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सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने समलैंगिक शादियों को मान्यता देने की मांग वाली याचिकाओं का विरोध किया।

RKTV NEWS/नयी दिल्ली,13 मार्च। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने दायर जवाबी हलफनामे में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने वाली याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि शादी की धारणा ही अनिवार्य रूप से विपरीत लिंग के दो व्यक्तियों के बीच संबंध की पूर्वधारणा है। केंद्र ने कहा कि विपरीत लिंग के व्यक्तियों के बीच संबंध “सामाजिक, सांस्कृतिक और कानूनी रूप से विवाह के विचार और अवधारणा में शामिल है और इसे न्यायिक व्याख्या से परेशान या महीन नहीं किया जाना चाहिए।” ये हैं वो देश जहां सेम सेक्स मैरिज है लीगल (वीडियो) विवाह से संबंधित सभी व्यक्तिगत कानून और वैधानिक अधिनियम केवल पुरुष और महिला के बीच संबंध को मान्यता देते हैं। जब उस आशय का स्पष्ट विधायी इरादा हो तो कानून के पाठ को फिर से लिखने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की अनुमति नहीं है। जब प्रावधान “पुरुष” और “महिला” शब्दों का उपयोग करके स्पष्ट लिंग विशिष्ट भाषा का उपयोग करते हैं तो अदालतें व्याख्यात्मक अभ्यास के माध्यम से अलग अर्थ नहीं दे सकती हैं। केंद्र ने कहा कि समान-सेक्स संबंधों में व्यक्तियों के एक साथ रहने की तुलना पति, पत्नी और युगल से पैदा हुए बच्चों की भारतीय परिवार की अवधारणा से नहीं की जा सकती। यह तथ्य कि नवतेज सिंह जौहर के फैसले के बाद समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया, विवाह जैसे संबंधों के लिए कानूनी मान्यता प्राप्त करने के दावे को जन्म नहीं दे सकता।

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