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भोजपुर:बजट की समीक्षा पर फुटाब ने की नाराजगी व्यक्त।

आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)05 अगस्त।फेडरेशन ऑफ यूनिवर्सिटीज टीचर्स एसोसिएशन ऑफ बिहार (फुटैब) ने पिछले चार से पांच महीनों यानी मार्च से अब तक विश्वविद्यालयों के 2024-25 बजट की समीक्षा की अंतहीन प्रक्रिया पर नाराजगी व्यक्त की है।
फ़ुटैब के कार्यकारी अध्यक्ष कन्हैया बहादुर सिन्हा और महासचिव संजय कुमार सिंह एमएलसी ने बताया कि मार्च से जून तक का वेतन पेंशन केवल 42% डीए के साथ फरवरी 24 के वेतन/पेंशन के अनुसार तदर्थ आधार पर जारी किया गया था। यह कहा गया था कि बजट समीक्षा पूरी होने के बाद, जुलाई 24 के लिए अनुदान बढ़े हुए डीए के साथ जारी किया जाएगा। पिछले वित्त वर्ष से ही राज्य कर्मचारियों और अन्य को 50% का भुगतान किया गया है।
उन्होंने आशंका व्यक्त की है कि सरकार ने कुछ दिन पहले विश्वविद्यालयों को अपने पीएल खाते में पड़ी राशि को पहले वापस करने का आदेश दिया था, जिससे वित्त वर्ष 2024-25 के लिए बजटीय आवंटन जारी करने में और देरी हो सकती है, जिससे जुलाई ’24 से वेतन और पेंशन भुगतान बंद हो सकता है।
उन्होंने आगे बताया कि निदेशक उच्च शिक्षा ने पिछले साल कहा था कि 13 विश्वविद्यालयों में उनके पीएल खाते में 1760 करोड़ की राशि खर्च नहीं की गई है और यह अब तक 22 सौ करोड़ हो गई है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों के वार्षिक अनुदान की बजट समीक्षा को पूरा करने में अपनी असमर्थता को छिपाने के लिए जानबूझकर यह मुद्दा उठाया गया है, जो राज्य के लगभग 2.61 लाख करोड़ के अधिशेष बजट की तुलना में केवल एक छोटी राशि है।
पीएल खातों में बकाया राशि के मुख्य रूप से दो कारण हैं, एक तो वेतन, पेंशन और एरियर के भुगतान के लिए सरकार द्वारा लगाई गई कई अजीब शर्तें, जैसे कि वेतन का 25% और उसका बकाया तब तक रोकना जब तक कि सरकार का वेतन सत्यापन सेल वेतन को मंजूरी नहीं दे देता। कई शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन और पेंशन को महीनों तक रोकना, दूसरा कारण सरकार से डर के नाम पर समय पर प्रोन्नति और अन्य मदों यथा ईल, ग्रेच्युटी जैसी सेवा निवृत्ति लाभ आदि के बकाया भुगतान करने में विश्वविद्यालय प्रशासन की शिथिलता,80 वर्ष उम्र के पेंशनभोगियों की पेंशन में वृद्धि आदि का भुगतान नहीं होना है।
उन्होंने सरकार से आगामी ऐतिहासिक स्वतंत्रता दिवस से पहले जुलाई से बजटीय अनुदान जारी करने का आग्रह किया है, ताकि विश्वविद्यालयों को उन बंधनों से मुक्त किया जा सके, जो एफआईआर दर्ज करने जैसी कार्रवाई की धमकी देकर बार-बार थोपे जाते हैं।

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