
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)31 जुलाई।30जुलाई को श्रीसनातन शक्तिपीठ संस्थानम् तथा सनातन-सुरसरि सेवा न्यास द्वारा आयोजित श्रावण समाराधना के क्रम में सहदेव गिरि मंदिर कतीरा में सप्त दिवसीय श्री शिव पुराण कथा के तीसरे दिन प्रवचन करते हुए आचार्य डॉ भारत भूषण जी महाराज ने कहा कि तारकासुर भयंकर अराजक था। जिसके भय से सृष्टि का पालन करने वाले सभी देवता व्याकुल थे। स्कन्द स्वामी ने देवताओं के सेनापति बनकर उसका दल-बल के साथ नाश किया। कुछ दिनों के बाद उसके तीन पुत्र तारकाक्ष, विद्युन्माली और कमलाक्ष ने अपनी तपस्या के बल पर मायासुर के साथ तीन पुरों में विचरण करते हुए त्रिलोकी में भयंकर अराजकता उत्पन्न कर दी। सभी देवता पुनः भगवान शिव की शरण में गए।त्रिपुरों में वैदिक धर्म और व्यवस्था तार-तार हो गई थी। स्त्री-पुरुष सभी स्वेच्छाचार में लिप्त हो गये थे।तब भगवान शिव ने उन त्रिपुरा सुरों का नाश किया। आचार्य ने कहा कि सभी पापों का प्रायश्चित्त है किन्तु कृतघ्न का कोई प्रायश्चित्त नहीं है। व्यक्ति को हमेशा कृतज्ञ रहना चाहिए। कृतघ्न होना सबसे बड़ा दोष है। जिस मार्ग से सबका कल्याण और उत्कर्ष सुनिश्चित हो वही सनातन धर्म है।वही शिव तत्त्व है।उसका ही सेवन लोक-परलोक के लिए कल्याणकारी होता है।

