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शरद पूर्णिमा की महिमा का बखान संत तुलसीदास ने रामचरितमानस में अत्युत्तम बताया है।

रांची/झारखंड (डॉ अजय ओझा,वरिष्ठ पत्रकार) 16 अक्टूबर।पूरे विश्व में भारत ही एकमात्र ऐसा राष्ट्र है , जहां छह ऋतुएं होती हैं – बसंत , ग्रीष्म , वर्षा , शरद , हेमंत एवं शिशिर ऋतु। दुनिया में साधारणत: चार मौसम ही पाए जाते हैं – ग्रीष्म ,वर्षा , शीत एवं बसन्त।
आश्विन मास की पूर्णिमा ही एकमात्र ऐसी पूर्णिमा है, जो ऋतु के नाम पर जानी जाती है । यह शरद ऋतु के अंतर्गत आता है , इसलिए आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं।

श्री रामचरितमानस के किष्किंधाकांड में तुलसीदास जी ने शरद ऋतु का बड़ा ही मनोरम वर्णन किया है। प्रभु श्री राम लक्ष्मण जी को कहते हैं –

बरसा बिगत सरद ऋतु आई।
लछिमन देखहु परम सुहाई ।।

हे लक्ष्मण ! देखो वर्षा बीत गई और परम सुंदर शरद ऋतु आ गई।

कहुं कहुं बृष्टि सारदी थोरी ।
कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी ।।

कहीं-कहीं ( विरले ही स्थानों में ) शरद ऋतु की थोड़ी-थोड़ी वर्षा होती है , जैसे कोई विरले ही मेरी भक्ति पाते हैं।

सारदातप निसि ससि अपहरई।
संत दरस जिमि पातक टरई।।

शरद ऋतु के ताप को रात के समय चंद्रमा हर लेता है , जैसे संतों के दर्शन से पाप दूर हो जाते हैं।

देखि इंदु चकोर समुदाई ।
चितवहिं जिमि हरिजन हरि पाई ।।

चकोरों के समुदाय चंद्रमा को देखकर इस प्रकार टकटकी लगाए हैं , जैसे भगवत-भक्त भगवान को पाकर उनके दर्शन करते हैं।
प्रकृति – वर्णन में भी संत तुलसीदास जी को अध्यात्म – दर्शन हो रहा है। दृष्टिकोण में अंतर , चित्त की अवस्था के अंतर को प्रकट कर देता है। इस दृष्टि के कारण ही हम हिंदू कंकर को शंकर बनाने में समर्थ हो सके।
शरद ऋतु का शुक्ल – पक्ष दैवी शक्ति के स्फुरणका पर्व रहा है। और इस शरद – पूर्णिमा की तो बात ही निराली है।

*आइए शरद पूर्णिमा की विशेषताओं पर दृष्टि डालें*

१.केवल शरद पूर्णिमा में ही चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं के साथ परिपूर्णता में प्रकट होता है।

२.पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा को ही समुद्र – मंथन से भगवती लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई थी । इसी तिथि को मां लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करने आती हैं। अतः लोग लक्ष्मी की आराधना करते हैं।

३.जिन्होंने प्रभु श्रीराम एवं उनके मर्यादापूर्ण जीवन एवं आदर्शों से संपूर्ण विश्व को परिचय कराया था , उन महान विभूति महर्षि वाल्मीकि का इसी तिथि को अवतरण हुआ था। इन्होंने केवल श्रीराम की जीवनी ही नहीं लिखी थी वरन् इन्होंने श्रीराम की पत्नी एवं उनके नवजात शिशुओं को भी अपने आश्रम में आश्रय दिया था। ये आदि कवि के साथ – साथ विश्व के प्रथम महाकाव्य भी हैं।

४. द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण ने शरद पूर्णिमा को ही महा रास-लीला की थी। गोपियों ने पति (स्वामी) के रूप में श्रीकृष्ण की आराधना की थी। अतः भगवान ने उनका भाव पूर्ण करने के लिए अपने को असंख्य रूपों में प्रकट करके गोपियों के साथ क्रीड़ा की थी। वास्तव में सच्चितानंदघन सर्वांतर्यामी प्रेमरस-स्वरूप , लीलारसमय परमात्मा भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी ह्लादिनी शक्तिरूपा आनंद-चिन्मय रस प्रतिभाविता अपनी ही प्रतिमूर्ति से उत्पन्न अपनी प्रतिबिंब-स्वरूपा गोपियों से आत्म-क्रीड़ा की थी।

शरद पूर्णिमा के व्रत को कोजागार व्रत भी कहते हैं क्योंकि लक्ष्मी जी को जागृति करने के कारण इस व्रत का नाम कोजागार पड़ा इस दिन लक्ष्मी नारायण महालक्ष्मी एवं तुलसी का पूजन किया जाता है।
इस दिन श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया था। साथ ही माना जाता है कि इस दिन मां लक्ष्मी रात के समय भ्रमण में निकलती है यह जानने के लिए कि कौन जाग रहा है और कौन सो रहा है। उसी के अनुसार मां लक्ष्मी उनके घर पर ठहरती है। इसीलिए इस दिन सभी लोग जागते है । जिससे कि मां की कृपा उनपर बरसे और उनके घर से कभी भी लक्ष्मी न जाएं।
इसलिए इसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहते हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा ही शरद पूर्णिमा पर्व मनाया जाता है। ज्‍योतिष के अनुसार,ऐसा कई वर्षों में पहली बार हो रहा है जब शरद पूर्णिमा और गुरुवार का संयोग बना है। इस दिन पूरा चंद्रमा दिखाई देने के कारण इसे महापूर्णिमा भी कहते हैं।
पूरे साल में केवल इसी दिन चन्द्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। हिन्दी धर्म में इस दिन कोजागर व्रत माना गया है। इसी को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। मान्यता है इस रात्रि को चन्द्रमा की किरणों से अमृत झड़ता है। तभी इस दिन उत्तर भारत में खीर बनाकर रात भर चाँदनी में रखने का विधान है।

*शरद पूर्णिमा विधान*

इस दिन मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करके उपवास रखे और ब्रह्मचर्य भाव से रहे। इस दिन ताँबे अथवा मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित करके भिन्न-भिन्न उपचारों से उनकी पूजा करें, तदनंतर सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए 100 दीपक जलाए। इसके बाद घी मिश्रित खीर तैयार करे और बहुत-से पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखें। जब एक प्रहर (3 घंटे) बीत जाएँ, तब लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण करें। तत्पश्चात भक्तिपूर्वक सात्विक ब्राह्मणों को इस प्रसाद रूपी खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण करें। तदनंतर अरुणोदय काल में स्नान करके लक्ष्मीजी की वह स्वर्णमयी प्रतिमा आचार्य को अर्पित करें। इस रात्रि की मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने कर-कमलों में वर और अभय लिए संसार में विचरती हैं और मन ही मन संकल्प करती हैं कि इस समय भूतल पर कौन जाग रहा है? जागकर मेरी पूजा में लगे हुए उस मनुष्य को मैं आज धन दूँगी।

*शरद पूर्णिमा पर खीर खाने का महत्व*

शरद पूर्णिमा की रात का अगर मनोवैज्ञानिक पक्ष देखा जाए तो यही वह समय होता है जब मौसम में परिवर्तन की शुरूआत होती है और शीत ऋतु का आगमन होता है। शरद पूर्णिमा की रात में खीर का सेवन करना इस बात का प्रतीक है कि शीत ऋतु में हमें गर्म पदार्थों का सेवन करना चाहिए क्योंकि इसी से हमें जीवनदायिनी ऊर्जा प्राप्त होगी।

*शरद पूर्णिमा व्रत कथा*

एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी। दोनो पुत्रियाँ पुर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा ही मर जाती थी। उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पुरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती है।
उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया। उसने लडके को पीढे पर लिटाकर ऊपर से पकडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पीढा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा। बडी बहन बोली-” तु मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता।“ तब छोटी बहन बोली, ” यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। “उसके बाद नगर में उसने पुर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।
इस प्रकार प्रतिवर्ष किया जाने वाला यह कोजागर व्रत लक्ष्मीजी को संतुष्ट करने वाला है। इससे प्रसन्न हुईं माँ लक्ष्मी इस लोक में तो समृद्धि देती ही हैं और शरीर का अंत होने पर परलोक में भी सद्गति प्रदान करती हैं।

*शरद पूर्णिमा की रात को क्या करें, क्या न करें*

दशहरे से शरद पूनम तक चन्द्रमा की चाँदनी में विशेष हितकारी रस, हितकारी किरणें होती हैं । इन दिनों चन्द्रमा की चाँदनी का लाभ उठाना, जिससे वर्षभर आप स्वस्थ और प्रसन्न रहें । नेत्रज्योति बढ़ाने के लिए दशहरे से शरद पूर्णिमा तक प्रतिदिन रात्रि में 15 से 20 मिनट तक चन्द्रमा के ऊपर त्राटक करना चाहिए।
अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य हैं। जो भी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयी हों, उनको पुष्ट करने के लिए चन्द्रमा की चाँदनी में खीर रखना और भगवान को भोग लगाकर अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करना कि ‘हमारी इन्द्रियों का बल-ओज बढ़ायें ।’ फिर वह खीर खा लेना चाहिए।
इस रात सूई में धागा पिरोने का अभ्यास करने से नेत्रज्योति बढ़ती है ।

*शरद पूनम दमे की बीमारी वालों के लिए वरदान का दिन है*

चन्द्रमा की चाँदनी गर्भवती महिला की नाभि पर पड़े तो गर्भ पुष्ट होता है। शरद पूनम की चाँदनी का अपना महत्त्व है लेकिन बारहों महीने चन्द्रमा की चाँदनी गर्भ को और औषधियों को पुष्ट करती है।
अमावस्या और पूर्णिमा को चन्द्रमा के विशेष प्रभाव से समुद्र में ज्वार-भाटा आता है। जब चन्द्रमा इतने बड़े दिगम्बर समुद्र में उथल-पुथल कर विशेष कम्पायमान कर देता है तो हमारे शरीर में जो जलीय अंश है, सप्तधातुएँ हैं, सप्त रंग हैं, उन पर भी चन्द्रमा का प्रभाव पड़ता है । इन दिनों में अगर काम-विकार भोगा तो विकलांग संतान अथवा जानलेवा बीमारी हो जाती है और यदि उपवास, व्रत तथा सत्संग किया तो तन तंदुरुस्त, मन प्रसन्न और बुद्धि में बुद्धिदाता का प्रकाश आता है।
धार्मिक दृष्टि से शरद पूर्णिमा के दिन का बहुत महत्व है। यह दिन स्वास्थ्य, धन, संपदा, शुभ कार्य, धार्मिक भावना सहित अन्य रूप से शुभ दिवस होता है। इसी दिन को कोजागरी पूर्णिमा और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
कहा जाता है आश्विन शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली इस पूर्णिमा के दिन अमृत की वर्षा होती है। इस दिन चंद्रमा हल्‍के नीले रंग का दिखाई देता है। इस दिन रात को खीर बनाकर चंद्रमा को खीर में देखा जाता है मतलब खीर को हल्के सूती वस्त्र से ढककर खुले आसमान में रख दें और फिर उसका सुबह में सेवन किया जाता है। इसका सेवन करने से कई प्रकार के रोगों से निजात मिलती है या रोगों का असर कम होता है।
विद्वानों की मानें तो इस दिन चंद्रमा 16 कलाओं का होता है और इससे निकलने वाली किरणें अमृत समान मानी जाती है। इसीलिए खीर में चंद्रमा की किरणें पड़ने से यह कई गुना लाभकारी हो जाती है। अत: दूध या खीर को चंद्रमा के प्रकाश में रखकर इसका सेवन किया जाता है।
इस संबंध में यह भी माना जाता है कि किसी दिव्य औषधि को खीर में मिलाकर शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणों में रखने से उसके औषधीय गुण तो कई गुना बढ़ ही जाते हैं, इसके अलावा दूध में भरपूर मात्रा में पाया जाने वाला लैक्टिक एसिड, चांद की किरणों से मिलने वाला अमृत तत्व तथा चावलों में पाए जाने वाला स्टार्च के कारण यह खीर शरीर के लिए काफी फायदेमंद होती है।

चांदी के बर्तन में रोग – प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। अत: यदि खीर को चांदी के बर्तन में भरकर शरद पूर्णिमा की रात बाहर खुले आसमान में रखा जाए तो वो और भी अधिक लाभदायी होती है।
पात्र के रूप में कोई चांदी के सिक्के, चममच कटोरी ले सकते हैं
दूध देशी गौ माता से प्रसन्नता पूर्वक लिया गया हो

*शरद पूर्णिमा पर सेहत के लाभ*

1. दमा – दमा रोग से पीड़ित मरीजों को शरद पूनम की खीर का सेवन जरूर करना चाहिए। इस खीर को चांद की रोशनी में रखकर सुबह 4 बजे इसका सेवन करने की सलाह दी जाती है। सालभर में शरद पूनम का दिन दमा रोगियों के लिए अमृत के समान माना जाता है।

2. आंखों की रोशनी – शरद पूनम के रात्रि खीर का सेवन तो किया ही जाता है साथ ही चांद की रोशनी में 100 बार सुई में धागा पिरोने की परंपरा भी है। कहा जाता है ऐसा करने से आंखों की रोशनी तेज होती है। इस दिन खीर का सेवन करने से आंखों से संबंधित परेशानी दूर होती है। चंद्रमा को एकटक देखने पर आंखों की रोशनी बढ़ती है।

3. स्किन समस्या – शरद पूनम की रात को चंद्रमा घुली हुई खीर खाने से चर्म रोग में आराम मिलता है। स्किन समस्या से जूझ रहे हैं तो इस दूध का सेवन करें। स्किन केयर के साथ त्वचा का ग्लो भी बढ़ जाता है।

4. दिल का रखें ख्‍याल – हृदय रोगियों के लिए भी यह खीर का सेवन करना फायदेमंद होता है। इस दिन खासकर चांदी के बर्तन में खीर या दूध रखना चाहिए। जिससे रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है और विषाणु भी दूर होते हैं। साथ ही उक्त रक्तचाप में भी आराम मिलता है।

5. मलेरिया – इन दिनों मौसम ठंडा-गरम होने पर मच्‍छरों का प्रकोप भी बढ़ जाता है, जिससे मलेरिया का खतरा होता है। हालांकि बैक्टीरिया उपयुक्त वातावरण में पनपते हैं। लेकिन बैक्टीरिया जब पित्त के संपर्क में आते हैं तो वह धीरे-धीरे पूरे शरीर में फैलने लगता है। पित्त को नियंत्रित करना जरूरी होता है जिससे मलेरिया की चपेट में आने से बच सकते हैं। इसलिए इस मौसम में खीर को खाने की परंपरा है।

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