
आरा/भोजपुर ( डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)11 अक्टूबर।शारदीय नवरात्रोपासना के अवसर पर श्रीसनातन शक्तिपीठ संस्थानम् तथा सनातन-सुरसरि सेवा न्यास द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय प्रवचन-सत्र का उद्घाटन करते हुए आचार्य डॉ भारतभूषण जी महाराज ने कहा कि संपूर्ण विश्व की आधार शक्ति हैं जगदंबा।वे विश्व का बीज तथा परम माया हैं जिनके द्वारा विश्व उद्भासित तथा संचालित होता है। आचार्य ने कहा कि सर्वप्रथम संसार के विस्तार की भावना से भावित भगवान् श्रीविष्णु के नाभिकमल पर लोकपितामह ब्रह्मा जी प्रकट हुए।उस समय भगवान श्रीविष्णु के कानों की मैल से सहसा दो असुर उत्पन्न हो गये जिन्हें मधु और कैटभ कहा जाता है।इन दोनों असुरों ने सृष्टि संवर्धन में लगे ब्रह्मा जी पर आक्रमण कर दिया। भगवान् श्रीविष्णु योगमाया का आश्रय लेकर विश्राम कर रहे थे तब श्रीब्रह्माजी ने रात्रिसूक्त के द्वारा योगमाया महाकाली की स्तुति की। महाकाली ने भगवान विष्णु को जगाया तथा मधु कैटभ असुरों को व्यामोहित कर भगवान विष्णु के द्वारा नष्ट कराया। इसके बाद सृष्टि कार्य निर्बाध रूप से आगे बढ़ा। आचार्य ने कहा कि कानों से निन्दा-प्रशंसा सुनकर तदनुसार मधु और कटु भावनाओं की निर्मिति ही हमारी सृजनशीलता को बाधित करने वाले मधु कैटभ राक्षस हैं।शरीर विज्ञान के अनुसार आज यही मधुमेह और तनाव (हाइपरटेंशन) नामक जानलेवा रोग हैं। जगदंबा की उपासना इन विकृतियों पर विजय दिलाती है। आचार्य ने कहा कि सृष्टि के मध्य में महिषासुर का उपद्रव बढ़ गया जिसने समस्त देवताओं को स्थानच्युत कर दिया और स्वयं शासन करने लगा। देवता हमारे जीवन के आधार हैं। यदि अग्नि,वायु, सूर्य, चंद्र, वरूण अर्थात् जल, पृथ्वी आदि की स्वाभाविक गति बाधित तथा किसी असुर-अराजक द्वारा शासित हो जाय तो संसार की क्या स्थिति होगी यह कल्पना की जा सकती है।पूरा क्रम उलट गया और लोगों का जीना दुश्वार हो गया।ऐसी स्थिति में सभी देवताओं ने अपने प्रमुख अंश अथवा शक्ति को निकाल कर जगदंबा को प्रकट किया। अपने प्रमुख साधन, उपकरण,आयुध, वाहन आदि समस्त वस्तुएं उन्हें समर्पित की और उन दुर्गा देवी के द्वारा महिषासुर का दल-बल के साथ विनाश हुआ और त्रिलोकी की रक्षा हुई। इसके बाद संसार में शुंभ निशुंभ नामक दैत्य प्रकट हुए जिनके धूम्रलोचन, चंड मुंड, रक्तबीज आदि सहयोगियों के साथ मां ने भयंकर युद्ध कर अन्ततः शुंभ निशुंभ का समापन कर दिया तथा देवताओं को वरदान दिया कि संसार में जब-जब इस प्रकार की उपद्रवी स्थितियां उत्पन्न होंगी तब-तब मैं अवतार लेकर इन देशविरोधी-लोकविरोधी शक्तियों का विनाश और दैवी शक्तियों का संपोषण करूंगी। आचार्य ने कहा कि कई कल्पों में इस प्रकार के युद्ध मां ने किये हैं। इसमें दक्षिण-उत्तर समग्र भारत में इसके चिह्न विद्यमान हैं। हमारे क्षेत्र में विंध्य पर्वतमाला में मां ने जहां चंड का उद्धार किया उसे आज ताराचंडी (सासाराम में) तथा जहां मुंड का उद्धार किया उसे मुंडेश्वरी (कैमूर में) जैसे शक्तिपीठों के रूप में जाना जाता है।
आचार्य ने कहा कि समग्र आर्यावर्त में इक्यावन शक्तिपीठ और एक सौ आठ उप शक्तिपीठ हैं जो श्रद्धा और उपासना के केंद्र तथा हमारी चेतना के जागरण के दिव्य स्थल हैं। आरा में अरण्येश्वरी अधिष्ठात्री देवी हैं जिन्हें आरण्य देवी के नाम से जाना जाता है। काशी से शोणभद्र तक के इस महान वन (अरण्य) में सिद्धाश्रम में भगवान श्रीराम लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करने के बाद उनके मुनि मंडल के साथ शोणभद्र और गंगा के संगम को पार करते हैं। यहां उन्होंने शिव और शक्ति की पूजा की है जो अरण्येश्वरी वनदेवी और सिद्धनाथ महादेव हो सकते हैं।इसी प्रकार महाभारत काल में आरा को एकचक्रा पुरी कहा गया है जहां पंच पाण्डव अपनी माता कुंती के साथ कुछ दिनों तक (भलुहीपुर में)निवास करते हैं और भीमसेन ने बकासुर नामक राक्षस का समापन किया जो बकरी नामक स्थान (अब गांव) में रहता था।इस प्रकार पांडवों के द्वारा अरण्य देवी के सम्यक् प्रकार से पूजित होने का दृष्टांत है। आचार्य ने कहा कि प्रकृति की रक्षा, संस्कृति का संरक्षण, मातृशक्ति का आदर तथा विद्या की उपासना नवरात्र का संदेश तथा विजयादशमी की प्रेरणा है। कार्यक्रम का संचालन मधेश्वर नाथ पाण्डेय, स्वागत भाषण कुमार सौरभ तथा धन्यवाद-ज्ञापन राधा प्रसाद पाठक ने किया।इस अवसर पर सत्येन्द्र नारायण सिंह, अखिलेश्वर नाथ तिवारी, विश्वनाथ दूबे, नर्मदेश्वर उपाध्याय, अमरनाथ तिवारी, डॉ सत्यनारायण उपाध्याय, शिवदास सिंह, सियाराम दूबे, अजित सिंह, महेंद्र पांडेय, राकेश मिश्र, कृष्णाकांत दूबे, निलेश कुमार मिश्र आदि प्रमुख लोगों ने पूजा-अर्चना कर विश्व शांति और प्राणिमात्र के कल्याण के लिए प्रार्थना की।
