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प्राचीन काल से ही चैत और फागुन मास को प्रेम मास की दी गयी है संज्ञा- शालिनी ओझा

बिहार और उत्तर प्रदेश का लोकगीत है चैता चैती।

RKTV NEWS/शालिनी ओझा,15 मार्च।अब चैता चैती गायन विलुप्तवस्था के कगार पर है, तन ,मन ,दिमाग और आसपास के वातावरण में मदहोशी घोलती यह लोकगीत अपने आप में अनन्य है।किसी से पूछिए नया साल किस महीने से शुरू होता है तकरीबन 97 %लोग बोलेंगे जनवरी। जनवरी से लेकर दिसंबर तक हर महीने का नाम बच्चों को भी मुंहजबानी याद होता है सही है अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से तो।
लेकिन हिंदू नव वर्ष चैत मास कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से शुरू होता है.. अब आप कहेंगे प्रतिपदा किसे कहते हैं हिंदू पंचांग की पहली तिथि को प्रतिपदा कहते हैं यह तिथि मास में 2 बार आती है पूर्णिमा के बाद और अमस्या के बाद वाली तिथि। पूर्णिमा के बाद वाली तिथि को कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा कहते हैं और अमावस्या के बाद वाले तिथि को शुक्ल पक्ष की।
हिंदू वर्ष का पहला मास होने के कारण चैत्र का बहुत अधिक महत्व होता है चैत मास की पूर्णिमा चित्रा नक्षत्र में होती है इस कारण इस महीने का नाम चैत्र पड़ा।
ऐसी मान्यता है कि सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने चैत मास की शुक्ल प्रतिपदा से ही सृष्टि की रचना प्रारंभ की ।सतयुग की शुरुआत भी चैत्र माह से मानी जाती है।
हिंदी पंचांग के 12 महीने…
चैत, बैसाख, जेठ, आषाढ़, सावन, भादो ,कुवांर, कार्तिक अगहन, पुस माघ(मार्गशीर्ष)और फाल्गुन।
फागुन और चैत दोनों माह बसंत ऋतु में आते हैं यह बहुत सुकून का मौसम है ना अधिक गर्मी और ना सर्दी। पतझड़ के बाद का यह मौसम सुहाना होता है फूलों का खिलना ,पौधों का हरा भरा होना ,चारों तरफ हरियाली इस माह गेहूं, जौ, चना, मटर ,अलसी की कटाई होती है। चैत महीने को ऋतु परिवर्तन के रूप में माना जाता है पतझड़ बीत चुका होता है वृक्ष और लता में नए कोपलें आ जाती है, फसल कटकर खलिहान में आ जाते हैं ,आमों में बौर (मंजर )लग जाते हैं कोयल कूक ने लगती है, पपीहे की पिक कलेजे में हुक उठाती है प्रीतम संग मिलने पर प्रियतमा चैती गा उठती है । चैती उत्तर प्रदेश और बिहार का लोकगीत है।
आधुनिकता के इस युग में भी ग्रामीण परिवेश में कृषि जीविका का मुख्य आधार है धन धान्य से परिपूर्ण हो किसान खुश हो गायन करते हैं जिसे चैती कहते हैं यह चेतना पर केंद्रित लोकगीत है चैत महीने में गाए जाने वाले गीत का विषय प्रेम ,प्रकृति और होली रहता है यह भगवान श्रीराम का जन्म का मास भी है इसलिए इस गीत की हर पंक्ति के बाद अक्सर रामा शब्द लगाया जाता है।
यूं तो फरवरी माह में ही वैलेंटाइन (प्रेम दिवस) बीत जाता है लेकिन प्राचीन काल से ही हमारे यहां फागुन और चैत को प्रेम का महीना माना जाता है। चैती गायन शृंगार रस प्रधान विधा है।
विवाह ,मुंडन ,बसंती नवरात्रि की वजह से विभिन्न देवी मंदिरों और पूजा संबंधित विषय गांव के चौपाल में चैती की धुन सुनाई देती है ।
यह कजरी की ही भांति अत्यंत मधुर और रसीला गायन है जहां एक ओर चैती में हमें रस भाव से युक्त ठुमरी का आस्वादन मिलता है वही ध्रुपद धमार जैसे शास्त्रीय संगीत शैली में गाए जाने वाले चैता में भी शास्त्रीय संगीत का पुट मिलता है। चैत में बसंती बयार, फागुनहट चलती है और आलस महसूस होता है साथ ही साथ बेली चमेली के फूल भी खिल जाते हैं और महुआ के फूल भी लगने लगते हैं जिसके खुशबू बसंती बयार में मिल जाने से संपूर्ण वातावरण में मादकता व्याप्त हो जाती है।
इस विषय पर एक सुंदर चैती गीत…

*घरे घरे बाजेला अनंत बधाइयां हो रामा …
घरे घरे बाजेला अनंत बधाइयां हो रामा ..
घरे घरे ..
अयोध्या में राम जी जन्म ले हो रामा चैत मासे…

*चैतमासे से चुनरी रंगाईबो हो रामा…
पिया घरे आइन्हे…
प्रीत रंग लहंगा साबूज रंग चोलिया
लाले रंग चुनरी रंगाईबो हो रामा…
पिया घरे आइन्हें।
करी सिंगार अंगना भई खाड़ी..
हंसी हंसी पिया के रिझाइबो हो रामा..
पिया घरे आइंहे।

*झूलनी में लगली नजरिया हो रामा.. अब ना पहिरबई।
झूलनी पाहिनी हम गइनी बजरिया..
देवरा लगावे ला नजरिया हो रामा..
अब ना पहिरबई।

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