी चिकित्सा थोपने की शुरूआत की तो षड्यंत्र पूर्वक एक-एक कर सभी प्रणालियों को नष्ट करने का जैसे अभियान ही चला दिया गया।
धन और तेरस शब्दों के बारे में मान्यता है कि इस दिन खरीदे गए धन (स्वर्ण, रजत) में 13 गुना बढ़ोतरी होती है। प्राचीन काल से ही इस दिन चांदी खरीदने की परंपरा रही है। चांदी चंद्रमा का प्रतीक है और चंद्रमा धन व मन दोनों का स्वामी है। चंद्रमा शीतलता का प्रतीक भी है और संतुष्टि का भी। शायद इसके पीछे की सोच यह है कि संतुष्टि का अनुभव ही सबसे बड़ा धन है। जो संतुष्ट है, वही धनी भी है और सुखी भी। धन का भोग करने के लिए लक्ष्मी की कृपा के साथ ही उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की भी जरूरत होती है। यही अवधारणा धन्वन्तरि के वजूद की बुनियाद बनती है।
धनतेरस में धन शब्द को धन-संपत्ति और धन्वंतरि दोनों से ही जोड़कर देखा जाता है। धन्वंतरि के चांदी के कलश व शंख के साथ प्रकट होने के कारण इस दिन शंख के साथ पूजन सामग्री और लक्ष्मी गणेश की प्रतिमा के साथ चांदी के पात्र या बर्तन खरीदने की परंपरा आरंभ हुई। तंत्र शास्त्र में इस दिन लक्ष्मी, गणपति, विष्णु व धन्वंतरि के साथ कुबेर की साधना की जाती है।
सुश्रुत के अनुसार ब्रह्मा ने पहली बार एक लाख श्लोक वाले आयुर्वेद का प्रकाशन किया, जिसमें एक सहस्र अध्याय थे। उनसे प्रजापति ने पढ़ा। फिर उनसे अश्विनी कुमारों ने पढ़ा और उनसे इंद्र ने पढ़ा। इंद्रदेव से धन्वंतरि ने पढ़ा और उन्हें सुनकर सुश्रुत ने आयुर्वेद की रचना की। ‘भाव प्रकाश’ के अनुसार आत्रेय ने इंद्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त कर उसे अग्निवेश तथा अन्य शिष्यों को दिया था। और अब हम आयुर्वेद की ओर फिर लौट रहे हैं।
देवताओं के प्रधान चिकित्सक भगवान धनवंतरि के जन्मोत्सव के रूप में यह पर्व मनाया जाता है। धनतेरस के दिन सोने, चांदी के आभूषण और धातु के बर्तन खरीदने की परंपरा है। शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि इससे घर में सुख समृद्धि बनी रहती है,संपन्नता आती है और माता महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।
धनतेरस पर क्या खरीदें
श्रीगणेश और लक्ष्मी की चांदी या मिट्टी की मूर्तियां। मूर्ति की जगह चांदी का सिक्का भी खरीद सकते हैं जिस पर गणेश-लक्ष्मी चित्रित हों। इन पर केसर का तिलक करके पूजन करें और लाल या पीले कपड़े पर रख दें। दीपावली पूजन में भी इन सिक्कों या मूर्तियों का पूजन करें और फिर इन्हें अपनी तिजोरी में रख दें।
भगवान धन्वंतरि के अवतरण दिवस, धनत्रयोदशी (धनतेरस) की आप सभी प्रिय जनों को अनन्य शुभ और मंगलकामनायें ! आप सभी के जीवन में आरोग्य, ऐश्वर्य, सुखः शांति समृद्धि बनी रहे !
